अनुभव सिन्हा: कोई नहीं चाहता था कि मैं 'मुल्क' बनाऊं

'तुम बिन', 'रॉ-वन' और 'मुल्क' जैसी बॉलीवुड फिल्मों के डायरेक्टर अनुभव सिन्हा 'The Slow Interview with Neelesh Misra' के नए एपिसोड में नज़र आए। आइए जानते हैं इस इंटव्यू में कैसे थे सवाल और क्या थे उनके जवाब।


नीलेश :- क्या है, स्टेट ऑफ माइंड ज़िन्दगी के इस मुक़ाम पे?

अनुभव :- वो किसी गाँव जैसा है, स्लो,शान्त ,फैलता हुआ, दूर तक दिखता हुआ।

नीलेश :- अम्म्म् , उम्र जैसे बढ़ती है पर्सपेक्टिव चेंज हो जाता है और जो चीज़ें पहले बहुत महत्वपूर्ण लगती थीं,नहीं लगती हैं! ऐसा हो रहा है आपके साथ??

अनुभव:- हाँ ,, दस साल से हो रहा है।

नीलेश :- किस तरह से?

अनुभव :- कि..अब ऐसा मन होता है कि बम्बई के बाहर भी एक ठिया हो ,जहाँ पर वक्त बिताया जाये। तो,वो जो एक आपाधापी है ,वो जो एक नोंच-खसोट है,सबसे ऊँचे प्लेटफॉर्म पर खड़े होने की एक जो लड़ाई है वो ख़त्म नहीं है, लेकिन उसको लेकर के एक हिंसा ख़त्म हो गयी है दिमाग से।

सो वो एक बहुत बड़ा परिवर्तन है,कि- आप अपना काम करते रहिये ,अच्छा काम करते रहिये...प्लेटफॉर्म तो बनते रहेंगे।




नीलेश :- इट्स अ स्लाइट सेंस ऑफ गुड डिटैचमेंट।

अनुभव :- हाँ , इट्स एक्चुअली नॉट ईवन डिटैचमेंट! इट इज़् दि एविलिटी टू स्टेप बैक जस्ट ए बिट। जस्ट आउटसाइड ऑफ दि ऑर्बिट एंड सी इट। सो यू स्टिल नॉट आउटसाइड ऑफ दि ऑर्बिट, यू स्टिल प्लेइंग दि सेम गेम बट यू आर नॉट बीइंग हसल्ड ओवर यू आर नॉट बीइंग पुश्ड अराउंड। यू प्लेइंग योर ओन गेम इन योर स्पेस। सो यू आर एक्चुअली बिटवीन टू ऑर्बिट्स दि वायलेंट ऑर्बिट एंड दि एब्सॉल्यूटली डिटैच्ड मेडिटेटिव ऑर्बिट। बीच में कहीं हैं।

( बीच में मुख्य बात से हटकर अनुभव जी -- ख़ाना बड़ा अच्छा खिलाया इन्होंने )

नीलेश :- पहले कैसे थे आप?

अनुभव :- इक ये भी बड़ा अच्छा ....भई ये मुझसे पूछते रहते हैं लोग कि- कैसे? चेंज कैसे आया तुम्हारे करीयर में ,द काइंड ऑफ फिल्म्स यू आर मेकिंग?

तो सफलता की परिभाषा भी एक चेंज हुई। पहले सफलता की परिभाषा ये थी कि- मेरी पिक्चर ज्यादा बड़ी है कि- संजय गुप्ता की ,या मेरी पिक्चर ज्यादा बड़ी है कि रोहित शेट्टी की?

अब परिभाषा सफलता की ये है कि- ये फिल्म बनाने में मुझे कितनी ख़ुशी हो रही है ,कितना मज़ा आ रहा है।

एट द सेम टाइम उसी संजय गुप्ता और उसी रोहित शेट्टी की सफलता से भी मुझे ख़ुशी होती है।

तो ये फ़र्क है स्टेट ऑफ माइंड में। पहले ये होता था कि- किसकी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा बड़ा किया! किसकी फिल्म में ज्यादा बड़ा सुपरस्टार है ,किसकी फिल्म ज्यादा प्रिंट से ओपन होगी?

नीलेश :- जलन होती थी?

अनुभव :- हाँ ,उसको जलन भी कह सकते हैं। जलन एक्चुअली मुझे उस समय इन लोगों से जलन नहीं,इन लोगों से तो कॉम्पटीशन था।

मेरी जलन थी अनुराग कश्यप से, तिग्मांशू धुलिया से,विशाल भारद्वाज से ,हंसल से ,,ऑफ लेट ,,जलन के लोग ये थे। उनसे तो मैं कॉम्पटीशन में था। मतलब कभी हार रहा था कभी जीत रहा था ,उनसे जलन नहीं थी।

नीलेश :- क्या आपको लगता कि आप और संवेदनशील हुये हैं , एम्पथेटिक हुये हैं ,सेंसटिव हुये हैं?

लोगों के लिये?

