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कैमरे और इंटरनेट की मदद से संथाल जनजाति की कहानियों को आगे लाने में जुटी उनकी नई पीढ़ी

संथाल जनजाति के युवा डीएसएलआर कैमरा और इंटरनेट का प्रयोग कर अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की कहानियों और इतिहास को संजो रहे हैं।

कैमरे और इंटरनेट की मदद से संथाल जनजाति की कहानियों को आगे लाने में जुटी उनकी नई पीढ़ी

- दीपनविता गीता नियोगी

संथाल जनजाति से ताल्लुक रखने वाले साइमन बास्के अपने घर से कुछ दूरी पर स्थित घने जंगल में ऊंचे पेड़ों को देखता है, जिनके पत्ते पूरे साल सूखे रहें। हालांकि मानसून के दौरान इनमें हरे पत्ते आ गए हैं। इस दूरी को तय करते समय साइमन की आंखे एक ऐसी जगह तलाश रही थीं, जहां वह शूट कर सके।

बास्के भारत के सबसे पुराने और बड़े आदिवासी समुदायों में से एक संथाल जनजाति से हैं। यह जनजाति झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम में पाई जाती है। दक्षिणी बिहार के जमुई में इस समुदाय के युवक और युवतियां पुरानी लकीरों को तोड़कर अपने समुदाय की कहानियों का इतिहास कैमरे और इंटरनेट के माध्यम से आगे ला रहे हैं।

ये युवा खुद को 'द लाहंती क्लब' कहते हैं। संथाली भाषा में लाहंती का अर्थ है- आगे बढ़ना। लाहंती क्लब का गठन 2017 में किया गया था ताकि सदियों पुराने संथाल समुदाय के बच्चे अपनी भाषा सीख सकें और अपनी संस्कृति पर गर्व कर सकें।

गोविंदपुर गांव में रहने वाले सोनालाल मरांडी, क्लब के सदस्य हैं। सोनालाल मरांडी ने गांव कनेक्शन को बताया, "जंगल में कई हरी सब्जियां हैं और हम ध्यान से उनके नाम फोल्डरों में सहेज कर रखते हैं। हमारा समुदाय सदियों से वन खाद्य पदार्थ खा रहा है। अगर हम इस तरह के वीडियो नहीं बनाएंगे तो एक दिन हमारे बच्चे हमारी समृद्ध भोजन परंपरा को भूल जाएंगे। मानसून में हम मशरूम की विभिन्न किस्मों को इकट्ठा करते हैं।"


उनके शुरुआती वीडियो में से एक वीडियो 'एस्पिरेशन' शीर्षक से उनके यूट्यूब चैनल 'लाहंती क्लब' पर एक साल पहले अपलोड किया गया था। इसकी शुरुआत 'ए फॉर एस्पिरेशन्स' नाम से होती है, जिसमें बिहार के एक सुदूर गांव के संथाली जनजाति के कुछ बच्चों को कैमरे में कैद किया गया है। इसमें बच्चे बात कर रहे हैं कि भविष्य में वे क्या बनना चाहते हैं?

वीडियो में दो लड़कियां यह कहती नजर आ रही हैं कि भविष्य में वे शिक्षक बनने की आशा करती हैं। वहीं एक लड़का कहता है कि वह डॉक्टर बनने की इच्छा रखता है और दूसरा कहता है कि वह एक पुलिसकर्मी बनेगा।

वीडियो को स्थिर हाथ से बैकग्राउंड में संगीत के साथ शूट किया गया है। यह 'लाहंती क्लब' यूट्यूब चैनल पर अपलोड किए गए 41 वीडियो में से एक है। इसके अलावा चैनल पर स्थानीय संस्कृति से लेकर वन खाद्य पदार्थों तक के वीडियो हैं।

निकॉन डीएसएलआर कैमरा का उपयोग करने वाले बास्के ने गांव कनेक्शन से कहते हैं, "मैं इसी जनवरी लाहंती क्लब में शामिल हुआ हूं। इसका हिस्सा बनना बहुत अच्छा लगता है। इनके साथ मैंने अब तक चार फिल्में पूरी कर ली हैं और कुछ अन्य पर काम कर रहा हूं। हम सभी वन खाद्य पदार्थों की शूटिंग के लिए जंगल जाते हैं।''

बास्के अक्सर अपने घर से केवल एक किलोमीटर दूर गांव के जंगल में हरियाली, हरे पत्ते के बीच मानसून का आनंद लेते हुए शूटिंग करते हैं। नई दिल्ली के एक रिपोर्टर ने उनका इंटरव्यू लिया था जिसे बातचीत के बीच वह जंगल में पाए जाने वाले सफेद मशरूम की फोटो भेज रहे थे।

