नौकर, नाटकीयता व नर्क

नौकर, नाटकीयता व नर्क

गुडग़ाँव के एक समृद्ध परिवार पर अपने घर में काम करने वाली झारखण्ड की 14 वर्ष की आदिवासी बच्चे को बार-बार मारने-पीटने का आरोप लगा। जब उसे बचाया गया तो वह अलमारी के पीछे छुपी थी, या फिर ज़बरदस्ती वहीं रखी गई थी। उसके शरीर पर चोट के, नोच-घसोट के निशान थे। उसने समाचार चैनलों को बताया कि उसे रोज़ मारा जाता था, चाकू तक से काट देते थे। एक बात जो सबसे ज्यादा झकझोरती है वो यह कि उसके मालिक मारते समय बस यही कहते थे कि वे उसे पसंद नहीं करते।

घरेलू कर्मचारियों पर अत्याचार करने का यह एक भयानक मामला ज़रूर था, लेकिन अकेला नहीं। हाल ही की बात है जब गुडग़ांव के ही एक अन्य मामले में नेपाली मूल की एक घरेलू कर्मचारी को सऊदी के एक राजनयिक के घर से बचाया गया था, महिला को कैद करके कट्टरपंथियों की तरह  मारपीट और बलात्कार किया जाता था। झारखण्ड की बच्ची के मामले में सामजिक गुटों व पुलिस की प्रतिक्रिया तेज़ थी, इसकी वजह यह थी कि सऊदी राजनयिक के मामले ने सबको संवेदनशील बना दिया था। भारत में मालिक-नौकर का रिश्ता विवादों से भरा है। बढ़ती सम्पन्नता और दोहरी आमदनी वाले दम्पत्तियों व बहुत छोटे परिवारों के चलते घरेलू कर्मचारियों की मांग बढ़ रही है। इस मांग के ही साथ बढ़ रहा है सामाजिक तबकों के बीच की खाई।

हम भारतीय, विश्व में सबसे अधिक नौकरों पर निर्भर रहने वाले लोग हैं। अपने बर्तन मंजवाने, शौचालय साफ करवाने, बच्चों की देखरेख, कुत्तों को घुमाने, काम पर जाने के लिए ड्राइवर से लेकर कपड़े इस्त्री करवाने जैसे कामों के लिए हमें पूरी तरह से कर्मचारियों की ज़रूरत पड़ती है। सिर्फ सोने के आठ घंटे निकाल दें तो 16 घंटे नौकरों की आवश्यकता है। यहां तक कि मुख्यधारा की अंग्रेज़ी प्रेस में भी इन कर्मचारियों के लिए सिर्फ  'घरेलू' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

एक गंभीर संकेत देते हुए टीमलीज़ के मनीष सभरवाल कहते हैं, ''पिछले पांच वर्षों में हमने हर पांच मिनट में एक व्यक्ति को नौकरी दी है और ये आवेदनकारियों का सिर्फ पांच फीसदी ही है।" टीमलीज़ भारत की सबसे बड़ी तीसरे पक्ष की नियोक्ता एवं निम्न और मध्य कुशल श्रम की प्रबन्धक कंपनी है।

न्यूयॉर्क टाइम्स में सन 2008 के एक लेख में (अदृश्य पुरुषों की आंखों से भारत की समृद्धि की खोज) पत्रकार-लेखक आनंद गिरिधरदास ने पांच सितारा होटल के शौचालय को रूपक लेकर इस बढ़ती खाई को जिस तरह बताया था वो आज भी मेरे ज़ेहन में रहता है। उन्होंने कहा था, ''इन शौचालयों में लोग दो श्रेणियों में विभाजित हैं- वो जिन्हें डिस्पेंसर से साबुन का इस्तेमाल करना होता है, और वो जो आप के लिए डिस्पेंसर दबा कर साबुन निकालते हैं, नल खोलते बंद करते हैं, दस्ताने पहने हाथों से उसे धुलने को डालने के लिए आप से वापस लेते हैं, और जैसे आप निकलने लगते हैं नल पोंछते हुए बुदबुदाकर आप को धन्यवाद कहते हैं, चाहे आप उन्हें बक्शीश दें या न दें"

इस तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में लोगों का रवैया बिगड़ा है। एक दम्पत्ति जिसके तीन छोटे बच्चे हैं वह अब तीन महिलाओं को नौकरी पर रखती है। यह निर्भरता गंभीर है लेकिन ये आसानी से मिलती है, बिना शिकायत, सीढिय़ों के नीचे रहने वाले वर्ग से, विक्टोरियन ब्रिटेन से आई एक अवधारणा जहां कर्मचारी घर में किसी सीमित स्थान जैसे सीढिय़ों के नीचे सोते थे। हमारे नए अपार्टमेंट इमारतों में ताबूत जैसे सोने के स्लॉट्स अथवा सर्वेंट क्वार्टस को ही देख लें।