अनुभव :- हाँ ,,वो क्या होता है ,जैसे ही आप उस हिंसा की ऑर्बिट से बाहर निकलते हैं ना! तो आपको समाज दिखने लगता है। (जी..हम्म)

उस हिंसा की ऑर्बिट में आप सिर्फ़ अपने आपको देखते हैं , आप उसको देखते हैं जो आपसे ठीक आगे है और जो आपसे ठीक पीछे है। और वो एक अंधी दौड़ है। जैसे ही आप उससे बाहर निकलते हैं,आपको समाज दिखने लगता है ,फिर आपको अपनी गाड़ी से फुटपाथ पे सोते हुये लोग भी नज़र आने लगते हैं ,जिसमें से एक का हाथ बाहर लटका होता है।

वर्ना आप उस वक़्त व्हाट्सएप पर होते हैं,तो आपको वो आदमी दिखता नहीं!(बिलकुल)

फिर आप ये सवाल पूछते हैं कि यार ये आदमी यहाँ क्यू्ँ लेटा है?

बम्बई शहर में इतने सारे लोग क्यूँ बाहर से आते हैं ,इतनी निम्नस्तर की ज़िन्दगी जीने के लिये ,कि- सोने की जगह नहीं, ख़ाने की जगह नहीं,बाथरूम की जगह नहीं! पर वो आके ऑटो चलाते हैं, हमलोगों से गालियाँ सुनते हैं ,वॉचमैन बन जाते हैं ,दिन की शिफ़्ट एक सोसायटी में ,रात की शिफ़्ट एक सोसायटी में। फिर वो समाज दिखना शुरू हो जाता है।

और वो बहुत जरूरी है कि आपको अपना समाज...मुसलसल दिखता रहे। हालांकि वो तकलीफ़देह भी है।

फिर ख़्वामख़ाह की चीज़ों में आपका वक़्त भी जाता है आपका अटेंशन भी जाता है।

और मुझे लगता है कि- वो प्रिविलेज्ड लोग जो हैं,जिनको ज़िन्दगी में पढ़ने-लिखने का मौका मिला,दुनिया देखने का मौका मिला ...आपके मेरे जैसे लोग। (जी)

ये हम लोग की ज़िम्मेदारी है कि- हम हमारे समाज को भी मुड़-मुड़ के देखते रहें। (बिलकुल-बिलकुल)





नीलेश :- तो मुझे वापस ले चलिये अलाहाबाद जहाँ आपका जन्म हुआ।

अनुभव :- 'अलाहाबाद में कमला नेहरू हॉस्पिटल' में जन्म हुआ ,उसकी मुझे कोई याद नहीं है ज़ाहिर है। नौ महीने का था तो पिताजी का ट्राँसफर हो गया 'दिकाला'गढ़वाल के पास एक जगह है कालागढ़ वहाँ एक टेम्परेरी कॉलोनी बनी थी,डैम बन रहा था जब।

नीलेश :- पिताजी का क्या एरिया ऑफ वर्क रहा है?

अनुभव :- पिताजी फाइनेंस और अकाउंट्स में थे। (अच्छा) जो कायस्थ लोग होते हैं ना ,,यमराज के अकाउंटेंट!

उसके बाद सिक्स क्लास में अलाहाबाद आ गये। एक साल वहाँ पढ़ा फिर सेवेंथ क्लास से ... व्हिच वुड बी 76,सेवेंटी सिक्स से हम लोग बनारस चले गये। वो सारी जो मेरी ग्रोइंग अप की मैमोरीज् हैं ,जो सारे एक्विजिशन हैं आदतों के,स्वभाव के वो सारे बनारस में हुये और फिर उसके बाद मैं अलीगढ़ पढ़ने गया।

नीलेश :- ए. एम.यू. में क्या-क्या पढ़ा आपने?

अनुभव :- इंजीनियरिंग करी ना! मैकेनिकल इंजीनियरिंग।

नीलेश :- इंजीनियरिंग... ओके।

अनुभव :- वो हाईस्कूल- इलेवेंथ के आसपास हर बाप की तमन्ना होती है कि- बेटा या तो डॉक्टर बन जाये या इंजीनियर ,,तो हमको खून से डर लगता था ,तो हम इंजीनियर बनने चले गये। एक्ज़ाम-उग्ज़ाम दिया, पास हो गये।

नीलेश :- मैं ना बड़ी चालाकी से बचा इस चीज़ से ,,तो क्योंकि मुझे पिताजी डॉक्टर बनाना चाहते थे। तो क्लास इलेवन में यहाँ मानरो वॉयज़ करके स्कूल है वहाँ दाखिला लिया और बॉयोलॉजी ली और बहुत डर लगता था खून से और मेंढ़क काटने से तो जब पहली पेरेंट-टीचर मीटिंग हुई तो मिसेज मिश्रा हमारी क्लास टीचर थीं ,वो बैठी हैं पापा बैठे हैं और मैंने पहले कुछ मिनटों में बम फोड़ दिया कि मैम मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं! इन्होंने तो मुझे यहाँ पे जबर्दस्ती करवाया है।

लंबी ख़ामोशी ......कुछ समझ नहीं आया कहें क्या? दो साल बचे हैं इलेवेंथ और ट्वेल्थ के।

अरे बेटा ...!

ख़ैर बाहर निकले तब तक पिताजी ने अपनी चाल सोच ली थी बोले यार ऐसा करते हैं एक शर्त लगाते हैं ,अगर तुम्हाई फर्स्ट डिविजन आई तो जो तुम चाहोगे, वो होगा वर्ना जो मैं चाहूँगा, वो होगा।

ये बहुत ही चतुराईपूर्ण उनकी स्ट्रैटजी थी जो उन्होंने उतनी देर में सोच ली थी। क्योंकि यूपी बोर्ड जो बहुत टफ़ है उसमें यानि कि -उनने इंश्योर कर लिया कि अगले दो साल मैं ख़ूब पढूँगा। ख़ैर मैंने पढ़ा और जीता में शर्त और उन्होंने भी मान रखा। फिर मैंने आर्ट्स चुनी और नैनीताल में हिस्ट्री, पोलिटिकल साइंस और लिट्रेचर ली और फिर ज़िन्दगी की दिशा बदल गयी तो मैंने थोड़ा सा ......

