अब किसान अपना रहे बेबी कॉर्न की खेती

अब किसान अपना रहे बेबी कॉर्न की खेतीबेबी काॅर्न में फासफोरस, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, लोहा और विटामिन भी उपलब्ध है। सलाद, सूप, सब्जी, अचार, कैंडी, पकौड़ा बनाने में होता है उपयोग।

लखनऊ। खानपान की बदलती आदतों और हृदय रोगियों की बढ़ी संख्या के कारण बाजार में बेबी काॅर्न की मांग में दिन पर दिन बढ़ी है। बेबी काॅर्न मक्का के पौधे का वह अनिषेचित भुट्टा है जो रेशे आने के 2-3 दिन के अंदर तोड़कर उपयोग में लाया जाता है।

सलाद, सूप, सब्जी, आचार, कैंडी, पकौड़ा, कोफ्ता, टिक्की, बफ्री, लड्डू, हलवा और खीर के बनाने में बेबी काॅर्न का उपयोग बहुत हो रहा है। ऐसे में इस बढ़ती खपत को पूरा करने के लिए किसान बेबी काॅर्न की अधिक से अधिक खेती करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। उत्तर प्रदेश कृषि विभाग भी बेबी काॅर्न की खेती करने के लिए प्रदेश के किसानों की सहायता कर रहा है। मक्का अनुसंधान निदेशालय भारत सरकार भी प्रदेश में बेबी काॅर्न की खेती के लिए किसानों के बीच जागरूकता अभियान चला रहा है।

भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक डाॅ. यागेन्द्र यादव ने बताया “एक मक्का ऐसी फसल है जो हर मौसम में उगाई जा सकती है। खास कर बेबी काॅर्न तो मक्का की ऐसी फसल है जिसको साल में 3 से 4 फसलें उगाई जा सकती हैं और इसकी एक फसल से एक हेक्टेयर में 40 हजार से 50 हजार रुपए तक शुद्ध मुनाफा भी कमाया जा सकता है।”

1997 में हरियाणा के सोनीपत जिले के अटेरना गाँव में बेबी काॅर्न की खेती की हुई थी शुरुआत हरियाण के सोनीपत जिले के अटेरना गाँव में साल 1997 में बेबी काॅर्न खेती की शुरुआत की गई थी। उस समय चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक और बेबी काॅर्न की संकर किस्म एचएच-4 के प्रजनक डाॅ. साईंदास ने यहां के प्रगतिशील किसान कंवल सिंह चौहान को इसकी खेती के लिए बीज उपलब्ध करया था। इसके बाद से आस-पास गाँवों में इसकी खेती होने के साथ ही प्रदेश के अन्य हिस्सों में होने लगी।

रबी सीजन में 20 जनवरी से कर सकते हैं बुवाई

लखनऊ। रबी सीजन में बेबी काॅर्न की बुवाई 20 जनवरी से लेकर पूरे फरवरी तक कर सकते हैं। इसकी खेती के लिए दोमट मिट्टी की जरूरत होती है।

नरेन्द्र देव कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि और मौसम विभाग के वैज्ञानिक डाॅ. एके सिंह ने बताया “बेबीकाॅर्न एक स्वादिष्ट और पौष्टिक आहार है। पत्ती में लिपटे होने के कारण यह कीटनाशक दवाइयों के प्रभाव से मुक्त होता है। ज्यादा डिमांड होने की एक वजह यह भी है।”

उन्होंने बताया बेबी काॅर्न में फासफोरस भरपूर मात्रा में पाया जाता है इसके अतिरिक्त में इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, लोहा और विटामिन भी उपलब्ध है। कोलेस्ट्राॅल रहित और रेशों की अधिकता के कारण भी यह निम्न कैलोरीयुक्त आहार है। जिस वजह से यह हृदय रोगियों के लिए काफी लाभदायक होता है। अपनी इन्हीं खासियतों के चलते बेबी काॅर्न की खेती के प्रति किसानों को रुझान भी बढ़ रहा है।

बेबी काॅर्न के लिए मात्र तीन सिंचाई की ही जरूरत पड़ती है। बुवाई के 20 दिन बाद पहली सिंचाई, वहीं दूसरी फसल के घुटने की ऊंचाई तक आने और तीसरी फसल में फूल लगने से पूर्व करनी चाहिए। बेबी काॅर्न में किसी तरह की बीमारी या कीट भी नहीं लगता है क्योंकि इसकी बाली पत्तियों में लिपटी रहने के कारण घातक कीट और बीमारियों से मुक्त होती है।
डाॅ. योगेन्द्र, कृषि वैज्ञानिक, भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान

प्रति हेक्टेयर में 15-20 कुंतल पैदावार

लखनऊ। बेबी काॅर्न से प्रति हेक्टेयर 15-20 कुंतल प्रति हेक्टेयर जहां पैदावार होती है वहीं इससे 200-250 कुंतल प्रति हेक्टेयर चारा भी मिल जाता है जो पुशपालकों के लिए काफी उपयोगी होता है। बेबी काॅर्न की खेती के बारे में जानकारी देते हुए भारती मक्का अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डाॅ. जेसी शेखर ने बताया “बेबी काॅर्न की खेती का कुल लागत प्रति हेक्टेयर 15,420 रुपए है जिसके कुल पैदावार से 60 हजार रुपए की प्राप्ति होती है जिसमें शुद्ध मुनाफा 40 हजार रुपए होता है।

उन्होंने एक उदाहरण से बताया एक हेक्टेयर बेबी काॅर्न से लगभग 12 कुंतल पैदावार कम से कम होती है, 50 रुपए के किलो की दर से यह बिकता है।” गोरखपुर जिले के खजनी ब्लाॅक के जिगिना बाबू गाँव में बेबी काॅर्न की खेती करने वाले किसान जयप्रकाश ने बताया “बेबी काॅर्न के लिए किसानों को सुनिश्चित बाजार नहीं मिलता है, अभी तक जो व्यवस्था होनी चाहिए नहीं है।”

उन्होंने बताया “अंतराष्ट्रीय बाजार में बेबी काॅर्न की बढ़ती मांग के बावजूद भी इसकी खेती इसलिए नहीं बढ़ पा रही है क्योंकि इसके लिए जो उत्तम प्रकार के बीज किसानों को चाहिए वो नहीं मिल पा रहे हैं।”

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