क्या है मजदूर दिवस और उनके अधिकार?

क्या है मजदूर दिवस और उनके अधिकार?gaonconnection, क्या है मजदूर दिवस और उनके अधिकार?

“सरकार ठेका मजदूरी (नियमन और उन्मूलन) केंद्रीय कानून के 25वें कानून में संशोधन करने जा रही है। इस संशोधन से प्रत्येक ठेका मजदूर को हर महीने 10 हजार रुपए मिल पाएंगे।” ये वाक्य हैं देश के श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारु दत्तात्रेय के हैं जिन्होंने मजदूरों की स्थिति में सुधार लाने के लिए इस कार्य को आगे बढ़ाने का भरोसा हम सब मजदूरों को दिलाया है। 

आज मजदूर दिवस के अवसर पर देश के रोजगार मंत्री की इन बातों को याद करना उन सबके लिए आवश्यक है जो मजदूर वर्ग की श्रेणी मे आते हैं। हालांकि अक्सर मजदूर शब्द से हम तपती धूप मे नंगे पांव किसी बोझ को ढोते या खींचते हुए या किसी फैक्ट्री में बड़ी-बड़ी मशीनों को परेशान हाल में चलाते हुए या फिर किसी और के खेतों में अपने परिवार का पेट पालने के लिए सूरज निकलने से लेकर डूबते समय तक कड़ी मेहनत करते हुए गरीब किसान जैसी छवि मन में बना लेते हैं जबकि मजदूर की परिभाषा को जानने की कोशिश करें तो मालूम होता है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो उसकी श्रमशक्ति को बेचकर अपना रोजगार कमाता है, वह मजदूर है।

दूसरी परिभाषा के अनुसार मजदूरी का अर्थ सेवा है, सेवा प्रदान करने वाला व्यक्ति मजदूर होता है। ये परिभाषा साफतौर पर बताती है किसी अन्य व्यक्ति के अंतर्गत काम करने वाला दूसरा व्यक्ति चाहे काम करने की जगह सड़क हो, खेत हो, फैक्ट्री हो या कोई शानदार ऑफिस सब मजदूर की ही श्रेणी मे आते हैं क्योंकि प्रत्येक माह के अंत में वो अपने मालिक द्वारा दिए जाने वाले वेतन के लिए उनपर निर्भर हैं। ऐसे में मजदूर दिवस की महत्ता हमारे देश के लोगों के लिए और भी बढ़ जाती है जहां की अधिकतर आबादी किसी न किसी प्रकार की नौकरी अर्थात मजदूरी से जीवनयापन कर रही है।

ज्यादातर लोग मजदूर दिवस के इतिहास से अंजान हैं। दरअसल इस दिन की शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय हुई जब मजदूर मांग कर रहे थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी हो। इस हड़ताल में एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और पुलिस फायरिंग में कुछ मजदूरों की मौत हो गई, कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए। इसके बाद 1889 में पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए, उसी समय से दुनिया के 80 देशों में मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश घोषित हुआ। हमारे देश में पहली बार मजदूर दिवस 1923 में मनाया गया जिसका सुझाव सिंगार वेलुचेट्टीयार नाम के एक कम्युनिस्ट नेता ने दिया, उनका कहना था कि दुनियाभर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं तो भारत में भी इसकी शुरुआत होनी चाहिए। इस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, “किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है।”

परंतु वर्तमान समय की स्थिति पर नजर डाला जाए तो स्पष्ट होता है कि हमारे देश के कामगारों की स्थिति संतोषजनक नहीं है और हो भी कैसे हममें से अधिकतर मजदूर वर्ग की श्रेणी मे तो जरूर हैं लेकिन एक मजदूर होने के नाते हमें अपने अधिकारों और उत्तरदायित्व का कोई ज्ञान नहीं जबकि हमें मालूम होना चाहिए की हर साल मजदूर दिवस के अवसर पर सरकार की ओर से कई प्रकार की योजनाए मजदूरों के उत्थान के लिए बनाई जाती हैं और कुछ सुविधाएं पहले से भी मौजूद हैं। 

उदाहरण, कल कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की अगर किसी दुर्घटना में मौत हो गई तो सरकार की ओर से एक लाख रुपए मुआवजा और स्थाई विकलांगता पर 75 हजार रुपए मुआवजा मिलता है। वहीं भवन व अन्य सन्निर्माण प्रकियाओं में कार्यरत मजदूरों के मेधावी बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए मेधावी छात्र पुरस्कार के तौर पर दो से बारह हजार रुपए तक मिलते हैं साथ ही पुत्री विवाह के लिए अनुदान स्वरूप बीस हजार रुपए व आवास के लिए पैंतालिस हजार रुपए दिए जाने का प्रावधान है।

ये सारी सुविधा मजदूर वर्ग के लिए ही है लेकिन जागरूकता की कमी से अधिकतर अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में हम सबकी ये जिम्मेदारी है कि हम इन योजनाओं की जानकारी से खुद भी अवगत हों और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करें ताकि आने वाले समय मे फिर किसी कार्ल मार्क्स को मजदूरों के अधिकार के लिए “दुनिया के मजदूरों एक हो” का नारा न देना पड़े। 

(लेखिका बिहार के चरखा पब्लिकेशन की सदस्या हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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