अनुभव :- नहीं , मैं इतना समझदार नहीं था।

तो हमने इंजीनियरिंग करने के बाद एक साल नौकरी की। वो नौकरी में जब लगातार अपना जीवन शुरू हुआ ना ...तो लगातार ये अहसास होता रहा कि ये नहीं करना है।




नीलेश :- किस शहर में नौकरी कर रहे थे आप?

अनुभव :- फरीदाबाद में।

उसके पहले मेरा एयरफोर्स में सिलेक्शन हुआ था ,तो वो मैंने ज्वाइन नहीं किया।

नीलेश :- अच्छा,,क्यूँ?

अनुभव :- मुझे ना वो जीवन पसंद नहीं था जिसमें आज से इक्कीस साल बाद कहाँ होऊँगा मैं,,मुझे पता हो। तो सम हाउ पिताजी मान गये। पिताजी एक्चुअली मेरे ,,,आज देखता हूँ मुड़ के तो..बड़े बहादुर आदमी हैं। तो हमने कहा ठीक है,तो एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लग गया। सरकारी नौकरी नहीं करनी थी मुझे ये मुझे पक्का पता था।

नीलेश :- बहादुर क्यों कहा आपने?

अनुभव :- क्यों कि मान गये वो। एयरफोर्स की नौकरी थी ,इतनी प्रेस्टीजियस नौकरी थी कि जिसदिन मैं ज्वाइन करता उस दिन मुझे फोर्थ इयर और फिफ्थ ईयर इंजीनियरिंग की सैलरी मिलती।

तो पहले दिन जब आप जॉब करने जाते तो आपके अकाउंट में पता नहीं कितना पर जो भी पैसा था वो होता। दो ढ़ाई लाख़ रुपया, पाँच लाख रुपया उस जमाने में बड़ी बात थी। तोवो मान गये। यहाँ आके फिर मैंने एक साल इंजीनियरिंग की नौकरी करने के बाद फिर एक हाथ छोड़ दी नोकरी।

घर पे बताया नहीं ,दिल्ली में था मैं।

और मैं भटक रहा था कि- क्या करने में मुझे ख़ुशी मिलती है। तो एक साल करीब मुझे लगा- ये पता करने को कि मुझे फिल्में बनानी हैं। फिर जाके मैंने घर पे बताया जाके बनारस में कि- मैं एक साल से नौकरी नहीं कर रहा हूँ और मेरा इरादा ये है।

तो पिताजी ने फ़ौरन कह दिया कि ठीक है जाओ। मैंने कहा मैं मुम्बई जाना चाहता हूँ। माँ थोड़ी रातभर सल्क करती रही। अगले दिन सुबह वो भी मान गयी। तो इसलिए बहादुर बोलता हूँ मैं।

उस ज़माने मेंबहादुर नहीं लगा ,,उस समय ऐसा लगा कि- परमिशन दे दी।

ये बहुत बड़ा फैसला था। फैल भी सकते थे वो पर नहीं फैले।

अभी ये जब मुल्क के लिये बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड मिला,अम्म्म् स्टार स्क्रीन अवॉर्ड तो वो जाके ट्रॉफीमैंने पिताजी के हाथ में रखी ,तो मैंने कहा आज आपका फैसला सही साबित हो गया,,, इस साल की सबसे अच्छी पिक्चर मैंंने बनाई है ऐसा लोग कह रहे हैं।

तो ये है बाकी फिल्म की यात्रा तो आप जानते ही.हैं। टीवी है बहुत सारा ,म्यूजिक वीडियोज़् है।

नीलेश :- तो कैसा था? थोड़ा मासूम रहा होगा,थोड़ा डर होगा बड़ी चीज़ करने में?

अनुभव :- नहीं...!

डरता नहीं मैं कभी किसी से। जब भी पीछे मुड के देखता हूँ तो देखा है मैंने बहुत सारे पंगे ऐसे किये हैं जीवन में,जिसमें कायदे से डरना चाहिये था। लेकिन मैं डरा नहीं हूँ कभी।

जैसे सी-हॉक्स कर रहा था ,72 एपीसोड किये सुपर सक्सैसफुल। फिर कुछ मेरा डिफरेंस ऑफ ओपीनियन हो गया। ज़रीना से ,तो मैंने छोड़ दिया शो।

उसके बाद म्यूजिक वीडियोज़् करने लग गया।




नीलेश :- वो भी एक नया अध्याय, नॉन फिल्म का गोल्डन एरा! उस वक़्त के बारे में बताइये थोड़ा?

