वन इंडिया नीति को स्वीकारे चीन 

वन इंडिया नीति को स्वीकारे चीन भारत की वन इंडिया नीती को स्वीकारे चीन । 

वर्तमान वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में जिस प्रकार के बदलाव देखे जा रहे हैं, वे नई विश्व-व्यवस्था (न्यू वर्ल्ड आर्डर)) की संभावनाओं की ओर भी इशारा करते हैं। नई विश्व व्यवस्था को देखते हुए जरूरी है कि एशिया की दो ताकतें यानि भारत और चीन अग्रगामी कूटनीति का अनुसरण कर नई विश्व-व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाएं ताकि एशिया विश्व व्यवस्था के केन्द्र के रूप में स्थापित हो सके।

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लेकिन क्या ऐसा संभव है? ऐसे में जरूरी है दोनों देश एक-दूसरे के ‘वन नेशन’ सिद्धांत का आदर करें लेकिन क्या चीन जिस तरह से ‘वन चाइना पॉलिसी’ को लेकर संवेदनशील है, उसी तरह से वह ‘वन इंडिया पॉलिसी’ के प्रति भी संवदेना रखता है?

भारत-चीन वार्ता में एक दशक तक बीजिंग की तरफ से वार्ताकार रहे दाई बिंगुओ ने एक बार पुनः चीन के रुख का उल्लेख करते हुए कहा है कि ‘अगर भारत अपनी पूर्वी सीमा पर चीन की चिंताओं का ख्याल करता है, तो बीजिंग भी दूसरी तरफ भारत की चिंताओं के अनुरूप कदम उठाएगा।’ यही नहीं दाई बिंगुओ ने पुस्तक ‘स्ट्रैटेजिक डायलॉग्स’ में खुलासा किया था कि वर्ष 2012 में दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हो गए थे कि वे सीमा विवाद के मसले पर दोनों इलाकों में ‘सार्थक और स्वीकार्य सामंजस्य बिठाने की कोशिश करेंगे।’ ध्यान रहे कि चीन तवांग या फिर इसका बड़ा हिस्सा चाहता है और इसके बदले पश्चिमी सीमा पर भारत को वैसी ही रियायत देने को तैयार है। यहां पर चीन की मंशा और महत्वाकांक्षा को लेकर कुछ प्रश्न है।

पहला यह कि वह चीन जो दशकों तक अक्साई चिन को अपने कब्जे में रखने के लिए भारत को तवांग देने के लिए तैयार रहा, अब वह आखिर अक्साई चिन देकर तवांग क्यों चाहता है? दूसरा यह कि जब यह भारत और तिब्बत को विभाजित करने वाली मैकमोहन रेखा को नहीं मानता तो फिर म्यांमार और तिब्बत को विभाजित करने वाले इसी रेखा को क्यों स्वीकारता है?

तीसरा प्रश्न यह है कि क्या यह इतिहास के उन मसलों में हमें उलझे रहना चाहिए जो कब के प्रासंगिकता खो चुके हैं? हालांकि यह सच है कि ब्रिटिश भारत की सीमा निर्धारण संबंधी नीतियां शिनजियांग और तिब्बत से भारत को अलग करने वाली एक स्पष्ट सीमा रेखा तय करने में नाकाम रही थी जबकि दूसरे क्षेत्रों में ब्रिटिश-भारतीय नेतृत्व ने कहीं अधिक बारीकी से सीमा निर्धारण का काम किया था।

इसका प्रमुख कारण यह था उस समय ब्रिटिश भारतीय शासकों की प्रमुख चिंता देश की सम्प्रभुता व सुरक्षा की नहीं थी बल्कि उनके लक्ष्य भू-राजनीतिक व आर्थिक लाभों से प्रेरित थे। यही स्थिति कमोबेश चीन की थी। यानि चीन की भी प्रमुख चिंता भारत और तिब्बत के बीच स्पष्ट सीमा निर्धारण नहीं थी, बल्कि उसकी दिलचस्पी चीन व तिब्बत के बीच के सीमा निर्धारण और राजनीतिक रिश्ते में अधिक थी।

