अपने वजूद की लड़ाई लड़ते देशी फल

अपने वजूद की लड़ाई लड़ते देशी फलदेशी फल।

अभी पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बच्चे की जन्मदिन पार्टी के दौरान मैं बतौर उपहार एक-एक किलो गुंदी और जंगल जलेबी के फलों की छोटी सी टोकरी सौंप आया। देर रात बच्चे के पिता ने मुझे फोन किया और पहला सवाल सुनने मिला कि आखिर ये है क्या, ये कौन से फल हैं? मैं तो यह सोचते ही रह गया कि जब पिता को इन फलों के बारे में खबर नहीं तो बच्चा क्या खाक समझ पाएगा।

ये दरअसल वो फल हैं जो कभी भी, किसी भी परिवार के डायनिंग टेबल की शोभा नहीं बन पाए। अपने एक फेसबुक मित्र विनोद दुबे की टिप्पणी के आधार पर कहूं तो ये फल तथाकथित सवर्ण फलों के बीच दलितों की तरह है जिन्हें वास्तविक तौर पर सभ्य समाज ने अपनाया नहीं या अपनाने से हमेशा हिचकते रहे।

सच बात ही तो है, क्या कभी आपने सुपरमॉल या डिपार्टमेंटल स्टोर्स पर गुंदी, पकी इमली, जंगल जलेबी, हरफरोड़ी, फालसा, आंवला, तेंदू, कमरख जैसे फलों को बिकते देखा है? आपने जो देखा है वो सेब, माल्टा, कीवी, चेरी और स्ट्राबेरी हैं। तो क्या हम ये मान लें कि हमने विरासत में मिले इन देशी फलों को लगभग पूरी तरह से नकार दिया है? सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इन फलों की तस्वीरों को देख जब लोग ये लिख बैठे कि आपने बचपन की याद दिला दी, मुझे दुख हुआ।

मेरे कई मित्रों द्वारा बचपन के बाद अब इस उम्र में इन फलों को देखा जाना ये दर्शाता है कि हमने अपने गाँवों, वनसंपदाओं और कई फलों को किस हद तक धत्त कर दिया। विदेशी फलों ने हिन्दुस्तानी बाज़ार में ऐसे पैर पसारे कि हमारे देशी फलों को पांव टिकाने तक की जगह नहीं मिल पाई। अंग्रेजी कहावत “एन एप्पल ए डे, कीप्स डॉक्टर अवे” के आते ही हमारे स्थानीय फलों की छुट्टी हो गई। ब्रिटिश शासक जिस देश और भौगोलिक इलाकों से आते थे, वहां सेब की पैदावर तगड़ी थी, सेब के गुण तो वैसे भी तगड़े हैं और इसीलिए ब्रिटिश शासकों के साथ कहावत और फल दोनों हमारे देश में आ गए। हम हिन्दुस्तानी कई मामलों में मानसिक तौर से पहले भी गुलाम थे और आज भी हैं।

अमरूद, आंवला और फालसा जैसे फलों को नकारते हुए हमने भी मान लिया कि एक सेब ही है जो रोगों को भगा सकता है, या बीमार को ही सेब दिया जाए, बाकी सारे फल सब नकारे हैं। आंवले और अमरूद खाने से सर्दी होना, या ज्यादा सेवन से पेट की दूसरी समस्याओं को आमंत्रण देना जैसी गलत बातों को फैलाकर ये भी तय कर दिया गया कि बाजार में जगह उन्हीं फलों को दी जाए जो रोगों को ठीक कर सकते हैं और जो विदेशों से आते हैं। हमने अपने देश के स्थानीय ताजे फलों की पैरवी करने के बजाए, बासी और पेटी-पैक फलों को अपने डायनिंग रूम की शोभा बना दिया, कई बार ये स्टेटस सिंबल भी बन जाते हैं, अस्पताल में रोगी से मिलने जाएं तो सेब की टोकरी साथ ले जाई जाती है।

गुमनामी में अपनी पहचान को जूझ रहे देशी फलों को देहाती फल कहा गया और सेब, माल्टा, चेरी वगैरह को बॉक्स में पैक करके, उनके ऊपर ओके का स्टीकर लगाकर सभ्य और गुणवान बता दिया गया। इसके लिए किसी बाहरी एजेंसी को दोष देना गलत बात है, कसूरवार तो आप और हम ही हैं। आप कार से जा रहे हों और सड़क किनारे जंगल जलेबी बेचते हुए किसी छोटे फुटकर व्यापारी को देखकर क्या कभी रुकते हैं? यदि हां तो ऐसे कितनी बार रुके हैं? मेरी मित्र पेशे से न्यूट्रिशनिस्ट हैं और जब उन्होंने इन फलों की तस्वीर मेरे फेसबुक पेज पर देखी तो भौचक्की रह गईं।

पिछले 12 वर्षों से इस पेशे में रहते हुए उन्होंने हमेशा सेब, संतरा, कीवी, स्ट्राबेरी जैसे फलों की वकालत की है, जाने अनजाने में देशी फलों को नकारने की बात को स्वीकारते हुए उन्होने दु:ख भी जताया। मजे की बात ये है कि इन देशी फलों की न्यूट्रिशनल वैल्यूस, इनमें पाए जाने वाले पोषक तत्वों और फाइबर्स आदि उन तमाम फलों से बेहतर या बराबर ही हैं। मेरा सवाल विदेशी फलों के अपनाने पर नहीं हैं, ये सवाल हमारे अपने देश के फलों को भूलने को लेकर है। कभी इन फलों के गुणों पर खास लिखना भी चाहूंगा, फिलहाल ये चाहता हूं कि आप बच्चों को जरूर इन फलों से रू-ब-रू करवाएं, जब मौका मिले, जैसे मौका मिले..गाँव की तरफ जरूर हो आएं।

(लेखक हर्बल जानकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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