अनुभव :- हाँ...मेरा बड़ा मन था कि मुझे गाने शूट करने में

कुछ नहीं ,,मुझे लगता था कि गाना शूट करना है मुझे। तो एक म्यूजिक कंपनी थी 'मैग्नासाउंड' ,,फिर एक दिन मुझे फोन आया उनके यहाँ से ,,मुझे एक गाना दिया सोनू निगम का और मुझे बोले इसका कॉन्सेप्ट बना के लाओ।

तो मैंने उनको कॉन्सेप्ट बना के दो पेज़ पे लिख के उनको दे दिया ,तो सोनू से मीटिंग हुई तो सोनू ने कहा चलिये करते हैं साथ में फिर वो वीडियो बनाया मैंने जिसमें काफी सारे विजुअल इफेक्ट्स थे लेकिन वो अच्छे से नहीं हुये तो मैं बड़ा दुखी था ,मुझे लगा इसके बाद मुझे कोई वीडियो देगा नहीं।

तो वो जिस दिन टेलीकास्ट हुआ तो पूरा हिन्दुस्तान ही पागल हो गया।

नीलेश :- कौन सा वाला था? दीवाना?

अनुभव :- तू....विपाशा।

उसके बाद हर म्यूजिक कंपनी को मेरे साथ वीडियो बनाना था। तो फिर वो एक सिलसिला शुरू हुआ ,फिर वो अपनी एक जगह बनी। मुझे म्यूजिक वीडियो मुग़ल और पता नहीं क्या-क्या बोला गया। तो वो चला दो-ढ़ाई साल और उससे फिर ऊब गया मैं।

क्योंकि गाने सेम हो गये थे।और उसी बीच में भूषण का एक वीडियो शूट कर रहा था मैं बे-मन से! तो भूषण का ही फोन आया कि- पिक्चर बनाओगे आप?

मैंने कहा पिक्चर ही बनाने आया था बॉम्बे। तो बोले- कहानी है कोई?

मैंने कहा हाँ है।

तो भूषण वाज़् इन देहली दैट डे..तो एक दो दिन बाद आये मैंने कहानी सुनाई, तो बोले चलो पिक्चर बनाते हैं ये।

अच्छा भूषण का पर्सपेक्टिव ये था कि पिक्चर में सात-आठ,दस-बारह गाने होने चाहिये। उनका में ज्यादा कोई ऐसा वो नहीं था ,और मेरा ये था कि- मुझे मेरी पिक्चर बनाने मिल जाये तो वो फिर ...'तुम बिन'बनी ,बहुत पसंद की गयी। बड़ा मज़ा आया मुझे।

अपनी पिक्चर का रिव्यू कभी देखा नहीं था और उस वक़्त सबसे बड़े क्रिटिक थे 'ख़ालिद मोहम्मद' टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखते थे। तो आई वाज़् वेटिंग कि ख़ालिद का रिव्यू कैसा होगा। तो मुझे याद है मैं सुबह-सुबह हॉलीडे-इन गया ,वहाँ पर सबसे पहले अखबार आता था,,कोई साढ़े तीन-चार बजे। अखबार खोला तो...दो पिक्चरें रिलीज़ हुईं थीं- एक थी अक्श और एक तुम बिन।

अक़्श जिसमें बच्चन साहब और मनोज भी थे,राकेश मेहरा की फिल्म ,तो अक़्श का रिव्यू बहुत अच्छा था। और मेरे रिव्यू का टाइटल था तुम थिन! उसकी स्टोरी लाइन बहुत थिन है ये उनका आकलन था।तो ज़ाहिर है वो मुझे पसंद नहीं आया बट लोगों को वो फिल्म बहुत पसंद आई। म्यूजिक ये और वो ,हालांकि ख़ालिद की कहानी वहाँ से शुरू होती है फिर वो अभी चार-पाँच महीने पहले खत्म होती है वो 2001 से लेकर 2018 में। एकदिनमैं बैठा हुआ था मुल्क़ रिलीज़ हो गयी थी और ख़ालिद का फोन आया मुझे हाय अनुभव ,माई नेम इज़् ख़ालिद मोहम्मद!

तो मैंने कहा इज़् दैट ' दि ख़ालिद मोहम्मद '?

ही स्टार्टेड लाफिंग...ही सैड ..हाँ।

तो ही प्रेज़्ड द फिल्म बहुत तारीफ़ की मुझसे। तो मैंने कहा एक सर्किल पूरा हुआ ये।

एक्चुअली मैं जबसे फिल्ममेकर बनने चला था तो मुझे ये बड़ा ,मेरे को ऐसा लगता था कि मैं ....

एक बड़ी इंट्रेस्टिंग कहानी है जो हमलोगों को मालूम है। पहली या दूसरी रात थी शायद बम्बई में और मैं बम्बई में सिर्फ़ एक आदमी को जानता था वीरेन्द्र सक्सेना को। वीरेन्द्र सक्सेना दि एक्टर।

तो वीरू दा एक -दो दिन के अंदर ही मुझे रात को बोले- चल-चल लेख जी के यहाँ चलते हैं ,लेख टंडन के यहाँ। तो मुझे लेख जी के यहाँ ले गये उनको वैसे ही अपना कुछ काम था तो आई गॉट टू बी इन गुड कंपनी , मैं बैठा रहा तो लेख जी ने थोड़ी बहुत मुझसे भी बातचीत की। उन्होंने मुझसे पुछा कि -कैसी फिल्में बनाना चाहते हो? तो ये एक बहुत डिफाइनिंग कन्वर्सेशन है ,ये दिसंबर 1990 का कन्वर्सेशन है। और ये ठहरा हुआ है मेरे साथ आज तक ,और ये शायद ये कन्वर्सेशन खत्म होगा मेरे करियर के खत्म होने के साथ।

कैसी फिल्में बनाना चाहते हो?

