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किसानों के लिए मुसीबत बने भट्ठे

किसानों के लिए मुसीबत बने भट्ठे

कुलताजपुर (सीतापुर)। कुलताजपुर के आसपास के करीब तीन से चार किलोमीटर के क्षेत्र में कुल 11 ईंट के भट्ठे हैं। ये सारे भट्ठे जब एक साथ धुआं उगलते हैं तो पूरा वातावरण काला नज़र आने लगता है। इतने अधिक भट्ठों के पास-पास होने की वजह से यहां के किसानों को कई तरह की मुसीबतों का समना करना पड़ रहा है।

सीतापुर से करीब 40 किमी दूर लहरपुर ब्लॉक के नवीनगर ग्राम पंचायत के कुलताजपुर गाँव के किसान उत्तम कुमार मौर्य (47 वर्ष) बताते हैं, ''भट्ठों की चिमनियों से जो राख निकलती है, वो खेत में फसल पर और गाँव में घरों पर गिरती है, जिससे बहुत परेशानी होती है। फसल अच्छे से बढ़ती नहीं है। अभी इस समय भट्ठे नहीं चल रहे हैं तो फसल अच्छी दिख रही है, जैसे ही भट्ठे शुरू होंगे उसका असर फसल पर दिखने लगता है। उसके बाद फिर उसमें कितनी भी दवाई डालों कोई असर नहीं होता है।’’

वो आगे बताते हैं, ''इसके अलावा छत पर अगर अनाज य कुछ भी फैला दो तो सब राख उसी में मिल जाती है। अब मालूम नहीं चलता है किसी को लेकिन जब इतनी राख गिरती है तो सांस के साथ शरीर में भी ये चली जाती होगी, शायद इसलिए यहां पर इतने ज़्यादा सांस के मरीज हैं।’’ उत्तम मौर्य के अनुसार गाँव में करीब 20 से 25 फीसदी लोग सांस के मरीज हैं। उनका कहना है कि यहां पर हमेशा से इतने भट्ठे नहीं थे। ये पिछले करीब 15 सालों में बढ़कर इतने भट्ठे हो गये हैं।

सीतापुर के जिलाधिकारी इन्द्रवीर सिंह यादव से जब इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा, ''ऐसा कोई नियम नहीं है जिसमें लिखा हो कि कई भट्ठे एक साथ नहीं हो सकते हैं। लाइसेंस जि़ला पंचायत देती है बस वो होना चाहिए। एक भट्ठे से दूसरे भट्ठे के बीच की दूरी का कोई नियम नहीं है।’’ वहीं, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वर्ष 2011 के नियमों के अनुसार अगर 100-150 लोगों या 20 घरों की आबादी है तो दो भट्ठे के बीच की दूरी कम से कम 500 मीटर होनी चाहिए और अगर 500 से ज़्यादा लोग या 20 से ज्य़ादा घर हैं तो दो भट्ठों के बीच की दूरी कम से कम एक किमी होनी चाहिए, लेकिन अगर यहां के भट्ठों के बीच की दूरी देखी जाए तो ज्य़ादातर भट्ठे एक दूसरे से सटे हुए हैं। सिर्फ कुछ ही भट्ठे हैं जिनकी दूरी 500 मीटर है। इसके अलावा एक भट्ठा जिसका नाम भारत है वो तो कुलताजपुर गाँव से एकदम सटा हुआ है।

पास के ही गाँव फत्तेपुर के लोकेसुर दिक्षित (55 वर्ष) ने न चाहते हुए भी अपनी एक एकड़ ज़मीन भट्ठे को बेच दी थी। वो बताते हैं, ''हमारे आसपास के किसानों ने अपने खेत पहले बेच दिये थे, जिसकी मिट्टी भट्ठे वालों ने जब खोद ली तो हमारे खेत के आसपास खाली हो गया था, जिसके कारण हमारे खेत की मिट्टी कट कर बार-बार उस बह जा रही थी। इसलिए मजबूरी में हमें भी अपना खेत बेचना पड़ा।’’

फत्तेपुर से करीब तीन किमी दूर दक्षिण दिशा में बसा हरगाँव ब्लॉक की ग्राम पंचायत मल्लापुर के गाँव पैकनगर के किसान रामकुमार वर्मा (65 वर्ष) ने करीब पांच वर्ष पहले अपनी चार बीघे आम को कटवा दिया था, क्योंकि उसमें फल आने बन्द हो गये थे। वो बताते हैं, ''पहले बहुत फसल आते थे, लेकिन फिर धीरे-धीरे पता नहीं क्या होता गया, उसमें जो फसल आते थे, ज्यादातर काले पड़ जाते थे। दवाई डालता था फिर भी सही नहीं होता था। उसके बाद फिर धीरे-धीरे फसल आने कम होने लगे। बौर तो आता था, लेकिन वो सब गिर जाता था। उससे कोई फायदा हो नहीं रहा था इस लिए हमने बाग कटवा दी।’’ वो बताते हैं, ''पहले यहां आम और कटहल की बहुत बागें थी, लेकिन अब सब खत्म होती जा रही हैं।’’

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