रंग ला रहे हैं सारस संरक्षण के उपाय

रंग ला रहे हैं सारस संरक्षण के उपाय

राजकीय पक्षी के पर्यावरणीय महत्व पर बढ़ी जागरूकता

सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के राजकीय पक्षी सारस के संरक्षण का प्रयास जनपद के नेपाल सीमा से सटे लोटन ब्लॉक में रंग ला रहा है। लोगों में जागरूकता आने से ग्रामीणों और सारस के बीच मैत्री भाव बढ़ रहा है। इसका परिणाम सारस की संख्या में वृद्धि के रूप में सामने आ रहा है।

राजकीय पक्षी होने के साथ-साथ सारस का पर्यावरण के सूचक के रूप में महत्वपूर्ण स्थान हैै। सारस की उपस्थिति को क्षेत्र की स्वस्थ पारिस्थितिकी का संकेतक माना जाता है। मगर लोगों में जागरूकता की कमी के चलते यह सुन्दर पक्षी संकटग्रस्त पक्षियों की सूची में शामिल हो गया।

सारस पर मंडराते खतरे को देखते हुए सरकार के साथ-साथ गैर सरकारी संस्थाओं ने भी जमीनी स्तर पर कार्य शुरू किया। ऐसे ही प्रयासों के अन्तर्गत वाइल्डलाइफ  ट्रस्ट ऑफ  इंडिया (डब्लूटीआई) ने सरदोराबजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से उन स्थानों पर सारस संरक्षण पर कार्य शुरू किया जहां सारस दिखाई देते थें। इसी के तहत जनपद के लोटन ब्लाक में स्थानीय समुदाय के साथ कार्य शुरू किया गया। 

डब्लूटीआई के कार्यकर्ता रूपेश सिंह बताते हैं, ''लोगों का समूह बनाकर उनके बीच जागरूकता बैठक की जाती है और सारस संरक्षण का महत्व बताया जाता है। इसका परिणाम यह हुआ की लोग सारस के अंडे को बचाने लगे हैैं। सारस का शिकार भी रुका हैै। लोग अब सारस के साथ घुलमिल कर रह रहे हैं।'' क्षेत्र के अजाने का ताल व इसके आस-पास पहले सारसों की संख्या 70 के करीब थी जो दो साल की परियोजना के बाद बढ़कर 108 हो गयी है।

सारस संरक्षण के नतीजे सिर्फ संख्या वृद्वि तक सीमित नहीं है। लोगों के व्यवहार परिवर्तन के रूप में भी परियोजना की सफलता सामने आ रही है। गांव भिटपरा के अली अहमद के घर परिवार के सदस्य की तरह रह रहा सारस इसका उदाहरण है। दरअसल जब अलीअहमद को एक वर्ष पूर्व घायल अवस्था में अपने खेत में सारस मिला तो वे उसे बचाने के लिए अपने घर ले आए, तभी से सारस परिवार व पास-पड़ोस के लोगों के साथ घुल मिल कर रह रहा है। ऐसे उदाहरण क्षेत्र में और भी हैं।

रिपोर्टर - दीनानाथ

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