मैंने कहा पता नहीं सर ,जब बनाने को मिलेगी मैं क्या बनाऊँगा मुझे पता नहीं। आज दे दीजिये बनाने को तो पॉलीटिकल फिल्म बनाऊँगा।

तो वो बोले आप कभी डायरेक्टर नहीं बन सकते!

मैंने कहा -क्यों सर?

आप सोचिये बम्बई आये हुये दो दिन हुये हैं। इंजीनियरिंग का पूरा सब छोड़छाड़ कर आया हूँ ,और एक आदमी जिसका मैं सम्मान करता हूँ एक डायरेक्टर.... उसने ऐसा बोल दिया आप डायरेक्टर नहीं बन सकते।

मैंने कहा क्यों सर? मैं एक्चुअली डर गया मैं डिफाइंड नहीं था।

बोले आपको पता ही नहीं कि- आपको क्या करना है? डायरेक्टर को मालूम होना चाहिये उसे क्या करना है।

तो ये बात रुक गयी मेरे साथ और मुझे लग रहा था कि- वो गलत कह रहे हैं ,,,लेकिन वो लेख टंडन थे ,तो मुझसे तो ज्यादा ही जानते थे। और मुझे आज तक पता नहीं है कि वो सही कह रहे थे कि गलत कह रहे थे। मुझे आज तक नहीं पता है।

तो इवेन्चुअली मैंने पॉलीटिकल फिल्म बनाई। और बना रहा हूँ ,फिर तीसरी भी बनाऊँगा। पता नहीं कब क्या बनाऊँगा। पर मेरे करियर में एक चीज़ नोटिस की मैंने कि- मैं एक जगह रुका नहीं। मैंने लवस्टोरी बनाई फिर एक रोमांटिक कॉमेडी बनाई,फिर एक्शन बना दिया, फिर एक केपर बना दिया-कैश ,फिर शाहरुख खान के साथ सुपरहीरो बना दिया ,फिर मुल्क़ बना दी,तो हांलाकि मैं ये काम पहले भी कर रहा था कि- अलग-अलग प्रकार की फिल्में बना रहा था ,लेकिन कभी किसी ने नोटिस नहीं किया इस बात को।

जैसे ही मैंने मुल्क़ बनाई सबको वो वर्सेटिलिटी नज़र आ गयी अचानक जाने कहाँ से कि -आप हमेशा अलग-अलग तरह की फिल्में बनाते हैं। तो मेरा ये कन्वर्सेशन लेख जी से आजतक चल रहा है। वो कन्वर्सेशन खत्म नहीं हुआ है। मुझे पता नहीं मैं डायरेक्टर बना कि नहीं बना?

मतलब फिल्में तो मैं बनाता हूँ लेकिन वो डायरेक्टर जिसको इतिहास में कोई जगह मिलेगी वो मुझे पता नहीं कि- मैं हूँ,होऊगा या नहीं। लगा हुआ हूँ कोशिश में अच्छा करूँ कुछ अच्छा करूँ। और ये मेरी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ है ,मैं इतना हम्बल आदमी नहीं हूँ।




नीलेश :- मैं ये पूछने वाला था कि- क्या आप हैं हम्बल?

अनुभव :- नहीं मैं बहुत पॉम्पस हूँ।

मैं पॉम्पस हूँ मेरी पॉसिबिलिटी को लेकर के। मतलब में लोगों से बदतमीज नहीं हूँ ,मैं ज़िन्दगी से बदतमीज नहीं हूँ मैं बहुत ग्रेटफुल हूँ जिंदगी से अपने दोस्तों से। लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ इसको लूकर बहुत पॉम्पस हूँ।एटलीस्ट अपने अंदर।तो ये मैं बिना किसी ह्यूमिलिटी के बोल रहा हूँ कि .. और ये मेरी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ है कि मैं ये ह्यूमिलिटी मेंटेन कर पाता हूँ। आप मेरी कितनी भी तारिफ कर लीजिये मुल्क में मुझे कितने भी अवॉर्ड दे दीजिये ,मैं ये नहीं मानूँगा कि मैं डायरेक्टर बन गया। मैं ये मानूँगा कि ...मैंने एक अच्छी पिक्चर बनाई शायद ,जो सबको अच्छी लगी ,अब ये नयी पिक्चर है। इसके बाद फिर एक नयी पिक्चर है। तो ये मेरी स्ट्रेंथ है।

और आई टेक प्राइड इन इट,इसम़े मुझे कोई एफ़र्ट नहीं करना पड़ता।

नीलेश :- हाँ,क्यूँ कि बम्बई एक ऐसा शहर है जो- फिल्म की दुनिया है वहाँ पर कि यू केन ईजीली गेट कैरीड अवे एंड स्टार्ट टेकिंग योरसेल्फ टू सीरियसली।

अनुभव :- बोला ना ,,तुम बिन के बाद पागल हो गया था। हर हीरो को मेरे साथ काम करना था ,हर प्रोड्यूसर को मेरे साथ काम करना था।

नीलेश :- कुछ आदतें बदलीं थीं?

