पांच दिसंबर की वो तारीख...

Jamshed Siddiqui  5 Dec 2017 5:10 AM GMT

पांच दिसंबर की वो तारीख...जोश और मजाज़ 

तारीखें यूं तो सिर्फ एक वहम होती हैं... जो गुज़र जाता है वो कभी नहीं लौटता.. हर सुबह का सूरज उस लम्हे को दूर, और दूर कर देता है। लेकिन ज़िंदगी अगर एक किताब है तो तारीखें बुकमार्क हैं। जिन्हें पलटकर देखो तो याद आता है कि किस सफ़हे पर पढ़ते-पढ़ते आंख झपक गई थी और किताब बंद करके रख दी गई थी। पांच दिसंबर की तारीख उर्दू अदब के लिए ऐसी ही एक तारीख है। वो तारीख जिसने उर्दू को, उसका एक रौशन चिराग़ दिया लेकिन दूसरा चिराग़ हमेशा के लिए बुझा दिया। ये दो चिराग वो हैं जिनके ज़िक्र के बग़ैर उर्दू शायरी का कोई भी हिस्सा मुकम्मल नहीं हो सकता। पहले थे, जोश मलीहाबादी जिन्होंने पांच दिसंबर को इस दुनिया में पहली बार अपनी आंखे खोलीं और दूसरे थे उर्दू के जॉन कीट्स कहलाने वाले मजाज़ लखनवी जिन्होंने उसी तारीख को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। इस अहम तारीख पर आइये याद करें, इन दो अज़ीम शख्सियात को।

मजाज़ और जोश की एक तस्वीर

पचास के दशक में खींची गई इस तस्वीर में (दाएं से बाएं, पीछे खड़े हुए) सरदार बलवंत सिंह, जगन्नाथ आज़ाद और साहिर लुधियानवी के साथ (कुर्सी पर बैठे, दाएं से बाएं) बिस्मिल सैदी, जोश जां निसार अख़्तर, देवेंद्र सत्यार्थी और मजाज़ के अलावा (नीचे बैठे हुए) अर्श मलसियानी साहब हैं। ये तस्वीर उस ज़माने की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली उर्दू मैगज़ीन 'आजकल' के दिल्ली दफ़्तर की है। इस तस्वीर में जोश और मजाज़ दोनों हैं। हालांकि दोनों की उम्र में कुछ फर्क ज़रूर था लेकिन फिर भी दोनों की अच्छी दोस्ती थी। शायद इसीलिए मजाज़ के इंतकाल पर जोश साहब ने लिखा था

दर्द की दौलत ए बेदार अता हो साक़ी

हम बहीख्वाह सभी के हैं, भला हो साक़ी

सीना ए शौक में वो ज़ख़्म के लौ धे

अब भी तेज़ ज़माने की हवा हो साक़ी
जोश मलीहाबादी

जोश और मजाज़

जोश मलिहाबादी (बीच में, बैठे हुए) और मजाज़ (पीछे, बाएं से दूसरे)

मजाज़ और जोश की दोस्ती के कई किस्से अलग-अलग दस्तावेज़ों में मिलते हैं। ये तो तय है कि जोश मलीहाबादी और मजाज़ दोनों ही शराब के शौकीन थे। दोनों की दिलचस्पी शराब में इस कदर थी कि बातें चलती रहती थीं और एक के बाद एक कई पेग बन जाते थे। जोश साहब की अजीब आदत ये थी कि जब वो शराब पीते थे तो सामने घड़ी रख लेते थे और घड़ी के हिसाब से पेग बनाते थे। मसलन, हर पंद्रह मिनट के बाद नया पेग बनता था, हालांकि अक्बसर ये पाबंदी तीसरे-चौथे पेग के बाद खत्म हो जाया करती थी। एक शाम जब जोश मलीहाबादी लखनऊ में थे, तो यही सिलसिला चल रहा था। सामने घड़ी थी और पेग बन रहे थे। कुछ और दोस्त भी बैठे हुए थे। जोश मजाज़ पर अपना बड़प्पन दिखाते हुए बोले, “देखो मजाज़ ! मैं कितने डिसिपलिन से शराब पीता हूँ, अगर तुम भी घड़ी सामने रख कर पिया करो तो बद-एहतियाती से महफ़ूज़ रहोगे। मजाज़ ने फौरन जवाब दिया -“घड़ी तो क्या ‘जोश’ साहब ! मेरा बस चले तो घड़ा सामने रख कर पिया करूँ” दोस्तों के बीच हसी गूंजने लगी और जोश साहब नशा उतर गया।