हकदारी की ये भावना बड़ी तीक्षण रूप से सामने आई देवयानी खोपरागड़े प्रकरण में। जिस में ऐसा निहित हुआ कि राजनयिक उन्मुक्ति के अलावा हर हक़दार भारतीय को घर में काम करने के लिए एक सस्ती महरी मिलने का मौलिक अधिकार भी था। यहां तक कि गरीब समर्थक और वामपंथी केंद्र सरकार ने अपने सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी के साथ अपने संबंधों को बर्बाद कर दिया और मीडिया ने राजनयिक का पक्ष लिया। उस महिला कर्मचारी को भारत को बदनाम करने की मंशा रखने वाली एक विदेशी सहयोगी बताया। न्यूनतम मजदूरी की बात ही नहीं, वो तो कृतघ्न थी। ये भी कहा, जब मैंने राष्ट्र हित के एक लेख में (हमारी भारतीय सामंती सेवाएं 21 दिसम्बर 2013) में इन्ही मुद्दों को उठाया तो फॉरेन सर्विस से तत्काल ही तिरस्कार मिला। अब जैसा कि सब जानते हैं, उस कहानी की गुत्थियां खुल चुकी हैं।

हाल ही में मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित और मेरे मित्र विशाल भारद्वाज की लिखी फिल्म तलवार उदाहरण है। आरुषि हेमराज केस के बारे में मेरे अपने कोई विचार या मत नहीं हैं, मैं सिर्फ उस कहानी में उन दो तबकों को, उन दो वर्गों के इंसानों को चित्रित करना चाहता हूं। एक नर्म, प्यार करने वाले, मेहनतकश, और मोहरा, शहीद या बलि चढऩे वाला, दूसरा उद्दाम खिल्ली उड़ाता, पीता-पिलाता, मोगाम्बो खुश हुआ सा हंसने वाला जिस पर पूरी तरह संदिग्ध जैसे लिखा हुआ हो। हम जैसे ही बहुत लोग से लोग फिल्म देखकर वापस आए, उस नाइंसाफी से हिले हुए और फिर उस बात को सराहा जब दूसरे दिन टाइम्स ऑफ  इंडिया, जिसके मालिक फिल्म के निर्माता हैं, ने हमें सलाह दी कि हम अपने नौकरों को ये फिल्म दिखाने ले जाएं ताकि आपके अनुमान से, वो सब अपने आप को दोषी महसूस करें और अनुशासित भी। कोई ये पूछना ज़रूरी नहीं समझता कि उस तहकीकात में, 16 आदेशों के न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत, उच्चतम न्यायालय समेत चालाकी से हेरफेर और विकृत किया गया तो तीन नेपाली मूल के घरेलू कर्मचारी ये करवाने की क्षमता रखते थे या बड़े सम्बन्ध रखने वाले डेंटिस्ट। 

कोई ये नहीं देखता कि नार्को टेस्ट में डॉक्टर दंपत्ति नहीं बल्कि नौकरों के शरीर में अधिक ब्रेन को बिगाडऩे वाले रसायन पंप करने को उत्सुक है। जैसा की फिल्म में दिखाया गया है, हम ख़ुशी-ख़ुशी मुंह दबा कर हंसते हैं जब एक सीबीआई ऑफिसर उत्तर प्रदेश के एक निचले पुलिसकर्मी से पतलून खोलकर डंडे से बवासीर ठीक करवाने को कहता है। 

मैं तो ये ज़रूर देखना चाहूंगा कि एक सीबीआई ऑफिसर एक राज्य पुलिस के साथ ऐसा करे, कम से कम सुश्री मायावती द्वारा शासित उत्तर प्रदेश में वो अच्छा सीबीआई ऑफिसर एक नेपाली मूल के नौकर की धुलाई भी करता है हमें ये सही लगता है और अपने फ़ोन पर इसे रिकॉर्ड करने वाले कनिष्ठ सहयोगी देशद्रोही है, सीटी बजाकर खबर देने वाला नहीं, जो वो होता अगर डेंटिस्ट्स की पिटाई हुई होती। 

बेदम हुए पड़े फिल्म आलोचकों को क्यू दोष दें कि उन्हें ये सब दिखा नहीं। जब विशाल भारद्वाज जैसे संवेदनशील एवं जागरूक फिल्म निर्माता ने स्क्रिप्ट लिखी है? इस फिर से उभरते भारत में, वर्ग और तपका नई जाति है, कुछ अनिवार्य रूप से बड़े करीने से जुड़ा हुआ एक-दूसरे से, बस हम कभी-कभी हिल जाते हैं, थोड़े से वक़्त के लिए जब अलमारी के पीछे से एक पस्त आदिवासी किशोरी हमारी आँखों में झांकती है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं)  

Tags:    India 
Share it
Top