अनुभव :- ऑफ्कोर्स! बदली होंगी।

अब आप सोचो ना..मैंने बताया तो पूरी यात्रा कालागढ़,अलाहाबाद, बनारस,अलीगढ़ ,मिडिल क्लास पिताजी कुछ बारह-चौदह हजार पर रिटायर हुये थे। उस लड़के को अचानक वो सारे लोग जिनके उसने टिकट लाइनों में लग-लग के लिये हैं,वो अचानक भाव देने लग गये। तो हिल ही जायेगा ना आदमी ,हिल ही जायेगा।

मतलब दस का जो सैटअप था वो आसान सैटअप थोड़ी था! चार इतने बड़े-बड़े हीरो थे उसमें कम से कम तीन तो बड़े थे ,ज़ायिद बड़ा हो रहा था ,तो कौन बना रहा था उस समय उतनी बड़ी पिक्चरें और एक आउटसाइडर जिसका कोई लेना एक न देना दो।एक फोन नंबर लेके पहुँचा था वीरेन्द्र सक्सेना का।

एक बड़ी कमाल की घटना है विशाल वाज़् सपोज्ड़ टु कम्पोज़ द म्यूजिक ऑफ श़िकस्त।

पर विशाल कुछ बीमार पड़ गया उस समय और प्रोड्यूसर मेरे जो थे उनसे कुछ सौदा-औदा नहीं पटा ,कुछ हुआ तो विशाल ने नहीं किया वो। हांलाकि उस शो के लिये मुझे गुलज़ार साहब ने एक नज़्म गिफ्ट की थी। तो मुझे उसके टाइटल सीक्वेंस में गुलज़ार साहब की एक नज़्म चाहिये थी तो विशाल जानता था उनको ,तो विशाल दोस्त था मेरा। जब मैंने विशाल से कहा- यार भाई से बात करो तो मैं ,रेखा और विशाल हम गये गुलज़ार भाई के घर ,,तो मैं पायलट बनाने जा रहा था एंड आई वांटेड टू यूज दैट नज़्म टू रिसाइटेड बाई नसीर भाई। नसीर भाई हमारी सरपरस्ती करते थे ,हमें कोई राय-वाय चहिये होती थी तो हम उनके पास चले जाते थे। शूटिंग पे चाय पिला देते थे,खाना खिला देते थे। तो गुलज़ार भाई के पास गये तो गुलज़ार भाई ने कहा कि- आप पहले पायलट बनाईये ,पहले मैं देखूँगा और फिर डिसाइड करूँगा कि- मैं आपको दूँगा कि नहीं। (वो ऑलरेडी श़ाया नज़्म थी ) पैसे-वैसे की बात बाद में करेंगे। फिर मैंने पायलट बना लिया फिर मैं नसीर भाई के पास गया और कहा- कि नसीर भाई पहले डब कर दो। तो वो बोले कि- गुलजार भाई से बात हो गयी?

मैंने कहा नहीं हुई उन्होंने ये कहा है। तो उन्होंने कहा-ठीक है। तो नसीर भाई आये स्टूडियो तो वो नज़्म उन्होंने रिसाइट की। और फिर विशाल ,मैं और रेखा गये उनको दिखाने ,तो गुलज़ार भाई के बंगले पे नीचे मैं और रेखा बैठे और गुलज़ार भाई और विशाल गये ऊपर पायलट देखने। उन्होंने कुछ कयानी के बिस्किट मंगाये थे पूना से ,तो वो मेरे को और रेखा को मिले। मैं और रेखा बात करते रहे बैठ के। फिर वो पच्चीस मिनिट बाद देख के नीचे आये। उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा भई ये आपकी स्ट्रगल है और आपकी इस स्ट्रगल में मेरा ये कॉन्ट्रीब्यूशन है ,तो वो नज़म मुझे गिफ़्ट मिली।

नीलेश :- (वाह वाह वाह )

अनुभव :- अब ये कहानी मैंने क्यों बताई? कुछ और बता रहा था मैं।

नीलेश :- शाहरुख खान के साथ काम करना कैसा था?

अनुभव :- शाहरुख को मैं बोलता था हमेशा -जब मैं फिल्म बना रहा था ना -कि मेरी लिये रा-वन से बड़ी घटना ये है कि मैं तुमको जान पाया। मैंने शाहरुख जैसा इंसान नहीं देखा लाइफ में,अगर किसी स्टार को सबसे निकट जानता हूँ तो वो है।पर मेरे लिये ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है कि मैं उसको जानता रहूँ ,बहुत सीखने मिलता है मुझे उससे ,बहुत कुछ सीखता हूँ।

नीलेश :- जैसे?

अनुभव :- बहुत कुछ सीखता हूँ। अम्म्म् बिलीफ़,हार्डवर्क।

मैं जब तक शाहरुख को मिला नहीं था तब तक मुझे लगता था दुनिया का सबसे हार्डवर्किंग आदमी मैं हूँ। फिर वो मिला तो लगा मुझे अरे बाप रे बाप! ये तो बाप है मेरा।

शिवलरी उसको पता नहीं है ,,मैंने चुराई है उससे। बहुत शिवलरस आदमी है ,लोगों का ख़्याल रखना,लोगों को खाना पूछना,पानी पूछना,गाड़ी तक छोडकर आना,दरवाजा खोलना गाड़ी का,बिठा के दरवाजा बंद करना।

वो अलग लैवल है और रिलेंन्टलैसनैसउसकी जो है,वो आउटस्टैंडिंग है। सो अगर मैं जीवन में कभी भी दोबारा शाहरुख के साथ फिल्म ना बनाऊँ तो मुझे कोई मलाल नहीं ,,एज़् लांग एज़् आई कंटीन्यू टू नो हिम।

तो रॉवन तो चली जो हुआ सो हुआ,शाहरुख के लिए भी नयी चीज़ थी,मेरे लिए भी नयी चीज़ थी और उसमें हमारे रिश्तों में जो ऊँच नीच जो थी रही। वो हर फिल्म में होती है।

नीलेश :- ऐसा होता है जब फिल्म का जिस दिन आउटकम आता है उस दिन डायरेक्टर, एक्टर... इन जनरल ब्लेम गेम?