मजाज़ भले ही खुद जोश मलीहाबादी को आमने-सामने खूब जवाब दें लेकिन उन्हें ये बर्दाश्त नहीं था कि कोई और उनके सामने जोश के लिए बदकलामी करें। एक किस्सा फिराक़ साहब का भी है। फ़िराक गोरखपुरी साहब लिखते बहुत अच्छा थे, उनका अदब में कद जितना ऊंचा था खुद पर फख्र भी उतना ज़्यादा करते थे। उन्होंने खुद अपने लिए लिखा था -

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है

फ़िराक साहब को ये भी रश्क था कि वो रुबाइयां सबसे अच्छी लिखते हैं, हालांकि रुबाइयां जोश मलिहाबादी भी लिखते थे और वो काफी पसंद की जाती थीं। ग्वालियर के एक मुशायरे के बाद, जब शायर आपसी बातचीत कर रहे थे तो मजाज़ और फिराक आमने-सामने थे, इस मुशायरे में जोश मलीहाबादी नहीं थे। फ़िराक साहब ने अपने जाने पहचाने अंदाज़ में अपनी रुबाइयों के बारे में ज़िक्र किया, बातें होती रहीं। किसी ने कहा कि ‘रुबाइयां तो ख़ैर जोश भी अच्छी कहते हैं’ इस पर फ़िराक बोले, “कहने को तो ‘जोश’ साहब भी रुबाइयात कहते हैं, हालांकि वो इस सनफ़े-सुख़न का बाक़ायदा फ़न की हैसियत से इस्तेमाल नहीं करते। दर-असल वो अपनी शायरी के मुँह का ज़ायका बदलने के लिए दूसरी चीज़ें लिखते-लिखते कभी-कभार रुबाइयात भी लिख लेते हैं। उनकी रुबाइयात एक तरह से चटनी है और मेरी रुबाइयात ……. “ उन्होंने इतना कहा ही था कि एक आवाज़ गूंजी “एक तरह से मुरब्बा” सबने पलट कर देखा तो मजाज़ थे। फ़िराक को मजाज़ की ये बात बिल्कुल नगंवार गुज़री लेकिन मजाज़ को खुशी थी कि अपने दोस्त जोश की शायरी के बारे में कही जा रही बात का उन्होंने बढ़िया जवाब दिया।

