मटर की खेती के लिए सही समय, कम लागत लगाएं और अच्छा मुनाफा कमाएं

मटर की खेती के लिए सही समय, कम लागत लगाएं और अच्छा मुनाफा कमाएंमटर (प्रतीकात्मक फोटो)

स्वयं डेस्क

लखनऊ। दलहनी सब्जियों के बारे में बात करें तो सब्जी वाली मटर पहले नंबर पर आती है। अगर इस मौसम में किसान मटर की खेती करें तो इसकी खेती से किसानों को काफी मुनाफा मिल सकता है। इसके दो कारण है, पहला यह कि मटर की खेती करने के लिए किसान भाईयों को बहुत ही कम लागत लगानी होती है और दूसरा यह कि मटर की खेती अन्य सब्जी के खेती के मुकाबले कम समय में तैयार होने वाली फसल है। ऐसे में किसानों को मटर की खेती से अच्छा मुनाफा मिल सकता है।

ऐसी हो खेती के लिए भूमि

बाराबंकी जिले के बेलहरा कस्बे में रहने वाले जागरुक किसान राम चरण मौर्या (48 वर्ष) बताते हैं, वैसे तो मटर लगभग हर तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। जिसका पीएच मान 6-7.5 हो। वहीं, अम्लीय भूमि सब्जी वाली मटर की खेती के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं मानी जाती है। मटियार दोमट और दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अति उत्तम है। यानी ऊसर जमीन में ऐसे फसलें नहीँ उगाई जा सकती हैं।

इस जलवायु में करें मटर की खेती

सीतापुर में अटरिया के किसान अरुण शुक्ला ने इस बार 10 बीघे मटर बोई है वो बताते हैं, मैं अब अनाज कम ही उगाता हूं। सब्जियों की लखनऊ में अच्छी कीमत मिल जाती है इसलिए अब वही खेती करता हूं। किसानों को सलाह देते वो आगे बताते हैं, “सब्जी की मटर की खेती के लिए अक्टूबर-नवंबर माह का समय उपयुक्त होता है।” इस खेती में बीज अंकुरण के लिए औसत 22 डिग्री सेल्सियस की जरूरत होती है, वहीं अच्छे विकास के लिए 10 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर होता है।

यह हैं मटर की किस्में

मटर की किस्मों को दो भागों में विभाजित किया गया है। इसमें एक फील्ड मटर और दूसरी सब्जी मटर या गार्डन मटर है।

फील्ड मटर

इस वर्ग में किस्मों का उपयोग दाने के लिए, साबुत मटर, दालों के लिए और चारे के लिए किया जाता है। इन किस्मों में प्रमुख रूप से रचना, स्वर्णरेखा, अपर्णा, हंस, जेपी 885, विकास, शुभार, पारस, अंबिका आदि कई किस्में मौजूद हैं।

सब्जी मटर

यह मटर की दूसरा वर्ग है, जिसकी किस्मों का उपयोग सब्जियों के लिए किया जाता है। इनमें प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं।

आर्केल

यह एक यूरोपियन अगेती किस्म है। इसके बोआई के बाद 55 से 65 दिनों के अंदर फसल तैयार हो जाती है। इससे किसान को हरी फलियों की लगभग 70 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती है। इसकी फलियां आठ से दस सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं और प्रत्येक फली में पांच से छह दाने होते हैं। यह जल्द तैयार होनी फसल है।

अर्ली बैजर

यह एक तरह की अगेती किस्म है। बोआई के 65 से 70 दिनों बाद इसकी फलियां तोड़ने के योग्य हो जाती हैं। वहीं, इस किस्म से किसानों को 80 से 100 क्विंटल तक फसल का उत्पादन प्राप्त हो सकता है। इस किस्म से फलियां सात सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं और दाने बड़े आकार में होते हैं।

बोनविले

यह किस्म झुर्रीदार होता है। इसकी फलियां बोआई के 80 से 85 दिन बाद तोड़ने लायक हो जाती हैं। जबकि फलियों की औसत उत्पादन किसानों को 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल सकती है।

असौजी

यह किस्म अगेती बौनी किस्म है। इसमें किसानों को पांच से छह सेंटीमीटर तक लंबी फलियां प्राप्त होती हैं। वहीं 55 से 65 दिनों में तैयार होने वाली इस फसल से किसानों को 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हो जाता है।

अर्ली दिसंबर

यह किस्म भी अगेती किस्म है और 55 से 60 दिनों में फसल तैयार हो जाती है और फलियां तोड़ने योग्य होती हैं। इस किस्म से किसानों को औसत उपज 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो सकती है। इस किस्म से भी फलियों की लंबाई लगभग छह से सात सेंटीमीटर होती है।

पन्त उपहार

इस किस्म की बुआई से 65 से 75 दिनों तक फलियां तोड़ने योग्य हो जाती हैं। किसानों की इस किस्म की बुआई 25 अक्टूबर से 15 नवंबर तक करने देनी चाहिए।

जवाहर मटर

यह मध्यम किस्म है। इसकी फलियां बुआई से 65 से 75 दिनों बाद तोड़ी जा सकती हैं। इस किस्म में फलियों की औसत लंबाई सात से आठ सेंटीमीटर होती है। वहीं प्रत्येक फली से किसानों को पांच से छह बीज प्राप्त होते हैं। इससे किसानों को फलियों की औसत पैदावार 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो जाती हैं।

मध्यम किस्में

यह किस्में बोआई के बाद 85 से 90 दिनों बाद तोड़ने योग्य हो जाती हैं। इन किस्मों में बोनविले, काशी शक्ति, एनडीवीपी-8 और 10, टी9, टी 56 और एनपी 29 प्रमुख हैं। इसके अलावा पछेती किस्में (देर से तैयार होने वाली) भी हैं।

बीज की मात्रा

मटर की खेती के लिए अगेती किस्मों में 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है, वहीं मध्यम और पछेती किस्मों के लिए 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर लगता है। बीज हमेशा प्रमाणित और उपचारित होना चाहिए।

खाद और उर्वरक

सब्जी मटर की खेती में 20 टन खूब सड़ी गोबर की खाद), 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-70 किलोग्राम फास्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश युक्त उर्वरक प्रति हेक्टेयर देना बेहतर रहता है। नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का ज्यादा इस्तेमाल नाइट्रोजन स्थिरीकरण और गांठों के निर्माण में बाधा पहुंचाता है।

कृषि बैज्ञानिक डॉ. डी एस श्रीवात्सव की बातचीत पर आधारित

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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