अनुभव :- बिल्कुल होता है ,ऑफ्कोर्स होता है बिखर जाते हैं रिश्ते! फिल्म नहीं चलती है या फिल्म अच्छी नहीं बनती है ,तो लोग बिखर जाते हैं ,और अगर अच्छा होता है तो सब लोग जुड़ जाते हैं। ये हमेशा मुझे भय रहता है ,जब भी मैं फिल्म बना रहा होता हूँ। फिल्म बनाने के प्रोसेस में जो रिश्ते बन रहे होते हैं तो वो आमतौर पर अगर अच्छा काम नहीं होता है तो वो बिखर जाते हैं। बट ये सब वर्थइट हो जाता है ,अगर मैंने फिल्म अच्छी बनाई। इसलिए मुझे हमेशा इस बात की बहुत चिंता रहती है कि..फिल्म अच्छी बने क्योंकि पैसे तो सबको मिलते हैं फिल्म बनाने में आउटसाइड ऑफ दैट।पीपल गो आउट ऑफ देयर लिमिट्स टू मेक इट बैटर ,एंड दे आर ऑल फॉलोइंग योर विज़न एंड इफ़ योर विज़न वाज़् नॉट राइट यू इनडायरेक्टली बिट्रे दैम। एंड दैट्स नॉट अ गुड फीलिंग। सो लाइक इन रा-वन आई थिंक इट शुड हैव बीन वे बैटर।

सो आई बिट्रेड अ लॉट ऑफ पीपल।

नीलेश :- यू फील दैट?

अनुभव :- या या आई बिट्रेड शाहरुख ,आई बिट्रेड माई सन।




नीलेश :- व्हाई?

अनुभव :- ही लव्ज इट्! बट यू नो आई वान्टेड हिम टू हियर फ्रॉम ऑल अक्रॉस। ही हियर्स अवाउट मुल्क़ एवरीबडी हू नोज़् फिल्म्स सेज़् गुड थिंग्स टू हिम अवाउट मुल्क़। आई वान्टेड दैट टू हैपन रिगार्डिंग रॉवन टू ,एंड दैट इज़् माई बिट्रेयल फॉर माई सन और टू शाहरुख और टू ईच एंड एवरी इंडीविजुअल हू हेल्प मी मेक दैट फिल्म। सो एट दि एंड ऑफ द डे ओनस इज़् ऑन मी बिकॉज़् आई एम सिटिंग ऑन दैट चेयर।

सो आई नो पीपल ,आई मीट पीपल इट्स अ वैरी स्ट्रेंज फिल्म इन माई करियर। दि परसेंटेज ऑफ पीपल हू लव इट और हेट इट ,,आर फिफ्टी-फिफ्टी। इट्स नॉट फिफ्टी फाइव ,फोर्टी फाइव।

इट्स फिफ्टी-फिफ्टी।

दे आईदर लव इट और दे हेट इट ,,तो मुझे आज तक पता नहीं ,,शाहरुख मुझे बोलता है-उसने पैसे कमाये। किशोर लल्ला के उसने पैसे कमाये।

तो गोइंग बाई दैट लॉजिक सक्सैसफुल है। पचास परसेंट लोगों को पसंद है। और दो प्रोड्यूसिंग पार्टनर थे ,दोनों ने पैसे कमाये। तो अच्छी ही होगी। आज तक लोग कहते हैं कि- सीक्वल बनाओ- सीक्वल बनाओ ,,तो सक्सैस ही है। और इंडस्ट्री में ऐसी नेगेटिविटी थी, इस फिल्म को लेकर। पीपल वांटेड आई बिलीव़,पीपल वांटेड शाहरुख टु फ्लाप वन्स। दे डेस्परेटली वांटेड हिम टु फ्लाप वन्स।

नीलेश :- व्हाई?

अनुभव :- आई डोन्ट नो। ही इज़् टू ....

नीलेश :- ही इज़् इनफॉलेबल।

अनुभव :- ही स्टिल इज़् ,,स्टार इज़् शाहरुख खान। यू कैन नॉट बी शाहरुख खान।

शाहरुख खान कैन कंटीन्यू टु मेक फ्लाप्स फॉर फिफ्टीन ईयर्स एंड स्टिल रिमेन शाहरुख खान। एंड यू नो ...इट्स नॉट ईजी फॉर कॉम्पटीश टु डील विद् द इट। एंड आई डोन्ट थिंक इट हैज़् एनीथिंग टु डू विद् ,एंड नॉट से ही इज़् गुड और टैलेंटेड और नॉट।

इट्स ऑलसो दि फोर्थ डिमेन्शन ऑफ एन एक्टर व्हिच गोज़् बियोन्ड लॉजिक। सो यू नो सम ऑफ आर एक्टर्स आर नॉट दैट ग्रेट लुकिंग ,दे आर नॉट दैट ग्रेट एक्टर्स बट दे आर ह्यूज् स्टार्स।

