World environment day: पृथ्वी आश्चर्यजनक रूप से ज्यादा गर्म हो रही, जीव जगत के लिए खतरे की घंटी

Suvigya JainSuvigya Jain   5 Jun 2019 8:29 AM GMT

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मानव का जीवन प्रकृति चक्र से बंधा है। एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानी नृतत्वशास्त्रियों के मुताबिक मानव का विकास ही प्रकृति की स्वाभाविक उथल पुथल के हिसाब से ही हुआ। लिहाजा पृथ्वी के पर्यावरण में अगर कोई अस्वाभाविक उथल पुथल होने लगे तो मानव उसे झेलने में सक्षम नहीं है। इस समय पर्यावरण में एक प्राणघातक बदलाव होता दिख रहा है। इसे हम पिछले कुछ दशकों से जलवायु परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं। खासतौर पर ग्लोबल वार्मिंग यानी पृथ्वी का ताप बढ़ने के रूप में। अगर यह जलवायु परिवर्तन कुदरती होता तो इसे कुदरत की मर्जी पर छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं होता। लेकिन अगर यह मानव के खुद के क्रियाकलाप से हो रहा हो तो चिंतित होकर चिंताशील होना जरूरी है।

कितना बड़ा होता जा रहा है यह संकट

वैज्ञानिकों ने पाया है कि पृथ्वी आश्चर्यजनक रूप से ज्यादा गर्म होती जा रही है। कुछ दशकों पहले तक गरम होने की यह रफ़्तार उतनी चिंता जनक नहीं थी। सन 1881 से लेकर 2003 तक के आंकड़ों से पता चला कि पृथ्वी औसतन हर दस साल में 0.05 डिग्री यानी एक डिग्री सेल्सियस के बीसवें हिस्से की रफतार से गर्म हुई। लेकिन सिर्फ 1971 से लेकर 2003 तक के अंतराल में पृथ्वी के गरम होने की रफ़्तार हर दस साल में 0.22 डिग्री सैल्सियस यानी पहले से यह रफ़्तार साढे चार गुनी हो गई।

इस लिहाज से पचास साल में पृथ्वी का औसत तापमान पूरा एक डिग्री सैल्सियस बढ़ जाएगा। पर्यावरण विज्ञानियों के बीच यह एक ऐसा बदलाव है जो जीव जगत के लिए खतरे की घंटी है। मसलन वर्षाचक्र गड़बड़ाने लगेगा। पृथ्वी पर प्राकृतिक बर्फ के पहाड़ों यानी ग्लेशियरों का पिघलना और तेज हो जाएगा। समुद्र का जलस्तर ऊँचा उठ जाएगा। पृथ्वी के एक बहुत बड़े हिस्से की पारिस्थितिकी डांवांडोल हो जाएगी। इसीलिए वैज्ञानिक आजकल जलवायु परिवर्तन के कारणों और उसके निवारण पर संजीदगी से काम कर रहे हैं। और इसीलिए दुनिया के लगभग सभी देशों के नेता एकजुट होकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सोच विचार कर रहे हैं।

बेमौसम बारिश की चिंता

नया अनुभव है कि पृथ्वी पर जहां तहां बेमौसम बारिश होने लगी है। कई जगह वर्षा के दिनों में पानी औसत से कम गिरने लगा है। हालांकि विशेषज्ञों ने इस खतरे को लेकर दशकों पहले आगाह करना शुरू कर दिया था। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर 1980 और 90 के दशकों में कई शोध अध्ययन और गंभीर विचार-विमर्श हो चुके हैं। जलवायु परिवर्तन के नाम से जब भी इस संकट पर बात हुई वह वैज्ञानिक विमर्श भूताप यानी ग्लोबल वार्मिंग के इर्द-गिर्द घूमता रहा। और भूताप का यह मसला कार्बन उत्सर्जन करने वाले उद्योगों पर चिन्ता जताने पर ठहर गया।

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अब चूंकि उद्योग व्यापार का मामला घाटे मुनाफे से जुड़ा है सो इसमें राजनीति का बीच में आना लाजिमी था। वह आई और आजतक दुनिया के तमाम देशों के बीच एक निर्णायक सहमति नहीं बन पाई कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कड़े कानूनों का पालन कैसे हो? और इन नियमों का पालन कब से शुरू कराया जाए?

