काले धन पर टैक्स से मिले 30 हजार करोड़ रुपए

काले धन पर टैक्स से मिले 30 हजार करोड़ रुपएनोटों की गड्डियां। फोटो- इंटरनेट

सरकार ने काले धन को सफेद करने का एक अवसर दिया था जिसकी अवधि दिनांक 30 सितम्बर 2016 को समाप्त हो गई। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि 64 हजार करोड़ रुपए की स्वैच्छिक घोषणा की गई जिस पर 45 प्रतिशत का टैक्स सरकार ने ले लिया बाकी 55 प्रतिशत सफेद होकर खाताधारकों के पास चला गया।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपीए सरकार को आदेश दिया था कि ऐसे लोगों की सूची पेश करे जिनका पैसा अवैधानिक तरीके से विदेशों में जमा है। स्विस बैंकों ने सूची दी थी लेकिन मनमोहन सरकार ने सूची अदालत में जमा नहीं किया परन्तु मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए एसआईटी का गठन किया और 600 से अधिक ऐसे खाताधारकों के नाम अदालत में पेश किए। मोदी सरकार ने विदेशी काले धन के साथ ही स्वदेशी कालेधन पर भी प्रहार करने का निर्णय लिया है।

अब सरकार के खजाने में 30 हजार करोड़ रुपए का टैक्स आया है। इसे बानगी समझें तो यह सरकार का सफल प्रयास है। इसके पहले 1997 में तत्कालीन वित्तमंत्री चिदम्बरम ने काले धन की स्वैच्छिक घोषणा की स्कीम चलाई थी और 33 हजार करोड़ की घोषणा हुई थी। तब एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे। आजकल सर्वाधिक काला धन जमीन जायदाद के रूप में रहता है और यदि काले धन पर अंकुश लगेगा तो जमीन के दाम भी घटेंगे। मोदी ने विदेशी धन वापस लाने का वादा किया था और धन वापसी का प्रयास चल ही रहा था कि पनामा पेपर्स के नाम से कुछ दस्तावेज सामने आए जिनके अनुसार पनामा देश की कम्पनियों में भारत के ही 500 लोगों ने धन लगाया है और वह काला धन है। अब पनामा पेपर्स में उल्लिखित 500 भारतीय लोगों का भी पैसा देश में लाना है।

अस्सी के दशक में बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली का पैसा विदेशों में जमा हुआ था जिसकी छानबीन हुई थी। किसी लोटस कम्पनी के नाम से पैसा विदेश में जमा हुआ था। लोगों ने लोटस का अर्थ निकाला था और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव दोनों का एक ही अर्थ होता है, कमल। इस प्रकरण में इटली के क्वात्रोची नाम के दलाल का नाम भी आया था जो नेहरू परिवार का नजदीकी था।

पनामा पेपर्स में जिन भारतीयों के नाम बताए जा रहे हैं उनमें से कुछ तो जाने-माने कांग्रेसी हैं तो क्या यही कारण था जांच की धीमी गति का। कुछ का कहना है उन्होंने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि विदेश में कम्पनी बनाई नहीं खरीदी है, कुछ ने अपना नाम गलत ढंग से लिए जाने की बात कही है और कुछ का तर्क है कि वे एनआरआई हैं जिन पर भारतीय टैक्स के नियम लागू नहीं होते वगैरह-वगैरह। आरोपित 500 लोगों में अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय के नाम भी बताए गए लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि पनामा में उनका कोई धन नहीं लगा है। जो भी हो, भारत के प्रधानमंत्री ने कड़ा रुख अपनाया है और वित्तमंत्री भी जांच पड़ताल में लगे हैं।

बोफोर्स दलाली के पैसे की खोज में वी पी सिंह सरकार और पत्रकारों ने विदेशी बैंकों के दरवाजे खटखटाए थे। वहां पर एक ही लक्ष्य था दलाली में क्वाट्रोची और राजीव गांधी की लिप्तता प्रमाणित करना। जब लोटस कम्पनी का नाम आया और लोटस के माने कमल यानी राजीव बताया गया तो लगा खोज पूरी हो गई। बाद में किसी नतीजे पर नहीं पहुंची जांच। अब तो भानुमती का पिटारा ही खुल गया है, पता नहीं हमारे मीडिया के मौन का राज़ क्या है।

हमारा मीडिया विशेषकर टीवी जो बात-बात में ट्रायल आरम्भ कर देता है अब तक ऐक्शन मोड में नहीं आया है। जर्मनी के जिस खोजी पत्रकार ने खुलासा किया है उसकी सराहना होनी चाहिए और इंडियन इक्स्प्रेस की भी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत के जिन 500 लोगों के नामों की बात कही गई है उनका खुलासा जल्द से जल्ज्द होना चाहिए। यही मौका है चुनावी वादा पूरा करने का। विदेशों में जमा धन को वापस लाने का।

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