शिक्षकों के न पढ़ाने का खामियाजा क्यों भुगतें बच्चे? 

शिक्षकों के न पढ़ाने का खामियाजा क्यों भुगतें बच्चे? फोटो साभार - उड़ान इंडिया  

शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 16 के अनुसार किसी विद्यालय में प्रवेश प्राप्त बालक/बालिका को किसी कक्षा में नहीं रोका जाएगा या विद्यालय से प्रारम्भिक शिक्षा पूरी किए जाने तक निष्कासित नहीं किया जाएगा। इसी अधिनियम की धारा 30(1) के अनुसार किसी बालक/बालिका से प्रारम्भिक शिक्षा होने तक कोई बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी।

केन्द्रीय सरकार की कैबिनेट ने अगस्त 2017 के पहले सप्ताह में सरकार की कक्षा 8 तक बच्चों को अनुत्तीर्ण न करने की नीति वापस ले ली। अब बच्चों को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए कक्षा 5 व 8 की परिक्षाओं में उत्तीर्ण होना होगा।

गाँव कनेक्शन

प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर परीक्षा की बहाली के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि परीक्षा न होने से बच्चों ने सीखना बंद कर दिया है और उनकी क्षमता का स्तर बहुम गिर गया है। किंतु सवाल यह है कि पढ़ाई-लिखाई का स्तर गिरने का मुख्य कारण शिक्षकों का न पढ़ाना है अथवा बच्चों का न पढ़ना। बच्चों को तो कुछ आता नहीं, इसीलिए व सीखने के उद्देश्य से वह विद्यालय गया है। अब यदि वह विद्यालय जाकर भी नहीं सीख रहा तो दोष किसका माना जाएगा? छोटे बच्चे से तो हम यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपने आप पढ़ेगा। उसे तो शिक्षक या मां-बाप को ही पढ़ाना पड़ेगा। यदि मां-बाप अनपढ़ हैं तो पढ़ाने-लिखाने की पूरी जिम्मेदारी शिक्षक पर ही आ जाती है। यानी बच्चा यदि नहीं सीख रहा तो यह इसलिए हो रहा है कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारी नहीं पूरी कर रहा।

ऐसे विद्यालय हैं जहां कक्षा 7 तक परीक्षा नहीं होती और पढ़ाई-लिखाई बहुत उच्च कोटि की होती है। उदाहरण के लिए जिद्दू कृष्णमूर्ति की विचारधारा पर चलने वाले जितने विद्यालय हैं वहां प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर परीक्षा नहीं होती। इसी तरह का एक विद्यालय है लखनऊ का स्टडी हाॅल। इस विद्यालय की यह विशेषता है कि यह अपना प्रचार नहीं करता। यानी यह शिक्षा को व्यवसाय नहीं मानता। इन विद्यालयों में शिक्षा का स्तर अच्छा इसलिए है क्योंकि उनको चलाने वाले यह मानते हैं कि शिक्षा बच्चे के समग्र विकास के लिए है और शिक्षा की प्रकिया रुचिपूर्ण होनी चाहिए। यदि भय या प्रलोभन का इस्तेमाल शिक्षा में किया जाएगा तो बच्चा कुंठित मानसिकता के साथ बड़ा होगा।

यदि बच्चे पर इस बात के लिए जोर डाला गया कि वह अच्छे अंक लाए तो बच्चे के अंदर प्रतियोगिता की भावना उत्पन्न होगी। अग्रणी तो कुछ बच्चे ही होंगे। जो पिछड़ जाएंगे और उन्हें यदि यह समझ में आ गया कि वे अपनी काबिलियत के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकते तो वे अवैध तरीकों का इस्तेमाल करेंगे। यहीं से भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है। असल में भ्रष्टाचार तो हमारी शिक्षा व्यवस्था ही हमें सिखा देती है। परीक्षा में नकल करना हमारे जीवन का पहला भ्रष्टाचार होता है।