सफेद मशरूम को संथाली भाषा में 'बदरा उह' कहा जाता है।

बास्के ने बताया, "मेरे समुदाय के सदस्य सभी प्रकार के वन खाद्य पदार्थ खाते थे, लेकिन अब वे स्थानीय बाजारों से अधिक खरीदते हैं।"


जंगल के अंदर बास्के ने अपना ध्यान अपने गांव के ही एक आदमी पर केंद्रित किया जो पत्तियां तोड़ रहा था। बास्के ने हमें बताया कि उसके समुदाय में पत्तों का उपयोग अक्सर कटोरी बनाने के लिए किया जाता है।

बास्के को जंगल में पाए जाने वाले जंगली खाद्य पदार्थों पर शॉर्ट फिल्में बनाना बहुत अच्छा लगता है। लाहंती क्लब के अन्य सदस्य बास्के के इस प्रयास में उसका साथ देते हैं।

क्लब में पिछले साल ही शामिल हुए बिंझा गांव निवासी सुमन हांसदा ने कहा, "खाने वाली जंगली मशरूम को खोजने के लिए मानसून सही समय है। शूटिंग के दौरान दो लोग एक साथ काम करते हैं। एक व्यक्ति मशरूम या किसी अन्य वन भोजन को खोजता है वहीं दूसरा उसे शूट करता है।" जंगल उनके घर से कुछ पांच किलोमीटर की दूरी पर है।

ये सभी लघु फिल्में 'चिराग' (CHIRAG) परियोजना का हिस्सा हैं, जो कि 'प्रदान' (PRADAN) नाम से की गई एक पहल है। जिसके तहत ब्रिटेन स्थित ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय और दो अन्य संगठनों द्वारा खाद्य और पोषण सुरक्षा को संबोधित करने के साथ-साथ स्थानीय खाद्य पदार्थों का ज्ञान उन्हें देने का किया जाता है। इसकी शुरूआत 2019 में की गई थी। ऐसी ही एक दिलचस्प फिल्म है 'बाड़े बिल्ली' या बरगद के पेड़ का फल।


लाहंती क्लब का गठन

बिहार के जमुई जिले के चकाई के एनजीओ, सिनचन एजुकेशन एंड रूरल एंटरप्रेन्योरशिप के संस्थापक गौतम बिष्ट ने जब एक रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए ब्लॉक का दौरा किया तो उन्होंने देखा कि शिक्षित संथाल अपने अनपढ़ समुदाय के सदस्यों को कैसे देखते हैं। बिष्ट ने यह भी पाया कि संथालों के लिए अपनी शैक्षिक और सांस्कृतिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करना मुश्किल था।

अपनी परियोजना को पूरा करने के बाद 2017 में गौतम बिष्ट ने स्थानीय युवाओं को शामिल करने के लिए सिनचन और लाहंती क्लब की शुरुआत की। इसका मकसद आज के युवाओं और पुरानी पीढ़ियों के बीच एक सेतु का काम करने का था। बिष्ट ने गांव कनेक्शन को बताया, "मेरा ध्यान संस्कृति, शिक्षा और स्थानीय ग्रामीण आजीविका पर युवाओं के साथ काम करना था।"

अभी कुछ 27 सदस्य हैं। इनमें से सात बोर्ड के सदस्य हैं जिन्होंने 2017 में क्लब का गठन किया था। वर्तमान में ये सदस्य विभिन्न गतिविधियों में लगे हुए हैं। संथाल समुदाय द्वारा खाए जाने वाले स्वादिष्ट दीर्घकालिक पारंपरिक भोजन को फिल्माना उनके कुछ कामों में से एक है।

एनजीओ प्रदान (प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन) के कार्यकारी अधिकारी शुवाजीत चक्रवर्ती ने कहा, "जंगली वन खाद्य पदार्थों की शूटिंग करने से संथाल समुदाय को प्रासंगिक ज्ञान मिलता है और उन्हें उनकी पारंपरिक संस्कृति पर गर्व की भावना विकसित करने में मदद मिलती है।"


फिल्में बनाने के लिए क्लब के सदस्यों को प्रशिक्षण

बिष्ट ने कहा, 'शुरू में हमने इंटरव्यू देते हुए इन युवाओं के साथ फिल्मों की शूटिंग के लिए बाहर से लोग आमंत्रित किए मगर बाद में हमें अहसास हुआ कि दीर्घकाल के लिए यह एक अच्छी योजना नहीं थी। "

उन्होंने कहा, "इसलिए हमने सदस्यों को कैमरे सौंप दिए और प्रशिक्षण देने लगे।"

बास्के, हांसदा और अन्य क्लब के सदस्यों ने पिछले साल झारखंड के देवघर में एक प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया ताकि फिल्म बनाने में वो पेशेवर कैमरों का उपयोग कर सके।

