प्रधानमंत्री जी ! यहां महिलाएं सशक्त नहीं

प्रधानमंत्री जी ! यहां महिलाएं सशक्त नहींgaoconnection

कुछ दिनों पहले देश के प्रधानमंत्री ने लोकसभा के सेंट्रल हॉल में महिलाओं के लिए कहा था, “सशक्तिकरण उनका होता है जो सशक्त नही हैं महिलाएं तो खुद सशक्त हैं” लेकिन भारत के कुछ इलाकों में आज भी महिलाएं अपने हक के लिए लड़ रही हैं तो कुछ हिम्मत हारकर चुप हैं। कहते हैं माँ का दर्जा हर धर्म से ऊंचा है। बचपन से ही दुल्हन बनना और शादी के बाद माँ बनना हर लड़की का खास सपना होता है लेकिन किसी कारण वश अगर औरत मां न बन पाए तो उसे यातनाएं झेलनी पड़ती हैं और कभी-कभी तो माँ बनने के बाद भी।

इसका उदाहरण बिहार के जिला औरंगाबाद गाँव बारुण की सालेहा खातून (40 वर्ष) है जिनकी शादी 1985 में रोहतास जिले के गाँव आकोढ़ीगोला में 16 साल की उम्र में हुई थी। अफसोस हाथों से मेंहदी का रंग भी न उतरा था कि उसके दामन पर दाग लग गया क्योंकि शादी के कुछ दिनों के बाद ही वो गर्भवती हो गयी, सालेहा को कई दिनों तक अपने गर्भवती होने के बारे पता नहीं चला लेकिन जब उनकी सास को इस बात का अंदाज़ा हुआ तो सालेहा को चरित्रहीन समझकर धोखे से उसे उसके मायके पहुंचा दिया। साथ ही इल्जाम लगाया कि उसके कोख मे जो बच्चा है वो शादी के पहले का है। फिर भी सालेहा ये आस लगाए बैठी थी िक कोई न कोई उसे मायके से लेने जरूर आएगा लेकिन आया भी तो कोर्ट का नोटिस क्योंकि उसके ससुरालवालों ने उसपर केस कर दिया के एक गर्भवती महिला ने धोखे से मेरे बेटे से शादी की। इस हादसे से सालेहा काफी डर गई थी और इसी स्थिति में उसने मायके में अपने बेटे को जन्म दिया।

कहते हैं न हर किसी का वक्त बदलता है ठीक उसी तरह मां बनने के बाद सालेहा में न जाने कहां से हिम्मत आ गयी और उसने अपने ससुरालवालों पर उल्टा केस कर दिया। सालेहा को कम पढ़ी-लिखी और कमजोर समझते हुए ससुरालवालों ने सारे गवाहों को खरीद लिया जैसे मौलवी, दाई, दर्जी वगैरह औऱ दोनों तरफ से केस चलता रहा। ये सिलसिला पांच साल तक चला लेकिन सालेहा ने भी हार नहीं मानी केस के कारण सारी जमा पूंजी खत्म हो गयी और पांच साल बाद आखिर एक माँ की जीत हुई। उसने दोबारा उस ससुराल में जाने से मना कर दिया। 1990 में सलेहा की दूसरी शादी जसीम खलीफा से हुई जिनसे उसे तीन बच्चे हुए दो बेटी और एक बेटा। किस्मत ने फिर साथ छोड़ दिया खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिकी।

लकवा मारने से दूसरे शौहर की मौत हो गयी। तब से वो लोगों के घरों मे काम कर औऱ सिलाई कर अपना जीवन चला रही है। सालेहा ने बड़ी बेटी की शादी कर दी है वहीं छोटी बेटी स्कूल नहीं जाती बल्कि मां के काम हाथ बंटाती है और वो बेटा जिसके लिए सालेहा ने किसी की परवाह न करते हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाया था अफसोस वो मां का साथ छोड़ अपनी पत्नी के साथ अपने निजी जीवन में व्यस्त है। बेटे की इस जुदाई का मां पर गहरा असर पड़ा है और आज सालेहा मिर्गी की बीमारी से ग्रसित है। ये सिर्फ सालेहा की ही कहानी नहीं जिसे बलिदान के बदले अंत में कुछ हासिल नहीं हुआ बल्कि समाज में कई ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें कदम-कदम पर बलिदान देने के बाद भी वो सम्मान नहीं मिलता जिसकी वो हकदार हैं।

बिहार के अकबरपुर गाँव की रुकसाना (बदला हुआ नाम) भी ऐसी महिलाओं में से एक है जिसकी शादी पिछले साल इसी गाँव में हुई थी। उसके ससुरालवालों ने उसके बच्चे को नाजायज औऱ उसे पागल करार देते हुए शादी के कुछ महीने बाद ही उसे घर से निकाल दिया आज वो मायके मे घुट-घुटकर जीने को मजबूर है।

इतना ही नहीं सीतामढ़ी शिवहर जिले की 25 वर्षीय रूपा (बदला हुआ नाम) को उसके पति ने घर से निकाल दिया और दूसरी शादी कर ली। ये सज़ा उसे सिर्फ इसलिए मिली क्योंकि वो मां नहीं बन सकती थी। कोई औरत मां बनने की तो कोई मां न बनने की सज़ा पाती है।

कभी बांझ तो कभी बदचलन न जाने ऐसे कितने शब्द बनाए गए है औरतों के लिए। भारत जैसे देश में कई ऐसे त्योहार हैं जब औरतें अपने पति की लंबी आयु के लिए कई व्रत रखती हैं, दुआएं करती हैं की उनकी उम्र पति को लग जाए, वो हमेशा स्वस्थ रहे लेकिन बावजूद इसके अभी भी कुछ लोगों की सोच ऐसी है कि अगर किसी कारण पति की मौत हो जाती है तो पत्नी को कलंक कहा जाता है।

इस तरह की घटनाएं हमारे समाज के लिए रोज़ की कहानियां बन गयी हैं। यहां तक की लड़की के अपने भी कई बार उनका साथ छोड़ देते हैं ताकि उनके घर की इज्ज़त बनी रहे। हमारे समाज में महिलाओं की यह दयनीय स्थिति महिला सशक्तिकरण की परिभाषा पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।

(लेखिका बिहार के चरखा पब्लिकेशन की सदस्य हैं। यह उनके अपने विचार हैं।)

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