मानव संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में प्राथमिक स्तर पर 4.34 प्रतिशत बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी तो माध्यमिक स्तर पर 17.86 प्रतिशत ने। यदि हम मान लें कि करीब इतने ही बच्चे ऐसे हैं जो बाल दासता के शिकार होने के कारण कभी किसी विद्यालय का मुंह तक नहीं देखते तो हिन्दुस्तान में कक्षा 8 पहुंचते-पहुंचते आधे बच्चे शिक्षा व्यवस्था के बाहर होते हैं।

अनुत्तीर्ण न करने की नीति इसलिए लागू की गई थी ताकि भारत के आधे बच्चे जो कक्षा 8 की दहलीज पार नहीं कर पाते उन्हें कक्षा 8 तक तो कोई बाधा का सामना नहीं करना पड़े और ज्यादा संख्या में बच्चे हाई स्कूल, इण्टरमीडिएट और उच्च शिक्षा के स्तर तक पहुंच पाएं।

साभार इंटरनेट।

यदि कक्षा 5 और 8 में परीक्षा से तय होगा कि कौन बच्चा आगे पढे़गा तो आइए देखें किनके असफल होने की ज्यादा सम्भावना है। गरीब परिवारों के बच्चों, जो ज्यादातर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अल्पसंख्यक श्रेणी से होंगे, के मां-बाप शायद ज्यादा पढ़े-लिखे न हों और न ही वे इतने सक्षम हों कि अपने बच्चों के लिए ट्यूशन लगवा पाएं। जिसका नतीजा यह होगा कि सामान्य मध्यम वर्ग के बच्चों के सामने वह कमजोर साबित होंगे। लड़कियां, जिनसे पढ़ने-लिखने के साथ यह भी अपेक्षा होगी कि वे घर के कामों में भी हाथ बटाएं या कहीं-कहीं पूरा ही घर का काम देखें और जरूरत पड़ने पर छोटे भाई-बहनों का भी ख्याल रखें, भी प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकती हैं। लड़कियां तो वैसे भी जैसे-जैसे ऊपर की कक्षाओं में पहुंचती हैं और विद्यालय घर से दूर होने लगता है तो परिवार उनके विद्यालय जाने के पक्ष में नहीं रहता। यही कारण है कि प्राथमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने के प्रतिशत से कहीं ज्यादा माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने का प्रतिशत है। माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने वाले छात्रों में बड़ी संख्या लड़कियों की होती है।

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छोटी उम्र में बच्चे को ससफल करने से उसके आत्मविश्वास को भी ठेस पहुंचती है। एक बार बच्चा असफल हो गया तो भले ही दूसरे मौके में वह परीक्षा उत्तीर्ण कर ले लेकिन चूंकि उसके शुरू के साथी सभी एक कक्षा ऊपर जा चुके होंगे उसके लिए हमेशा यह शर्मिंदगी की बात होगी कि वह एक कक्षा पीछे हो गया। ऐसे ही बच्चों के विद्यालय छोड़ने की सम्भावना भी अधिक होगी।

होना तो यह चाहिए था कि जो बच्चे कमजोर हैं शिक्षक उनपर ज्यादा ध्यान देकर उन्हें कक्षा के शेष बच्चों के स्तर तक लाएं। यदि शिक्षक रूचि लेने लगे तो कोई वजह नहीं कि कोई बच्चा पढ़ाई में पिछड़ जाए। इसके लिए शिक्षकों का बच्चों पर लगातार ध्यान रखना जरूरी है जिसका प्रावधान सतत मूल्यांकन की प्रकिया में था। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 से यह अपेक्षा की गई थी कि कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों के विद्यालय जाने के लिए अनुकूल माहौल का निर्माण करेगा। किंतु अनुत्तीर्ण न करने की नीति वापस लेकर सरकार ने अधिनियम की भावना के विपरीत काम किया है।

(लेखक के ये अपने विचार है, लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। )

लेखकः संदीप पांडे

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