कल ये पिता-पुत्री आपका परिवार भी हो सकता है

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मुंबई। दस राज्यों में सूखा झेल रहे भारत के महाराष्ट्र में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यहां हर रोज़ नौ किसान आत्महत्या कर रहे हैं। त्रासदी से निपटने के लिए राज्य द्वारा बनाई गई टास्क फोर्स इन आत्महत्याओं का आरोप अधिकारियों की नाकामी पर लगा रही है।

कुछ निजी संस्थाएं इस वर्ष मॉनसून सामान्य होने का अनुमान जता रही हैं लेकिन सामान्य परिस्थितियों में जून में आने वाले मॉनसून में अभी दो महीने बाकी हैं, जबकि देश इस समय दशक की सबसे भयानक जल त्रासदी से जूझ रहा है, सभी बड़े जलाशयों में पानी की किल्लत है।

साल 2015 में महाराष्ट्र में 3,228 किसानों ने आत्महत्या कर ली, जो कि 2001 के बाद से अब तक सबसे बड़ा आंकड़ा है। चार मार्च 2016 को राज्य सभा में जारी किए गए इन आंकड़ों के हिसाब से महाराष्ट्र में रोज़ नौ किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

किसानों की आत्महत्या की यह संख्या वर्ष 2014 में आतंकवादी समूह तालिबान द्वारा मारे गए लोगों की संख्या के लगभग बराबर है।

महाराष्ट्र छह जिलों को मिलाकर बने पांच भौगोलिक क्षेत्रों में बंटा है- कोंकण, पुने, नासिक, मराठवाड़ा (औरंगाबाद) और विदर्भ (अमरावती और नागपुर)। विदर्भ और मराठवाड़ा में सबसे ज्यादा स्थिति खराब है। संयुक्त रूप से 57 लाख किसानों वाले इन दो क्षेत्रों में राज्य की 83 फीसदी आत्महत्याएं हुईं।

विदर्भ में 1,541 किसानों ने अपनी जान दे दी। नागपुर में 362 और अमरावती में 1,179 आत्महत्याएं हुईं। वहीं विदर्भ के बाद मराठवाड़ा का औरंगाबाद रहा, जहां 1,130 किसानों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2016 के जनवरी माह में ही अकेले इस क्षेत्र के 89 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 

किसानों की त्रासदी से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने जो टास्क फोर्स बनाई उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन आत्महत्याओं का मुख्य कारण “सरकारी महकमें के अधिकारियों की संयुक्त नाकामी है”। 

आत्महत्याओं का यह दौर नया नहीं पिछले तीन सालों में लगातार दो सूखा और बे-मौसम बारिश व ओलावृष्टि से अपनी रबी की कई फसलें गंवा चुके देश के किसान, कृषि त्रासदी का सामना कर रहे हैं। किसान आत्महत्या की खबरें अख़बारों में आम होती जा रही हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक वर्ष 2014 में देश में 5,650 किसानों ने आत्महत्या कर ली, यानि रोज़ 15 आत्महत्याएं। ब्यूरो के अनुसार किसानों को मौत के मुंह में धकेलने वाले मुख्य पांच कारण बताए गए- संपत्ती की कुड़की और कर्ज (1,163 आत्महत्याएं), घरेलू समस्याएं (1,135 आत्महत्याएं), प्राकृतिक आपदाओं व बिक्री की दिक्कतों जैसी किसानी से संबंधित समस्याएं (969 आत्महत्याएं), बीमारी (745 आत्महत्याएं) और नशाखोरी (250 आत्महत्याएं)।

महाराष्ट्र की स्थिति भी इतर नहीं। ब्यूरो के अनुसार राज्य में 2014 में सबसे ज्यादा 857 किसानों ने संपत्ति कुड़की या फिर कर्ज़ के चलते ही जान दे दी। इनमें से कुड़की और फसल पर लिए गए कर्ज़ की वजह से 765 और गैर कृषि ऋण व संसाधनों के कज़र् की वजह से 92 आत्महत्याएं हुईं। 

संख्यकी मंत्रालय के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) द्वारा वर्ष 2013 में किए गए सर्वे के आधार पर  सामने आया था कि महाराष्ट्र में प्रति किसान परिवार 54,700 रुपए का कर्ज़ जो कि 47,000 रुपए के राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है। 

ब्यूरो के अनुसार सबसे ज्यादा आत्महत्याएं भी महाराष्ट्र (2,568 आत्महत्याएं) में ही हुईं। महाराष्ट्र के बाद सबसे ज्यादा आत्महत्याओं वाले पांच राज्यों में से अन्य चार राज्यों में तेलंगाना (898 आत्महत्याएं), मध्य प्रदेश (826 आत्महत्याएं), छत्तीसगढ़ (443 आत्महत्याएं) और कर्नाटक (321 आत्महत्याएं) शामिल रहे।

साभार: इंडिया स्पेंड (गाँव कनेक्शन द्वारा संपादन के साथ) य बदलाव किए गए)

रिपोर्टर - चैतन्य मल्लापुर

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