कृषि व्यापार

संभावना : मोती उत्पादन में विश्व का नंबर वन देश बन सकता है भारत

लखनऊ। मोती उत्पादन में भारत दुनिया का सिरमौर बन सकता है, क्योंकि यहां की समुद्री जलवायु दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले सर्वाधिक उपयुक्त है।

देश के जानेमाने पर्ल एक्वाकल्चर क्षेत्र के वैज्ञानिक डा. अजय सोनकर ने बताया '' मोती उत्पादन में एकाधिकार रखने वाले देश जापान में मोती बनने में तीन वर्षों से अधिक का समय लगता है वहीं भारत में अंडमान के स्वच्छ शांत और विविधताओं से भरे समुद्री जलवायु में महज छह महीने से एक वर्ष में मोती बन जाता है। ''

जापान में मोती बनने में 3 वर्षों से अधिक का समय लगता है वहीं अंडमान के स्वच्छ शांत और विविधताओं से भरे समुद्री जलवायु में महज छह महीने से एक वर्ष में मोती बन जाता है।
डा. अजय सोनकर, वैज्ञानिक, पर्ल एक्वाकल्चर

उन्होंने बताया कि जापान का समुद्री पानी काफी ठंडा है और पिछले सालों में समुद्री जलवायु में आए परिवर्तन और और कंस्ट्रक्शन से समुद्री पानी काफी प्रदूषित हो गया है। वहां के समुद्र में सीपों की बड़ी संख्या में मौत हो रही है जिससे वहां पर मोती उत्पादन अधिक लाभप्रद नहीं रह गया है।

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दुनियाभर में मोतियों की मां तेजी से बढ़ती जा रही है लेकिन मांग के अनुरूप इसका उत्पादन नहीं हो रहा है। भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए अंतराष्ट्रीय बाजार से हर साल मोतियों का बड़ी मात्रा में आयात करता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषाद के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्‍वाकल्‍चर, भुवनेश्‍वर ने देश में ताजा पानी के सीप से ताजा पानी का मोती बनाने के लिए काम कर रह है।

चीन के मीठे पानी में बने सस्ते मोती प्रभावित कर रहे हैं कारोबार

जापान मोती उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए जापान दूसरे देशों में जाकर अपनी परियोजना स्थापित करके मोती उत्पादन कर रहा है, जिससे उसकी लागत बढ़ रही है। चीन के मीठे पानी के बने बेहद साधारण और सस्ते मोती के कारण भी जापान व अन्य मोती उत्पादक देशों का मोती कारोबार प्रभावित हो रहा है। चीन के पास समुद्री पानी में मोती बनाने की प्रौद्योगिकी नहीं है ऐसे में भारत में अंडमान जैसे द्वीपसमूह का साफ सुथरा वातावरण और भारत में विकसित की गई निजी प्रौद्योगिकी के कारण यह इसके उत्पादन के लिए बेहतर जगह है।

यहां सीपों की दुर्लभ प्रजातियां जैसे '' पिंक टाडा मार्गेरेटिफेरा'', '' पिंक टाडा मैक्सिमा '' और '' टीरिया पैंग्विन '' जैसी दुर्लभ प्रजातियां बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। जो दुनिया की बेहतरीन मोती बनाने की क्षमता रखती हैं। ऐसे में भारत दुनिया के सर्वोत्तम मोती उत्पादक देश होने की भरपूर संभावना रखता है।

डा. सोनकर ने बताया कि उनका प्रयास है कि भारत मोती उत्पादन में दुनिया का अग्रणी देश बने जिसका वो कुदरती हकदार है। उन्होंने बताया कि असंभव माने जाने वाले 22 मिमी आकार के दुनिया का सबसे बड़ा काला मोती बनाकर जहां जापान सहित दुनिया के तमाम मोती उत्पादक देशों को अचंभित की दिया था। उनकी इस उपलब्धि के बाद लोग उनके कार्यस्थल अंडमान निकोबार द्वीप समूह को अंग्रेजी शासन के दौरान '' कालापानी के सजायाफ्ता लोगों की जगह '' इसे '' काला मोती'' के सृजनस्थल के रुप में चिन्हित करने लगे हैं।

मोती उत्पादन का काम आस्ट्रेलिया, वियतनाम, इंडोनेशिया और कुक आइलैंड जैसे तमाम देशों में भी हो रहा है लेकिन इन देशों की समुद्री जलवायु के मुकाबले भारत में अंडमान के साथ साथ भारत के विभिन्न समुद्री स्थलों की जलवायु मोती उत्पादन के लिए कहीं अधिक उपयुक्त है.

डा सोनकर ने बताया कि सीप पानी को साफ और स्वच्छ रखने का भी अहम काम करते हैं. जब कोई सीप पानी के तलहट पर जमे काई :एल्गी: से भोजन लेता है तो वह इस प्रक्रिया में लगभग 15 गैलन पानी को एकदम स्वच्छ कर देता है। पानी में नाइट्रोजन कम करता, आक्सीजन की मात्रा को बढाता है और गंदगी दूर कर देता है। सीप जब प्रकृति से भोजन के रुप में कुछ लेता है तो बदले में शुद्ध पानी के रुप में एक अनमोल वस्तु प्रकृति को लौटा देता है।

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