जोश मलीहाबादी का एक वीडियो

मजाज़ लखनवी की आवाज़

पांच दिसंबर की वो तारीख़

पांच दिसंबर 1894

पांच दिसंबर 1894 की वो तारीख थी जब लखनऊ के करीब मलीहाबाद में रहने वाले बशीर अहमद खान के घर एक बच्चे की पैदाइश हुई। उसका नाम रखा गया शब्बीर हसन खान। शब्बीर जब थोड़े बड़े हुए तो आगरा चले गए और वहां उनकी पढ़ाई सेंट पीटर्स कॉलेज में हुई। इस दौरान वो आरबी और फारसी का मुतालबा भी करते रहे। वो 6 महीने के लिए बाबा रवींद्रनाथ टैगौर के शांति निकेतन में भी रहे। हालांकि 1916 में वालिद के इंतकाल के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके। 1925 में जोश ने 'उस्मानिया यूनिवर्सिटी' हैदराबाद रियासत में तर्जुमा का काम शुरू किया लेकिन ज़्यादा वक्त तक कर नहीं सके। इसकी वजह भी काफी दिलचस्प है, जोश साहब ने एक नज़्म लिखी जो दरअसल हैदराबाद रियासत के खिलाफ थी, इसलिए उन्हें वहां से निकाल दिया गया। इसके बाद जोश मलिहाबादी ने 'कलीम' नाम की मैगज़ीन शुरु की, जिसमें उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ लिखना शुरु कर दिया। उनकी शायरी का ज़िक्र हर तरफ होने लगा और धीरे-धीरे उन्हें शायर-ए-इन्कलाब कहा जाने लगा। उनका कद इस कदर बढ़ गया था कि उनके रिश्ते प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से काफी मजबूत हो गए थे।

पांच दिसंबर 1955

चार दिसंबर 1955 को लखनऊ यूनिवर्सिटी में एक उर्दू कॉनफ्रेंस हुई। इस महफिल में उर्दू के तमाम बड़े नामों को बुलाया गया था। इस्मत चुग्ताई, कृष्ण चंदर, अली सरदार जाफरी के अलावा मजाज़ भी शामिल थे। मजाज़ उस वक्त लखनऊ में ही थे वो मुंबई छोड़कर आए थे। उस कॉनफ्रेंस में मजाज़ ने बहुत अच्छी गज़ली पढ़ीं, लोगों ने खूब तारीफें की। उर्दू कॉनफ्रेंस पूरी तरह से कामयाब हो गई। इसके बाद बाकी लोग अपने ठिकानों को लौट गए लेकिन मजाज़ की मुलाकात जोश मलिहाबादी के भांजे जलाल मलिहाबादी से हो गई, जो उसी कॉनफ्रेंस के लिए लखनऊ आए थे। दोनों के बीच कुछ देर बातचीत हुई और फिर ये तय हुआ कि थोड़ी मयख्वारी हो जाए। दो-दो पेग लगाकर वापस हो जाने की बात तय हुई। कैसरबाग़ के पास कचहरी रोड से के किनारे बस स्टॉप था, जमाल और मजाज़ दोनों वहीं पहुंचे। शराब खरीदी और बस स्टैंड के पास खड़े होकर पीने लगे। कुछ वक्त गुज़रा होगा कि न जाने क्यों मजाज़ ने जमाल मलिहाबादी से कहा कि यहां पर पुलिस वाले परेशान करेंगे चलो ऐसा करते हैं कि इसी दुकान (जहां से शराब खरीदी थी) की छत पर चलते हैं और वहीं बैठकर सुकून से पीते हैं। जलाल को बात जम गई। छत पर पहुंचे और फिर शराब का सिलसिला शुरु हो गया। दिसंबर की ठंड तेज़ थी, शराब के नशे में उन्हें इसका ख्याल न रहा। काफी देर बाद जब शराब ज़्यादा हो गई तो बेहोशी की हालत में जलाल तो किसी तरह दुकान की छत से नीचे उतर आए लेकिन मजाज़ छत पर ही बेहोश पड़े रहे। रातभर ओस में भीगते रहे। पांच दिसंबर की सुबह को जब उनके बारे में पता चला तो उन्हें छत से नीचे उतारा गया। ठंड के मौसम में पूरी रात खुली छत पर पड़े रहने से उन्हें स्ट्रोक हो गया था। अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि कोमा में हैं। कुछ घंटे कोमा में रहे और फिर उर्दू का वो सितारा दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गया।

मुझे जाना है एक दिन तेरी बज़्में नाज़ से आखिर
अभी फिर दर्द टपकेगा मेरी आवाज़ से आखिर
अभी फिर आग उट्ठेगी शिकस्ता साज़ से आखिर
मुझे जाना है एक दिन तेरी बज़्में नाज़ से आखिर

- मजाज़ लखनवी

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