सोनेलाल ने गांव कनेक्शन को बताया कि अस्वस्थ होने के कारण वह प्रशिक्षण नहीं ले सके। हालांकि इससे उनकी कैमरा सीखने की चाह कम नहीं हुई। सोनेलाल कहते हैं, "क्लब में शामिल होने से पहले मैं अपने मोबाइल फोन से बहुत सारी तस्वीरें खींचा करता था। मुझे पता था कि शूट कैसे करना है और कैसे परफेक्ट एंगल देखना है। अब मैंने खुद से ही थोड़ा कैमरा चलाना सीख लिया है।"

वीडियो को एडिट करने के लिए एक अलग टीम है। क्लब के जिन सदस्यों को टेक में दिलचस्पी है वह काफी कुछ सीख चुके हैं। मरांडी को गूगल ड्राइव पर वीडियो अपलोड करना और मेल के माध्यम से भेजना आता है।

क्लब सदस्य बामड़ा, पोझा और नवाडीह पंचायतों के बीच आठ कैमरे हैं जिन्हें वह एक दूसरे से साझा करते हैं। बास्के कहते हैं, "हमें प्रति फिल्म 1,500 रुपये मिलते हैं। ये चार से पांच मिनट लंबी होती है। फिल्म की शूटिंग के लिए हमें एक या दो दिन लगते हैं।" 'प्रदान' (PRADAN) इसका भुगतान करता है।


महिलाएं भी चलाती हैं कैमरा

सोनालाल के ही गांव की कविता मरांडी साल 2018 में क्लब में शामिल हुई थीं। कविता ने गांव कनेक्शन को बताया, "मैंने खेतों में पाए जाने वाले केकड़े, खाने वाले घोंघा और सिंघाड़ा पर एक वीडियो बनाया है।"

कविता के अनुसार संथाल तब से जंगली वन भोजन और फल खा रहे हैं, जब समुदाय में खेती करना आम बात नहीं थी। कविता कहती हैं, "हमें खेती सीखने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि जंगल खत्म होते गए और विकासात्मक गतिविधियों के कारण हमारे खाद्य पदार्थ गायब होने पर आ गए।"

कविता संथाली फूड कल्चर पर लघु फिल्में बनाकर खुश हैं। वह कहती हैं, "मुझे वन भोजन के बारे में कहानियां सुनना पसंद है। मेरी मां मुझे विभिन्न प्रकार के साग को खाने के फायदों के बारे में बताती हैं। तालाबंदी के दौरान हम वन के भोजन के कारण बच पाए। "

पूजा हेम्ब्रम को क्लब से जुड़े सात महीनें हो गए हैं। वह एक पशु सखी के रूप में भी काम करती है, जो ग्रामीण पशुओं की देखभाल कर उन्हें सेवा प्रदान करता है और बकरियों और मुर्गियों के टीकाकरण का भी काम करता है। पूजा कहती हैं, "मैंने डुमर का सब्ज़ी या लोआ बिली पर भी एक वीडियो किया है। यह एक प्रकार का फल है जिसे हिंदी में गूलर कहा जाता है। इसे कच्चा खाया जाता है या सब्जी के रूप में भी पकाया जाता है। मैंने इसे मार्च में शूट किया था।"

दिसंबर 2018 में क्लब में शामिल हुईं कुसुम हांसदा को फिल्में बनाना पसंद है। वह कहती हैं, "जब मैं ऐसे वीडियो बनाता हूं तो मुझे पता होता है कि बहुत से लोग इसके माध्यम से मुझे जानेंगे। मैंने चकाई से गृह विज्ञान में स्नातक किया है। हम अपने वीडियो में वन खाद्य पदार्थों का प्रदर्शन करते हैं जो धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। हम चाहते हैं कि लोगों को पता चले कि वनों से हमें पौष्टिक भोजन मिलता है।"

बामड़ा पंचायत के राणडाम्गा गांव के मोतीलाल हांसदा कुसुम से सहमत हैं। वह कहती हैं, "हम अपने दर्शकों के सामने ऐसे वन खाद्य पदार्थ लाते हैं जो बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। इस तरह के वीडियो हमें हमारी खाद्य संस्कृति को हमेशा के लिए संरक्षित रखने में मदद करेंगे।" इस बीच बास्के ने महिलाओं की तस्वीरें भेजी जो सहजन (ड्रमस्टिक) की नर्सरी तैयार कर रही थीं।

लाहंती क्लब का काम आप यूट्यूब और फेसबुक पर भी देख सकते हैं।

अनुवाद- सुरभि शुक्ला

मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गयी इस स्टोरी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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