दरअसल, विकास के नारे से आज जो देश अपनी अंदरूनी राजनीति चलाने में लगे हैं उन्हें जलवायु परिवर्तन रोकने में अपनी भूमिका निभाने में अड़चन आना स्वाभाविक है। राजनीतिक सत्ताओं के लिए वाकई यह एक बहुत बड़े हौसले का काम है कि वह अपने अपने देशों के आम आदमी को यह समझा पाएं कि पृथ्वी के बुखार को उतारने के लिए उन्हें विकास से कुछ परहेज़ करना पड़ेगा। बहरहाल, आज नहीं तो कल हो सकता है कि पृथ्वीवासी आमजनों को खुद ही यह समझ आने लगे कि भविष्य के जीवन को बचाने के लिए वर्तमान में भौतिक विकास का त्याग करने के अलावा कोई चारा है नहीं।

मसला जागरुकता बढ़ाने का

विद्वान लोग बताते हैं कि अपने तत्कालीन हित के लिए तरह तरह के तर्क पैदा करना मानव का स्वभाव है। कट्टर परंपरावादी तो हद से ज्यादा कट्टर हैं। उन्हें विज्ञान और वैज्ञानिक बिल्कुल नहीं सुहाते। वे यह कहकर बात को काटते हैं कि मौसम का बदलना तो सनातन है। जबकि जलवायु परिवर्तन की हकीकत मौसम या ऋतु परिवर्तन से बिल्कुल अलग है। कुछ दिनों या महीनों के अन्तर से मौसम का बदलना चाहे नियमित हो या अनियमित हो, इसे हम ऋतु परिवर्तन या मौसम का बदलना कहते हैं। और इस बदलाव को पृथ्वी के भीतर या बाहर यानी वायुमण्डल की हलचल के कारण समझते आए हैं।

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मौसम के बदलने को हमने प्रकृति की देन समझा और अपने मुताबिक उसे बदलने की कोशिश नहीं की बल्कि खुद उन बदलावों से अनकूलन कर लिया और अपने जीवनयापन के प्रबन्ध उसी के मुताबिक हमने करना सीख लिया। पृथ्वी पर जीव जगत का अनुकूलन पृथ्वी के औसत तापमान के हिसाब से हुआ है। इसीलिए तापमान बढ़ने जैसे प्रतिकूल बदलाव से जीव जगत को बेचैनी होती है। सब स्वीकारते हैं कि प्राकृतिक बदलाव को रोकना मानव के बूते के बाहर है। लेकिन जलवायु परिवर्तन की यह दुर्धटना अगर मानव निर्मित हो तो उसके निराकरण की जिम्मेदारी हमारी ही बनती है। बस वैज्ञानिक यही सिद्ध कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन या भूताप की समस्या मानव निर्मित है और मानव समाज या उसके नियंता यानी राजनीतिक समाज एक जुट होकर भूताप को बढ़ने से रोकने का काम कर सकता है। और इसीलिए सभी देशों ने कई बार मिलबैठकर तय किया है कि वे ऐसे काम धंधे कम से कम करेंगे जिनसे ग्रीन हाउस गैसें निकलती हैं यानी जिनसे पृथ्वी का तापमान बढ़ता हो।

परिवर्तन से कैसे अनुकूलन किया मानव ने

वैज्ञानिक अध्ययनों से निकले तथ्य बताते हैं कि पृथ्वी की रचना के साढ़े चार अरब साल का इतिहास उथल-पुथल भरा रहा है। विभिन्न कालखण्डों में पृथ्वी में तरह-तरह के बदलाव हुए। ये बदलाव चक्रीय क्रम में भी हुए और कई बार अनियमित रूप से भी। और कभी अपरिवर्तन या जड़त्व या स्थिरता के भी दौर रहे। इसका असर मानव जीवन पर पड़ा। खासतौर पर मानव के विकास पर पड़ा।

एंथ्रोपोलॉजी यानी नृतत्वशास्त्रीय अध्ययनों के मुताबिक मानव का सवा करोड़ साल का इतिहास बताता है कि परिवर्तन से बनी परिस्थितियां मानव के अनुकूल नहीं रहीं। फिर भी मानव के पूरे सवा करोड़ साल के इतिहास में रामापिथीकस, आस्ट्रेलोपिथीकस, होमोइरेक्टस, नियंडरथल, और होमो सेपेयंस जाति प्रजाति का मानव इन परिवर्तनों से अनुकूलन करता हुआ अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। वरना जीव की कई प्रजातियाँ तो जलवायु से अनुकूलन ना करने के कारण काल के गाल में समा गईं। बहरहाल पृथ्वी के बड़े परिवर्तनों में चाहे संयोग रहा हो या अनुकूलन के लिए मानव के बुद्धि कौशल रहा हो, पृथ्वीवासी मानव विकास करता हुआ यहाँ तक पहुँचा है। लेकिन बीसवीं सदी के अन्त में हमारे संज्ञान में आया पृथ्वी का विकासक्रम कुछ नई चुनौतियाँ खड़ी कर गया है। उन्हीं में एक जलवायु परिवर्तन की विकट चुनौती है।

