इत्र के कारोबार ने बढ़ाई फूलों की डिमांड

इत्र के कारोबार ने बढ़ाई फूलों की डिमांडकन्नौज ज़िले में इत्र का कारोबार होने के कारण फूलों की खेती में रूचि ले रहे किसान

यह खबर हमें इन्होंने बताई

कम्युनिटी जर्नलिस्ट- डॉ. अमर सिंह, पद: कृषि वैज्ञानिक, उद्यान

विज्ञान केन्द्र अनौगी, जलालाबाद, कन्नौज

कन्नौज। इन दिनों किसान फूलों की खेती में रुचि ले रहे हैं जिसकी वजह से किसानों के साथ इसकी खेती का रकबा बढ़ा है। जिले में इत्र का कारोबार होने की वजह से फूलों की डिमांड खूब रहती है। बेला और गुलाब इत्र कारोबारियों की पहली मांग है इसलिए फसल की बारीकियां सीखकर किसान अधिक लाभ कमा सकते हैं। फूलों की खेती में रोपण तकनीक का विशेष महत्व होता है। इसमें अच्छी प्रजाति, गड्ढे का आकार, रोपण दूरी और रोपण के समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ये उत्पादन के लिए बहुत कारगर होता है।

बेला की प्रमुख प्रजातियां मोगरा सिंगल, मोगरा डबल, मदनवान, रामबनाम और गुण्डूमाली हैं। वहीं गुलाब में नूरजहां, रानीसाहिबा, ज्वाला, हिमरोज, चीनिया और कलकतिया शामिल हैं।

बेला की खेती के लिए गड्ढे खोदते समय रखें ध्यान

बेला पौध रोपण के लिए 45 सेमी आकार के गड्ढे खोदे जाते हैं। गड्ढे खोदते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि आधी मिट्टी गड्ढे की अलग निकाली जाती है और नीचे वाली मिट्टी अलग निकाल कर रखी जाए। पौध रोपण से पहले गड्ढों की भराई की जाती है जिसमें प्रति गड्ढा 10 किलो सड़ी गोबर की खाद और 500 ग्राम ट्राइकोडर्मा से तैयार गोबर की खाद व 150 ग्राम नीम की खली या आठ से 10 ग्राम फोरेट 10जी और 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट लेकर सभी को आधा बांटकर दोनों मिट्टियों को बराबर मिलाकर जो मिट्टी पहले निकाले उसे पहले और जिसे बाद में निकाले उसे बाद में भर दें।

रोपण की विधि और दूरी

बेला की फसल रोपण की दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि सहफसली खेती करनी है या अकेले बेला की खेती। सहफसली खेती करने पर पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे के बीच की दूरी 2.5 मीx 2.5 मी रखे तो प्रति हेक्टेयर 1600 पौधे रोपित होंगे। यदि सह फसली खेती नहीं करनी है तो पंक्ति से पंक्ति व पौधे के बीच की दूरी 1.5 से 1.5 मीटर रखी जानी चाहिए। इसमें 4444 पौधे रोपित होंगे। रोपण कार्य जुलाई से सितम्बर तक और सिंचाई का साधन है तो फरवरी-मार्च में रोपित किया जा सकता है।

कन्नौज ज़िले में इत्र का कारोबार होने के कारण फूलों की खेती में रूचि ले रहे किसान

गुलाब की खेती का वैज्ञानिक विधि से रोपण

गुलाब के पौधों का रोपण अक्टूबर से नवम्बर के बीच में होता है। इसके अलावा जुलाई-अगस्त में भी। इस समय रोपण करने से पौधे अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। रोपाई करने के लिए गड्ढा 0.5 मीटर आकार का खोदा जाता है। गड्ढे की 25 सेमी मिट्टी अलग और इतनी ही अलग निकाली जाए। रोपण दूरी पंक्ति से पंक्ति और पौधों के बीच की दूरी एक मीटर रखी जाती है जिससे प्रति हेक्टेयर 10 हजार पौधे रोपित हो जाते हैं।

रोपण की विधि और दूरी

संभव हो तो मिट्टी का परीक्षण कराकर खाद और उर्वरक का प्रयोग कराना चाहिए। यदि संभव न हो पाए तो 330 ग्राम डीएपी व 160 ग्राम एमओपी और 90 ग्राम यूरिया, 2.5 ग्राम बोरेक्स, पांच ग्राम जिंक सल्फेट, 20 ग्राम मैग्नीज और 10 किलो सड़ी गोबर की खाद प्रति पौधा प्रयोग करना चाहिए। बेला में खाद देने का समय 15 फरवरी से मार्च के प्रथम सप्ताह में दे देना चाहिए। इससे पहले पौधों के चारों तरफ मिट्टी हटाकर थारो को चारो तरफ से गहरा बनाते हैं। 10-12 दिन तक मिट्टी के पौधे की जड़ के पास से हटा देते हैं। इसके बाद खाद और उर्वरक भरते हैं।

गड्ढों की भराई की जानकारी

गुलाब के पौधों को लगाने से पहले गढ्ढों की भराई जरूरी है। इसके लिए बेले के पौध रोपण की ही तरह गढ्ढे की मिट्टी को दो भागों में बांटकर प्रति गड्ढा 10 किलो सड़ी गोबर की खाद और 500 ग्राम ट्राइकोडर्मा से तैयार सड़ी गोबर की खाद और 150 ग्राम नीम की खली या आठ से 10 ग्राम फोरेट 10जी व 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट लेकर सभी को आधा बांटकर दोनों मिट्टियों में बराबर मिलाते हैं।

दिसंबर-जनवरी में उर्वरक का छिड़काव करें

गुलाब में खाद और उर्वरक देने का काम दिसम्बर-जनवरी में किया जाता है। प्रति हेक्टेयर 10-15 टन सड़ी गोबर की खाद एवं 90 किलो नत्रजन और 60 किलो फास्फोरस एवं 60 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग किया जाता है। इसमें नत्रजन को दो भागों में बांटते हैं। आधा भाग दिसम्बर-जनवरी में और आधा भाग फरवरी में देते हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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