जानकारी के अभाव में घट रहा पशु बीमा का दायरा

जानकारी के अभाव में घट रहा पशु बीमा का दायरा

रायबरेली। लोहानीपुर गाँव के रहने वाले अब्बास अली (52 वर्ष) की बीमार गाय की मौत दो महीने पहले हुई थी। पशु मृत्यु पर मिलने वाले क्लेम का भुगतान लेने जब वो पशु अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनके पशु का पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें भुगतान नहीं मिल सकता।

रायबरेली जिला मुख्यालय से आठ किमी पश्चिम दिशा में लोहानीपुर गाँव के अब्बास बताते हैं, ''बीमा करवाने के बावजूद जानवर मर जाने का पैसा नहीं मिला है। पशुपालन अधिकारी कहते हैं कि हमने जिला पशु अस्पताल में गाय का पोस्टमॉर्टम नहीं करवाया है इसलिए बीमा की राशि का भुगतान नहीं हो सकता है।"

सरकार ने गरीब पशुपालकों को उनके पशु की मौत पर बीमा देने के लिए राष्ट्रीय पशु धन बीमा योजना शुरू तो कर दी है पर इसके अंतर्गत किए जाने वाले बीमा का लाभ कैसे मिल सकता है, इसके प्रचार-प्रसार के लिए कोई भी ख़ास कार्यक्रम नहीं चलाया है।

पशु बीमा में हो रही लापरवाही के बारे में जिला पशुधन प्रसार अधिकारी प्रकाश यादव बताते हैं, ''गाँवों में लोग अब बहुत कम पशु बीमा करवाते हैं। इसका मुख्य कारण है बीमा कंपनी का कम धनराशि का बीमा करना। बीमा कंपनी ज़्यादा से ज़्यादा 30 या 35 हज़ार तक का बीमा करती है पर अच्छी दुधारू भैंस या गाय की कीमत 50 से 60 हज़ार है। इतने महंगे पशु पर इतने कम का बीमा कौन करवाना चाहेगा।"

राष्ट्रीय पशुधन बीमा योजना से एक पशु का चालीस हजार रुपए तक का बीमा करने का प्रावधान है। इसमें बीमा का आधा भुगतान लाभार्थी व 25-25 फीसदी भुगतान केंद्र व राज्य सरकार करती है। बीमा की अवधि के दौरान अगर पशु की मौत होती है, तो बीमा कंपनी पशुपालक को चालीस हजार रुपए का भुगतान करती है। एक ओर जहां पशु बीमा को लेकर ग्रामीण पशुपालकों में जागरूकता का अभाव है वहीं दूसरी तरफ बीमा कंपनियों की लापरवाही भी योजना के विकास में बड़ा रोड़ा बनी हुई है।

''पशु की मृत्यु हो जाने पर बीमा कंपनी सम्बंधित पशु का सर्वे कर लेने के बाद ही भुगतान राशि जारी करती है। कई बार सर्वे करने में दो से तीन दिन लग जाते हैं। कोई भी पशुपालक मरे हुए जानवर को अपने पास इतने समय नहीं रख सकता है। ऐसे में वो अपने पशु को बिना सर्वे कराए ही उसे दफना या जला देता है। इस स्थिति में पशुपालक को बीमा का भुगतान नहीं मिलता है।" प्रकाश आगे बताते हैं।

सरकार ने पशुबीमा को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2013-14 में प्रत्येक पशु चिकित्सालय को एक वर्ष में 50 बीमा कराने का लक्ष्य दिया था। प्रतिवर्ष घटते पशुओं के बीमा दर के कारण पशु चिकित्सा विभाग ने यह आंकड़ा घटा कर हर केंद्र पर प्रतिवर्ष 20 पशु बीमा कर दिया है।

जिले में पशु बीमा की स्थिति बताते हुए जिला मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ के के चौधरी बताते हैं, ''जिले में पशु बीमा की हालत सुधारने के लिए हमने राष्ट्रीय पशु धन बीमा योजना के तहत गाँव-गाँव जाकर पशु बीमा जागरुकता शिविर लगवा रहे हैं। हालांकि टैगिंग और एनिमल ट्रैकिंग में अभी भी थोड़ी दिक्कतें आ रही हैं, जिनपर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।"

रायबरेली के राही विकासखंड के मधुपुरी गाँव के रमेश बाजपेई (45 वर्ष) के यहां पिछले वर्ष बीमारी के चलते भैंस की मृत्यु हो गई थी। रमेश ने जब बीमा कंपनी के एजेंट से पशु मृत्यु पर क्लेम करके बीमा का पैसा मांगा तो कंपनी ने उसे भुगतान करने से इनकार कर दिया।

रमेश बताते हैं, ''बीमा कंपनी ने जानवर पर एक टैग लगाया था। पर जब पशु मरा तो उस पर टैग नहीं था सिर्फ इसी बात के लिए हमारे क्लेम को सही नहीं माना गया और भुगतान नहीं हो सका।"

डेरी किसानों को बीमा भुगतान न मिलने की वजह पशु बीमा कंपनी नेशनल इंश्योरेंस के क्षेत्रीय अधिकारी सूरज कुमार बताते हैं, ''बीमा करवाते समय कंपनी पशु के कान में टैग लगाती है। पशुपालक अपने जानवरों को खुले चरागाहों में चरने के लिए छोड़ देते हैं। इससे कई बार उनके कान में लगा टैग कहीं गिर जाता है। टैग न होने पर क्लेम का दावा रद्द कर दिया जाता है और किसान को बीमा की राशि से वंचित होना पड़ता है।" भारतीय पशुपालन विभाग की पशु जनगणना-19 (वर्ष 2012 में जारी) के मुताबिक उत्तर प्रदेश, गुजरात के बाद पालतू पशुओं की जनसंख्या के मामले में भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है 

''हर किसान दिवस और तहसील दिवस पर जिले के अलग-अलग ब्लॉकों से आने वाले किसानों को पशु बीमा जागरूकता पम्फलेट और किताबें दी जा रही हैं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पशुपालक बीमा करवा सकें।" केके चौधरी आगे बताते हैं।

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