जन्मदिन विशेष: उर्दू साहित्य के अलमबरदार शायर थे फ़ैज़  

Shefali SrivastavaShefali Srivastava   13 Feb 2017 12:55 PM GMT

जन्मदिन विशेष: उर्दू साहित्य के अलमबरदार             शायर थे फ़ैज़  आज पाकिस्तान के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्मदिन है

लखनऊ। वह 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय भयानक दंगों के बाद की शांति थी। अब लेखकों ने अपनी कलम उठा ली थी। वे सभी इस घटना को अपने-अपने शब्दों में लिखना चाहते थे। काफी साल बाद उन्हें अंग्रेजों से मुक्ति मिली थी, उनके पास अपनी धरती पर सांस लेने की आज़ादी थी, वहीं बंटवारे के बाद अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से बिछड़ जाने का गम भी।

ऐसे में पाकिस्तान के सबसे बेहतरीन शायर कहे जाने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने एक नज़्म लिखी-

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर

वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर

चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं

फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल

कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल

कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल

आज फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्मदिन है जिनकी क्रांतिकारी रचनाओं में इंकलाबी और रूमानी मेल चर्चित था। ये वहीं शायर हैं जिनकी रचनाओं को आज सोशल मीडिया में शेयर करके या स्टेटय पोस्ट करके युवा उर्दू शायरी के प्रति अपनी समझ को दिखा रहे हैं। ये वही शायर हैं जिनकी नज़्में ‘गुलों में रंग भरे’ और ‘दर्द की रात ढल चली है’ आज के समय के दो मशहूर फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज और करण जौहर अपनी फिल्मों में इस्तेमाल करते हैं।

उनके द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियां अब भारत-पाकिस्तान की आम-भाषा का हिस्सा बन चुकी हैं, जैसे कि ‘और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’ या ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे।’

भगत सिंह से प्रभावित थे फ़ैज़

13 फरवरी 1911 को अविभाजित भारत के सियालकोट में जन्मे फ़ैज़ विभाजन के बाद पाकिस्तान ज़रूर चले गए लेकिन भारत को दिल से कभी निकाल नहीं पाए। वह भगत सिंह से बहुत प्रभावित थे। लाहौर में सांडर्स की हत्या के लिए भगत सिंह और साथियों की पिस्तौल से चली गोली की आवाज़ सुनने वालों और फिर भागते क्रांतिकारियों को देखने वालों में से एक फ़ैज़ भी थे। अपने हॉस्टल की छत पर टहलते हुए अचानक ही इस ऐतिहासिक पल के वे साक्षी बने थे। बिना किसी परवाह के फ़ैज़ के लिए धरती पर सबसे ज्यादा पसंदीदा और प्रभावित करने वाला नाम भगत सिंह बने रहे और फिर दक्षिण एशिया क्या, दुनिया के तमाम कोनों में फ़ैज़ कभी मर्ज़ी से, कभी मजबूरी में पहुंचे।

आज के दौर के लगते हैं फ़ैज़

फ़ैज़ के जन्मदिन पर उनको याद करते हुए मध्य प्रदेश के मशहूूर शायर आलोक श्रीवास्तव बताते हैं, ‘जिन शायरों को मैंने बहुत शिद्दत से या सबक की तरह पढ़ा उनमें फैज भी हैं। मेरी कुछ गजलें फ़ैज़ को खेराज-ए-अकीदत (बड़े-बुज़ुर्ग के प्रति श्रद्धा अर्पित करना) की तरह हैं। मुझे ग़ालिब को पढ़ना भी अच्छा लगता है उनकी जमीं पर गाई हुईं कई ग़ज़लें मकबूल हुईं। इसी तरह मैंने खुसरो और फ़ैज़ की जमीं पर मैंने कई ग़ज़लें कहीं और ये करते-करते मैं समकालीन शायर बना। मुझे फ़ैज़ की कई ग़ज़लें कंठस्थ हैं जैसे-

‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

गुलों में रंगे भरे बाद-ए-नौबहार चले’

इसकी जमीन पर जब मैंने गजल कही- ‘हर एक सांस में लेकर तुम्हारा प्यार चले, दिलों को जीतने आए थे खुद को हार चले’, तो वह भी बेहद मकबूल हुईं। आलोक कहते हैं कि मैं आज का कवि हूं, मेरी उम्र 40-45 की है लेकिन फैज़ मुझे मेरे अपने दौर के लगते हैं। जैसे उनकी ग़ज़ल, ‘कुछ इश्क किया कुछ नाम किया’ आज भी लोग बात-बात पर बोलते हैं। आज फ़ैज़ हमारे बीच नहीं है लेकिन लोग उन्हें पढ़ते हैं और उनकी नज़्में लिखते हैं। इसी तरह ग़ालिब भी थे। इसका एक उदाहरण है जैसे जब कोई आपको तवज्जो न दे तो ग़ालिब का एक ही शेर याद आता है,

‘हमने माना के तगाफुल न करोगे लेकिन

खाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक।

ग़ालिब सत्रहवीं शताब्दी में हुए थे और आज चार शताब्दी बाद भी यादगार हैं।

साहित्य, संगीत, संस्कृति हमारी माएं हैं इनसे अलग नहीं हो सकते

आलोक बताते हैं फ़ैज़ एक क्रांतिकारी शायर थे। उर्दू साहित्य में जो भी बदलाव हुए जैसे हुकूब यानी अधिकारों के लिए, मानवीयता, धर्मनिरेक्षता के लिए जो भी आंदोलन हुए उनमें फैज अलमबरदार कवि थे। अलमबरदार यानी झंडा लेकर आगे चलने वाले। फिल्मों में पुराने शायर और कवियों की रचनाओं के चलन पर आलोक कहते हैं, ‘हम (भारतवासी) भावुक लोग हैं, हम अपनी जड़ों से आसानी से अलग नहीं हो सकते। आज भी जब लता, रफी या किशोर के गाने आते हैं तो आप वॉल्यूम को अपने आप बढ़ा देते हैं या कुछ सेकंड या मिनट के लिए काम रोक देते हैं। इसी तरह कविताओं का भी है। जिस तरह हम अपनी मां से अलग नहीं हो सकते उसी तरह इनसे भी अलग नहीं हो सकते। साहित्य, संगीत, संस्कृति हमारी माएं हैं। उनके हिसाब से ही हम खुद को ढालते हैं। आज सोशल मीडिया को एक घंटे चलाएंगे तो 20 मिनट का कंटेंट आपको पोयट्री का मिलेगा। कई रिपोर्टर पीटीसी में भी एक शेर पढ़कर शुरुआत करते हैं। हमारी मिट्टी में है ये। हम इनसे दूर नहीं जा सकते।

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