अब बच्चों को नहीं भाते कॉमिक्स के सुपर हीरो 

Divendra SinghDivendra Singh   19 April 2018 12:24 PM GMT

अब बच्चों को नहीं भाते कॉमिक्स के सुपर हीरो कार्टून और मोबाइल के आने से बच्चों का रुझान कम हो गया कॉमिक्स के प्रति।

कभी गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों का मनोरंजन और साथी बनने वाली कॉमिक्स की जगह अब टीवी कार्टून और वीडियो गेम ने ले ली है। कार्टून-वीडियो गेम्स ने कॉमिक्स की दुनिया का जादू कम कर दिया है।

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एक समय ऐसा भी था जब कॉमिक्स और कई बाल पत्रिकाएं बच्चों को सीख देने के साथ उनके मनोरंजन का जरिया हुआ करती थीं। सप्ताह में आने वाली कॉमिक्स का बच्चे बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करते थे और पढ़कर उसके पात्रों की बातें एक-दूसरे को सुनाया करते थे। 80-90 के दशक में पैदा हुए हैं बच्चे तो कॉमिक्स के दीवाने थे, तब उनके लिए यही सुपर हीरो हुआ करते थे। शाहजहांपुर जिले के स्वास्तिक शुक्ला भी कभी कॉमिक्स पढ़ा करते थे। वो बताते हैं, "कभी मैं भी कॉमिक्स का दीवाना था, हर हफ्ते नयी कॉमिक्स का इंतजार रहता था कि कब नयी कॉमिक्स आएगी। लेकिन आजकल के बच्चे तो टीवी और मोबाइल से ही फुर्सत ही नहीं मिलती तो कब कॉमिक्स पढ़ेंगे।"

भारत में कॉमिक्स का प्रकाशन

विदेशी कॉमिक्स पात्रों के हिंदी में अनुवादित प्रकाशन से 1964 में हुई थी। तब 'द फैंटम्स बेल्ट' के नाम से ली फॉक के प्रसिद्ध पात्र फैंटम पर कॉमिक्स का प्रकाशन हुआ था। 1966 में प्रथम हिंदी कॉमिक्स 'बेताल की मेखला' प्रकाशित हुई। कॉमिक्स की दुनिया में 1971 में चाचा चौधरी का पदार्पण हुआ और इसके बाद पिंकी, बिल्लू, रमन जैसे कॉमिक्स किरदारों ने जन्म लिया। यह ऐसे किरदार थे जिन्होंने न सिर्फ बच्चों को अपना दीवाना बनाया बल्कि बड़ी उम्र के लोग भी इन्हें पढ़ते थे।

साथ ही चाचा चौधरी जैसे अक्लमंद किरदार बच्चों के आदर्श थे। डायमंड कॉमिक्स के लंबू-मोटू, चाचा-भतीजा, मामा-भांजा जैसे नायक अस्सी के दशक में भारतीय कॉमिक्स बाजार पर छाए हुए थे। यह कॉमिक्स का ऐसा काल समय था जब हिंदी और अंग्रेजी के अलावा प्रांतीय भाषाओं में भी कॉमिक्स प्रकाशित हुए।

कॉमिक्स एक मूवी टिकट से भी सस्ती मिलती है, इसे आप कहीं भी कभी भी पढ़ सकते हैं। लोग सुपर हीरो पर बनी फिल्में देखने चले जाते हैं, लेकिन कॉमिक्स नहीं पढ़ते हैं। ये भी नहीं है कि कॉमिक्स सिर्फ बच्चों के पढ़ने के लिए है, आजकल की कॉमिक्स तो बच्चे से लेकर चालीस साल के लोग पढ़ सकते हैं।
अनुपम सिन्हा, लेखक, सुपर कमांडो ध्रुव कॉमिक्स

मांग कम होने से कॉमिक्स प्रकाशन बंद होने की कगार पर

1990 के दशक में केबल टीवी के प्रसारण ने कॉमिक्स बाजार को बड़ा झटका दिया और कॉमिक्स के पाठकों की संख्या में काफी गिरावट आई। हालात यह हुए कि सारे कॉमिक्स प्रकाशन बंद होने की कगार पर पहुंच गए। केबल टीवी प्रसारण के बाद तो बच्चों का रुझान टीवी की ओर इतना ज्यादा हुआ कि कार्टून चैनल में इजाफा होता रहा। इन टीवी चैनलों पर पर 24 घंटे कार्टून दिखाए जाते हैं।

आज बच्चे विदेशी कार्टून किरदारों, सुपर हीरो, स्पाइडर मैन, बैटमैन के दीवाने हैं। इन कार्टून किरदारों को दिखाने का मकसद महज बच्चों को हंसाना भर है। शिनचैन, डोरेमोन जैसे प्रसिद्ध कार्टून पात्रों को माता-पिता अधिक पसंद भी नहीं करते क्योंकि इन्हें देखकर बच्चे गुस्सैल और झगड़ालू बन रहे हैं। अब बड़े पर्दे पर भी न सिर्फ कार्टून फिल्में बल्कि थ्री-डी एनिमेटेड फिल्मों का दौर चल पड़ा है। अब तो हॉलीवुड की फिल्में भी हिन्दी में डब होकर रिलीज होती हैं, जो अच्छी कमाई भी करती हैं।

हिट रही चाचा चौधरी-साबू की जोड़ी

चाचा चौधरी और साबू की जोड़ी को हम कैसे भुला सकते हैं। इस कहानी के पात्रों को गढ़ने वाले प्राण कुमार शर्मा को भी शायद इस बात का अंदाजा नहीं था, कि उनके ये पात्र इतने लोकप्रिय हो जाएंगे कि उन पर एक टीवी शो भी बन जाएगा।पांच साल की पिंकी एक ऐसा कॉमिक करेक्टर था, जिसे हर लड़की पसंद करती थी। उसकी कुट-कुट नाम की पालतू गिलहरी और उसके भीखू व चम्पू दोस्त हमें आज भी याद हैं।

लड़कों को बिल्लू का अंदाज बेहद भाता था। उसके बालों के चलते किसी ने बिल्लू की आखों को नहीं देखा, लेकिन बिल्लू की टोली जो मौज-मस्ती करती थी, उसे पढ़कर लड़के बेहद खुश होते थे। बिल्लू के मज़ेदार करनामों को पढऩे के लिए बच्चे अपनी स्कूल की किताबों में बिल्लू की कॉमिक्स छुपा कर पढ़ा करते थे।

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