दैट्स द फोर्थ डिमेन्शन ऑफ एन एक्टर।

व्हेन एन एक्टर कैन रीच आउट ऑफ द स्क्रीन इन्टू द थियेटर एंड टच यू।

तो वो पूरी उस समय पे ना एक थी ...नेगेटिविटी ,,व्हिच आई कुड फील इन दि एयर।

उस जमाने में वी.बी.एम. हुआ करता था। व्हाट्सएप नया-नया आया था। दि काइंड ऑफ वेनम दैट वाज़् ,यू नो वन ऑफ शाहरुख़्स फ्रैंड्स मेल्ड हिम ...आई डोन्ट वान्ट टु नेम हिम ,ही ऐंडिड अप राइटिंग वन ट्विटर कि- आई जस्ट हर्ड अ हन्ड्रेड करोड़ फायर क्रैकर गो वर्स्ट.. समथिंग लाइक दैट। व्हेन यू सेलीब्रेट अदर पीपल्स फेलियर्स ......

नीलेश :- आप पहले कह रहे थे कि लोगों की विफलताओं ...

अनुभव :- में आपको सफलता नज़र आये तो वो बड़ा मुझे स्ट्रेंज लगता है। और ख़ासकर कि तब, जब वो आपके दोस्त हों।

नीलेश :- तो अपने पिताजी की कहानियों के बारे में बताईये?

अनुभव :- उनको पीछे 2013 में ब्रेन- स्ट्रोक हो गया था। तो ऑलमोस्ट फुल्ली रिकवर हो गये थे।पर फिर भी कभी -कभी अतीत में जाते हैं लम्बे के लिये ,,तो एक दिन मुझे कुछ कहानी सुना रहे थे 1938 की ,,पापा छः साल के थे ....

नीलेश :- मैंने ये देखा है बुज़ुर्गों में कि -उस वक़्त की याद्दाश्त बहुत बारीक होती है।

अनुभव :- सोर्ट टर्म मैमोरी कम होती है। परसों क्या हुआ था वो भूल जाते हैं ,लेकिन सन् बयालीस में क्या हुआ था ,वो याद रहता है। और ये वो बातें हैं ,जो पिताजी से कभी हुईं नहीं। हम लोगों का पिताजी से बहुत सानिध्य नहीं होता था ,डरते थे हम।

आजकल तो मेरा बेटा ब्रो बोलता है मुझे।व्हाट्स अप ब्रो?

लेकिन हम लोग का नहीं था। मतलब छूने का भी नहीं होता था बाप को।

नीलेश :- मैंने हाल में एक कहानी में लिखा था एम्ब्रेस,,,आप सिर्फ़ होली पर मिलते थे।

अनुभव :- होली पर पैर छूते थे। गले मिलने का मौका पिताजी से कम रहा। वो हमारे संस्कार का हिस्सा नहीं था।

नीलेश :- क्या बातें करते हैं अब?

अनुभव :- क्रिकेट, पॉलिटिक्स ,फैमिली ,,छोटा भाई ये नहीं ठीक से कर रहा है ,छोटी बहिन ये नही ठीक से कर रही है। शिकायतें, इंस्पिरेशन और मेरी फिल्मों के बारे में जितना मुझे पता होता है ,उससे ज्यादा उन्हें पता होता है।

वो टीवी पे सारे प्रोग्राम देख लेते हैं। घर पे ट्रेड मैगजीन्स आती हैं तो वो पढ़ लेते हैं, पिक्चरों का भी बिजनेस मालुम होता है उनको।

दुनियाभर की बातें होती हैं ,बहुत मज़ा आता है।डेढ़ महीने से नहीं मिला उनसे।

नीलेश :- जो रिश्ते हैं,बम्बई जैसे शहर में इनको बचा पाना और एनरिच करते रहना अपने आसपास आप देखते हैं ...हो पाता है लोगों में?

अनुभव :- नहीं ...! मतलब बहुत सारे ऐसे रिश्ते जानता हूँ जिसमें वो थोड़ा अंग्रेजी अमेरिकन कॉन्सेप्ट है कि-एक उम्र के बाद बच्चे माँ-बाप से अलग रहने लगते हैं ,शायद मेरा बेटा भी रहेगा। लेकिन मुझे वो कॉन्सेप्ट समझ नहीं आता तो...

नीलेश :- आप मन में अभी वहीं हैं ..बनारस वाले?

अनुभव :- हाँ ,,मुझे ख़ुशी है इस बात की। इस बात पे मैं अपने आप को बिलकुल बैकवर्ड नहीं पाता हूँ।

वही तो हम हैं ना,वही तो हमारी हिन्दुस्तानियत है ना ,वही तो हमारे संस्कार हैं,वही तो हमारा कल्चर है ,तो उससे मुझे कोई गुरेज़ ,कोई एतराज़ नहीं है।

(बीच में नीलेश को टोकते हुये आप बेचैन हो रहे हैं चलने के मूड़ में हैं...वॉक पर चलने के लिये )

नीलेश :- चलिये ...वॉक पर चलते हैं।

तो सफलता के साथ-साथ असफलता भी आई होगी?

अनुभव :- बार-बार ,कई बार ऐसा हुआ है कि- कम से कम तीन से चार बार ऐसा हुआ है कि- अब अनुभव शायद फिल्म नहीं बना पायेगा।



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