विदेश में खेतिहर मजदूरों को मिलेगा ओवरटाइम, मज़ाक नहीं ये सच्चाई है और भारत के लिए सीख भी

विदेश में खेतिहर मजदूरों को मिलेगा ओवरटाइम, मज़ाक नहीं ये सच्चाई है और भारत के लिए सीख भीदेवेंद्र शर्मा के कॉलम ‘ज‍़मीनी हकीकत’ में इस हफ्ते: भारत में खेतिहर मजदूरों की दशा सुधारने को केंद्र को उठाने हाेंगे ये कदम। फोटो: अभिषेक वर्मा

निर्धारित समय से ज्यादा खेत में काम करने पर खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम यानि उस अतिरिक्त मजदूरी का पैसा मिलने की ख़बर सुनें आप, तो चौंकिएगा नहीं। ये सच है। अमेरिका का कैलिफोर्निया पहला ऐसा राज्य बन गया है जो किसानों को खेत में ओवरटाइम करने का भत्ता देने का कानून लाया है।

भारत के ज्यादातर लोग तो इस बात पर विश्वास ही नहीं करेंगे। किसान और खेतिहर मजदूर भी इस जानकारी को हंसकर मज़ाक बता देंगे लेकिन अमेरिका के संगठित खेतिहर कामगारों के लिए ये 80 साल की लड़ाई के बाद मिली जीत है। ये लड़ाई खेती के कामगारों को वही सम्मान व हक दिलाने की थी, जो कॉरपोरेट क्षेत्र के कर्मचारियों को मिलता है इसीलिए सितम्बर 2016 में जब खेती के कामगारों को अतिरिक्त काम का मेहनताना देने के नियम वाला बिल पास हुआ तो वो इन मुद्दाइयों के लिए एक ऐतिहासिक पल था।

इस बिल के बाद अब कैलिफोर्निया के खेतिहर मजदूरों को अगर प्रति दिन आठ घण्टे से ज्यादा और प्रति सप्ताह 40 घण्टे से ज्यादा काम करना पड़ा तो वे अपने हर अतिरिक्त काम के घण्टे के लिए अतिरिक्त भत्ता पाने के हकदार होंगे। इस कानून की हर तरफ तारीफ हो रही है, बल्कि डेमोक्रेट्स की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने भी इसे सराहा।

हालांकि भारत के खेतिहर कामगार संगठनों को इस तरह के कानून के वित्तीय पहलुओं को समझने में अभी थोड़ा समय लगेगा लेकिन, मेरा मानना है कि इस तरह का कानून भारत में जब भी आएगा - वो देश में आर्थिक समानता लाने की ओर एक बड़ा कदम होगा - जो कि सर्वांगीण विकास का ज़रूरी आधार है। कटाई या थ्रेशिंग के काम के दौरान रात-दिन किसानों को पसीना बहाते देखना मुझे हताशा से भर देता है। क्योंकि, इतनी मेहनत के बाद भी कई बार हमारा किसान दो वक्त के खाने जितना भी नहीं कमा पाता। समाज के इस असहाय वर्ग के लिए आर्थिक न्याय की लड़ाई की तो अभी शुरुआत ही नहीं हुई।

मैं जानता हूं कि अतिरिक्त घंटे काम करने पर अतिरिक्त पैसे देने के इस नियम को भारत में लागू करने की बात उठते ही बहुत से बड़े किसान जो खेतों में मजदूरों से काम कराते हैं वो नाराज़ हो जाएंगे, क्योंकि कोई भी अतिरिक्त पैसा नहीं देना चाहता। इसी तरह के विरोधों का सामना मनरेगा के कानून को भी करना पड़ा था, जब किसानों ने कहना शुरू कर दिया था कि इस योजना से कृषि मजदूर घट रहे हैं।

ओवरटाइम भुगतने के कानून से भारत में किसान, सरकार और उत्पाद के मूल्यों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस बात को समझना ज़रूरी होगा। अमेरिका में भी ये कानून कोई रातों-रात नहीं बन गया बल्कि 80 वर्षों के संघर्ष और विमर्श के बाद ये बिल पास हुआ।

जिस दिन यह बिल पास होकर कानून बना, इसे लिखने वाले लॉरेन गोन्ज़ालेज़ ने कहा, ‘यह एक ऐतिहासिक दिन है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘उनको (खेतिहर मजदूरों को) भी अब उतना ही सम्मान मिलेगा जितना अन्य क्षेत्रों के किसी कामगार को मिलता है।’

मेरा भी ठीक यही मानना है। एक खेतिहर मजदूर भी उतनी ही मेहनत करता है जितनी औद्योगिक क्षेत्र का कोई मजदूर करता है, तो उसे बराबरी की सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए? खेतिहर मजदूरों को नीची नज़रों से क्यों देखा जाना चाहिए? उन्हें भी समान सुविधाएं और सम्मान पाने का हक है।