प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन अलग बात है

जलवायु परिवर्तन इतिहास का लेखाजोखा भी वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। उस पर गौर करें तो भूताप में परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के बनने-बिगड़ने की कहानी 54 करोड़ साल पीछे जाती है। तब से आज तक ग्लेशियर साइकिल के कई दौर हुए हैं। इनमें सबसे नया दौर अब से एक लाख बीस हजार साल पहले से लेकर अब से साढ़े ग्यारह हजार साल पहले का है।

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भूगर्भशास्त्री आजकल इसे जलवायु के इंटरग्लेशियर साइकिल के नाम से पढ़ते-पढ़ाते हैं। उनका अनुमान है कि पृथ्वी पिछले बारह हजार साल पहले शुरू हुए होलोसीन दौर के बिल्कुल आखिरी कालखंड में है। कुछ ही सदियों या एक दो सहस्राब्दी में यह चक्र भी पूरा होने को है। वैज्ञानिकों का यह भी पूर्वानुमान है की मौजूदा चक्र पूरा होने के बाद फिर हिमयुग की परिस्थितियाँ बनेंगी। और यह भावी युग मौजूदा चक्र से काफी लम्बा होगा बशर्ते मानव उसमें दखलंदाजी ना करें।

भूगर्भशास्त्रियों और पृथ्वी विज्ञान की दूसरी शाखाओं के वैज्ञानिकों के मुताबिक मौजूदा होलोसीन काल पृथ्वी के क्रमिक रूप से तृप्त होने का दौर है। भूताप के कारण ग्लेशियरों का हर साल बढ़ने की तुलना में ज्यादा पिघलना जारी है। और अगर सिर्फ अपने स्वार्थ को ही सामने रख कर देखें तो हमारा सरोकार हिमालय क्षेत्र से ज्यादा है। वैसे पूरी दुनिया के लिये भी यह क्षेत्र कम महत्त्व का नहीं है। और इस समय अपने ग्लेशियरों का पिघलकर छोटा होते जाना या सिकुड़ते जाना भारी चिंता का कारण बना हुआ है।

प्रतिकूल प्राकृतिक बदलाव को तेज तो नहीं कर रहे हम?

अगर भूताप के रूप में जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक घटना भी हो तब भी हमें यह तो देखना ही पड़ेगा कि कहीं हम उस भूताप को और तो नहीं बढ़ा रहे हैं। प्राकृतिक आपदा को भले ही हम न रोक पाएं लेकिन कुछ विलंबित तो कर ही सकते हैं। और अगर प्राकृतिक और मानवनिर्मित दोनों परिस्थियों को जलवायु परिवर्तन का कारण मान लें तो यह निष्कर्ष क्यों नहीं निकाला जा सकता कि मानव निर्मित भूताप को कम करने में तो हमारी बड़ी भूमिका हो सकती है।

पर्यावरण दिवस और गली कूचों की बात

आज के दिन दुनियाभर में पर्यावरण प्रदूषण की फुटकर बातें ज्यादा होती हैं। लेकिन कार्बनिक उत्सर्जन से पैदा खतरा थोक में चिंता का विषय है। ऐसे में उन उद्योगों की बात होना स्वाभाविक है जो ग्रीन हाउस गैसें छोड़ती हैं। मसलन उर्जा के लिए कोयला जलाकर बिजली पैदा करने पर चिंता जताई जानी चाहिए। गली कूचों में कूड़े कचरे को जलाने पर भी उतनी ही चिंता जताई जानी चाहिए।

नगर निगमों को अपने जमा किए कूड़े कचरे को ठिकाने लगाने के ठौर नहीं मिल रहे हैं। चाहे सरकारी संस्थाओं की तरफ चोरी छुपे हो और चाहे गली कूचों में निजी स्तर पर कूड़े के ढेर में आग लगाकर साफ सफाई रखने की कोशिश हो, ये कोताहियां अप्रत्यक्ष रूप से जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने के कारण हैं। अपने देश में नवीनतम संकट को याद करें तो वायु प्रदूषण को लेकर हर शहर का प्रदूषण सूचकांक हम नापने लगे हैं। अभी हम ग्रीन हाउस गैसों की सिर्फ नापतोल ही कर रहे हैं।

इन प्राणघातक गैसों को कम करने का प्रबंध करने में नाकाम ही हैं। कितना अच्छा हो अगर नगर कस्बों में प्र्यावरण दिवस के बहाने कुछ विमर्श समारोह भी आयोजित होने लगें। इन समारोहों में विज्ञान के विद्यार्थियों से हमें यह जानने का मौका मिल सकता है कि पृथ्वी के बदलते पर्यावरण पर वैज्ञानिक कैसी चिंता जा रहे हैं।


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