लीची से मौत की खबर को एनआरसीएल ने किया खारिज, कहा- 122 बच्चों की मौत के लिए लीची जिम्मेदार नहीं

Arvind ShukklaArvind Shukkla   3 Feb 2017 2:30 PM GMT

लीची से मौत की खबर को एनआरसीएल ने किया खारिज,  कहा- 122 बच्चों की मौत के लिए लीची जिम्मेदार नहींएक वैज्ञानिक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत लीची खाने से हुई थी। 

लखनऊ/ मुजफ्फरपुर। गर्मियों के मीठे-मीठे फल लीची पर बिहार से लेकर दिल्ली तक कड़वाहट फैली हुई है। तीन साल पहले मुजफ्फरपुर में 122 बच्चों की मौत के लिए वैज्ञानिकों ने लीची को जिम्मेदार माना तो लीची अनुसंधान केंद्र ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है।

देश की करीब 65 फीसदी लीची बिहार में उगाई जाती है, जो भारत के कोने-कोने समेत दुनिया के कई देशों में निर्यात भी की जाती है। लेकिन पिछले तीन दिनों से लीची को लेकर हंगामा मचा है। वैज्ञानिकों की एक टीम ने दावा किया है कि खाली पेट लीची खाने से मौत हो सकती है, मामला तीन साल पहले मुज्फफपुर में 122 बच्चों की मौत से जुड़ा है। वैज्ञानिकों की रिसर्च के बाद रिपोर्ट विज्ञान पत्रिका लैंसेट ग्लोबल में प्रकाशित हुई। खबर मीडिया में आते ही बिहार के किसान और कारोबारी परेशान हो गए। स्थानीय डॉक्टरों और राष्ट्रीय लीची अनुसंधान संस्थान केंद्र (एनआईसीएल) तक ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया।

रिपोर्ट आधारहीन है, मौतों का लीची से ताल्लुक नहीं है। ये एकेडमिक रिसर्च थी और इसका सैंपल साइज बहुत छोटा था। भारत में 500 सालों से लीची खाई जा रही है। मौत के पीछे कुपोषण, स्वच्छता और हीट स्ट्रैक जैसी समस्याएं हो सकती है।
विशाल नाथ, निदेशक, लीची अनुसंधान संस्थान केंद्र, बिहार

मुजफ्फरनगर में स्थित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान संस्थान केंद्र (एनआईसीएल) के निदेशक विशाल नाथ ने गांव कनेक्शऩ से बात करते हुए कहा कि. रिपोर्ट आधारहीन है, मौतों का लीची से ताल्लुक नहीं है। ये एकेडमिक रिसर्च थी और इसका सैंपल साइज बहुत छोटा था। भारत में 500 सालों से लीची खाई जा रही है कभी ऐसा वाक्या सामने नहीं आया।” हालांकि उन्होंने जोड़ा मुजफ्फरपुर में काफी गर्मी होती है, जो लू लगने, कुपोषण और साफ-सफाई के अभाव के चलते मौत एक वजह हो सकती है। विशाल नाथ ने वैसे भी ये मामला 2014- का है उसके बाद कोई ऐसे मामले सामने नहीं आए। कहा कि हम लोग पिछले कई वर्षों से रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन कोई ऐसा तत्व नहीं मिला, जो सेहत के लिए हानिकारक हो।

लीची अनुसंधान केंद्र के अऩुसार बिहार में लाखों किसान को लीची से रोजगार मिला हुआ है। और सालाना करीब 6 लाख टन उत्पादन होता है। मुज्फ्फरपुर इसका केंद्र है। मुजफ्फरपुर के साथ ही समस्तीपुर, वैशाली और मोतिहारी में भी बड़े पैमाने पर लीची के बाग हैं। बिहार की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वहां ऐसे मौसम में भी बच्चों को उन्हीं लक्षणों के साथ अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जब लीची का मौसम नहीं होती है।

लीची का बाग।

पिछले कई दशकों में मेरे सामने ऐसा वक्या नहीं आया है। हालांकि हम सब को बचपन से सिखाया गया कि खाली पेट लीची नहीं खाना चाहिए।
गिरींद्र नाथ झा, जागरुक किसान और पत्रकार, चनका, पूर्णिया

पूर्णिया जिले में चनका गांव जागरुक किसान और पत्रकार गिरींद्र नाथ झा के पास एक बीघे का बाग हैं। वो बताते हैं,पिछले कई दशकों में मेरे सामने ऐसा वक्या नहीं आया है। हालांकि हम सब को बचपन से सिखाया गया कि खाली पेट लीची नहीं खाना चाहिए।

22-25 दिनों का होता है लीची का बाजार

लीची आम के सीजन से कुछ पहले बाजारों में आती है और 20-25 दिनों में गायब हो जाती है। विश्व में सबसे गुणकारी लीची का उत्पादन बिहार के मुजफ्फरपुर में ही होता है। मुजफ्फपुर और मेहसी से रुस, फ्रांस, अमेरिका और कनाडा और साउदी अरब समेत कई देशों में इसका निर्यात भी होता है।

पढ़िए क्या था पूरा मामला, और क्या थी रिपोर्ट

बिहार में बच्चों की रहस्यमय मौत के पीछे लीची: अध्ययन रिपोर्ट

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