अमेरिका में भी किसानी के बड़े-बड़े समूहों ने इस बिल को रुकवाने के लिए लामबंदी की थी। उन का मत था कि खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम का भुगतान दिलवाने का नियम खेत मालिकों का खर्च बढ़ा देगी, जिससे खाने की चीज़ों के दाम बढ़ेंगे और उपभोक्ता परेशान होंगे। कुछ हद तक, ये वाद ठीक भी था इसीलिए इस विषय को अगर भारत से जोड़कर सोचें तो हमें ऐसा तरीका निकालना होगा जिससे किसानों पर भार न बढ़े और वे स्वयं खेतिहर मजदूरों की वित्तीय मदद को प्रोत्साहित हों। ये जद्दोजहद करनी ही पड़ेगी क्योंकि सभी असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों में खेतिहर मजदूरों की स्थित सबसे ज्यादा खराब है, और एक अच्छा भविष्य उनका हक है।

खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम देने के कानून को भारत में लाने का अगर सोचा जाए तो यहां भी किसान संगठनों द्वारा भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है। विरोध जायज़ इसलिए भी होगा क्योंकि भारत में 82 प्रतिशत किसान छोटे और मंझोले की श्रेणी में आते हैं। साथ ही खेती में लगे कुल कार्यबल का 52 प्रतिशत हिस्सा ऐसे किसान हैं जिनके पास खुद की ज़मीन नहीं तो वो कमाई के लिए या तो मनरेगा या दूसरों के खेतों में मजदूरी पर निर्भर हैं।

इस सब को ध्यान में रखते हुए देश में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने वाली संस्था कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस (सीएसीपी) को ये हिसाब लगाना चाहिए कि यदि खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम का पैसा दिया जाने लगे तो किसान पर खेती का अतिरिक्त खर्च कितना बढ़ेगा। इससे आए नतीजे को संस्था को एमएसपी निर्धारित करते समय ध्यान रखना होगा।

अमेरिका में भी खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम का भुगतान करने के नियम को कई चरणों में लागू किया गया। लॉस एंजेलेस टाइम्स के मुताबिक 1938 में अमेरिका में ‘फेडरल फेयर लेबर स्टैंडर्ड एक्ट’ के ज़रिए पहली बार खेतिहर मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की गई थी और ओवरटाइम भुगतान के नियम को शामिल नहीं किया गया। साल 1941 में आए एक कानून ने भी खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम भुगतान के नियम से बाहर रखा। साल 1976 में जाकर स्टेट इंडस्ट्रियल वेलफेयर कमीशन ने खेती के मजदूरों के लिए ओवरटाइम भुगतान की अनुमति दी लेकिन तब खेती के मजदूरों के लिए काम के घण्टे ज्यादा रखे गए थे। कहा गया था कि खेतिहर मजदूर तभी ओवरटाइम का भुगतान पा सकेगा अगर वो प्रति दिन दस घण्टे और प्रति सप्ताह 60 घण्टे काम करता है। अन्य क्षेत्रों के मजदूरों के लिए ओवरटाइम भुगतान के नियम के घण्टों की सीमा कर रखी गई थी - प्रतिदिन आठ घण्टे और प्रति सप्ताह 40 घण्टे। इन अंतर को खत्म करने में तब से अब तक चालीस साल लग गए।

भारत में खेतिहर मजदूरों को ओवरटाइम देने के कानून पर अगर कभी भी विचार किया जाता है तो इसे लागू करने से पहले ‘फार्मर इनकम कमीशन’ स्थापित करने की बेहद आवश्यकता होती है। कमीशन ही ये भी तय करेगा कि एक खेतिहर मजदूर का जायज़ प्रतिदिन का कितना भुगतान बनता है।

अन्य क्षेत्रों के मजदूरों की तरह ही हमारे देश के खेतिहर मजदूरों को भी कानूनी तौर पर निर्धारित 9,100 प्रतिमाह की मजदूरी क्यों नहीं मिलनी चाहिए? मुझे तो ऐसा न हो पाने का कोई कारण नहीं नज़र आता। मजदूरों का भुगतान बढ़ाने के फैसले के साथ ही किसानों को मिलने वाला फसलों का दाम भी बढ़ाना होगा।

भारत को इस दिशा में बढ़ना ज़रूरी इसलिए भी है क्योंकि खेती से जुड़े 52 प्रतिशत लोगों के पास खुद की कोई ज़मीन नहीं। इससे प्रधानमंत्री का भी सपना पूरा होगा, जिसमें वो कहते हैं ‘सबका साथ, सबका विकास’।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके अपने विचार हैं)

Share it
Top