कुंभकरण की नींद टूटी: सूखे पर जागीं सरकारें

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नई दिल्ली (भाषा)। सरकार ने गुरुवार को बताया कि इस समय देश के 10 राज्य उत्तर प्रदेश, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, कर्नाटक और महाराष्ट्र सूखे की स्थिति के कारण पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। लोकसभा में मनोज राजोरिया, हरीश मीणा, शोभा करंदलाजे, प्रह्लाद पटेल, प्रताप सिन्हा के पूरक प्रश्नों के उत्तर में पेयजल एवं स्वच्छता राज्य मंत्री राम कृपाल यादव ने कहा कि इन 10 राज्यों के अलावा बिहार, गुजरात और हरियाणा के भी कुछ हिस्से जल संकट का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत सूखा समेत अन्य प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कुल आवंटन का 2 प्रतिशत निर्धारित किया गया है और इसे अलग रख दिया जाता है। यादव ने कहा कि सूख प्रभावित क्षेत्रों को रेलवे द्वारा जल पहुंचाने का कोई प्रस्ताव नहीं है हालांकि रेल मंत्रालय महाराष्ट्र के लातूर में ट्रेनों द्वारा पेयजल उपलब्ध करा रहा है।

सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिये विशेष प्रकोष्ठ  

लखनऊ (भाषा)। उत्तर प्रदेश सरकार ने बुंदेलखण्ड समेत विभिन्न सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सूखे की स्थिति की निगरानी के लिये एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया है। प्रदेश के राहत आयुक्त अनिल कुमार ने गुरुवार को बताया कि प्रदेश के अधिकांश जिलों खासकर बुन्देलखंड में सूखे की विषम स्थिति को देखते हुये राजस्व विभाग के संयुक्त सचिव राजा राम की अध्यक्षता में ‘सूखा अनुश्रवण प्रकोष्ठ’ की स्थापना की गयी है। प्रकोष्ठ द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली कार्य योजनाओं की शासन द्वारा भी निरन्तर समीक्षा की जाएगी।

अध्ययन करने के लिए भेजी गईं टीमें  

नई दिल्ली। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीनस्थ केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मौके पर अध्ययन करने के लिए अधिकारियों के तकनीकी दलों को वहां भेज रहे हैं। ये दल उन समस्याओं एवं कारणों का विश्लेषण करेंगे जिसकी वजह से सूखे जैसे हालात बने। ये दल जल संसाधन के प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों के साथ-साथ जल संबंधी जानकारी एवं इसके पुनर्भरण की योजनाओं में कमी और दीर्घकालिक समाधानों की पहचान करेंगे।

इसके साथ ही ये दल जल स्रोतों के संरक्षण, प्रबंधन एवं उनमें पूर्वावस्था की बहाली के उपाय भी सुझायेंगे। 

उपर्युक्त दलों को संभावित विकल्पों की एक दीर्घकालिक कार्य योजना भी तैयार करने को कहा गया है। ये दल एक पखवाड़े के भीतर अध्यक्ष (सीडब्ल्यूसी) और अध्यक्ष (सीजीडब्ल्यूबी) को अपनी रिपोर्ट पेश कर देंगे, जो अपनी टिप्पणियों के साथ इन रिपोर्टों को मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। यह प्रक्रिया जून, 2016 तक निरंतर जारी रहेगी। इस संबंध में निरीक्षण वाले क्षेत्रों का चयन जल की कमी से जुड़े संकेतकों के आधार पर किया जाएगा।

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