अब मैकमोहन रेखा को लेकर कम्युनिस्ट चीन की आपत्ति यह है कि इस रेखा पर सहमति ब्रिटिश भारतीय नेतृत्व और तिब्बती नेतृत्व के बीच बनी थी और तिब्बत सम्प्रभु देश न होकर चीन का राज्य है इसलिए तिब्बतियों को एक सम्प्रभु देश के साथ इस प्रकार का समझौता करने का विधिसम्मत अधिकार ही नहीं था। लेकिन सवाल यह उठता है कि 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सेना अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में घुसी और असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर स्थित तेजपुर तक चली आयी, तो वह लेकिन वापस लौटने का निर्णय लिया और उस सीमा रेखा तक पीछे हट गयी जिसे मैकमोहन रेखा कहा जाता है।

तकनीकी रूप से यहां पर एक तथ्य का उल्लेख करना और आवश्यक है, वह यह कि चीनी-भारतीय सीमा को लेकर विवाद की बात असल में गुमराह करने वाली है क्योंकि भारत और चीन वास्तव में 1962 में ही पड़ोसी बने, जब चीन ने लद्दाख के उस विशाल क्षेत्र पर बलपूर्वक अपना अधिकार जताया जिसे अक्साई चीन कहते हैं। इससे पहले तक भारत और चीन के बीच तिब्बत के रूप में एक बफर राज्य था। चीन यदि सीमा के संबंध में किसी प्रकार का दावा करता था तो उसे भारत और तिब्बत के बीच हुए सीमा समझौते के अनुसार ऐसा करना चाहिए था जो पहले से चला आ रहा था।

ध्यान रहे कि 1956 में चाउ एन लाई ने कहा था कि ‘हालांकि चीन ने कभी मैकमोहन लाइन को मान्यता नहीं दी, मगर यह एक ‘निर्विवाद तथ्य’ है, जिसे हमें स्वीकार कर लेना चाहिए......। आखिर चाउ ने वक्तव्य किस आधार पर दिया था और फिर 1959 में वे अपने इस वक्तव्य से क्यों पलट गए? 1959 में चाउ ने अपने पत्र में मैकमोहन लाइन के बारे में ‘कमोबेश यथार्थवादी’ रुख अपनाने की बात कही और अप्रैल 1960 में अपनी भारत यात्रा के दौरान उन्होंने कहा था कि, ‘जिस तरह से चीन पूर्वी सीमा पर भारत के नजरिये के साथ तालमेल को तैयार है, भारत को भी पश्चिम में चीन की बात माननी चाहिए।

इस अदला-बदली का प्रस्ताव चीन उस समय पुनः रखा जब 1979 में 12 से 18 फरवरी को भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन दौरे पर गये। उस समय डेंग जियांगपिंग ने वाजपेयी के समक्ष एक आधिकारिक ‘पैकेज प्रस्ताव’ रखा था। उल्लेखनीय है कि डेंग ने दोनों सीमाओं के इलाकों के लेन-देन के आधार पर व्यापक समाधान की बात कही थी। लेकिन वाजपेयी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पूर्वी सीमा पर थोड़े-बहुत फेरबदल के जरिये समाधान हासिल करने के बाद ही अक्साई चीन की तरफ बढ़ा जा सकता है।

हालांकि डेंग इलाका-दर-इलाका (एरिया-बाइ-एरिया) वाले भारतीय दृष्टिकोण को अस्वीकार कर दिया। परन्तु कई दौर की वार्ता के बाद भी मामला भारत के ‘इलाका-दर-इलाका’ और चीन के ‘व्यापक समझौते’ में उलझा रहा। दाई बिंगुओ का ताजा बयान इस बात का संकेत है कि तीन दशक बाद भी चीन अपने परम्परागत रुख पर कायम है।

ब्रिटिश मानचित्रकार और सर्वेक्षक डब्ल्यू.एच. जानसन ने 1865 में इस सीमा का सर्वेक्षण किया था तथा कुनलुओन श्रंखला तक के क्षेत्र को निर्धारित किया था जिसमें अक्साई चिन को जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा दिखाया गया था। उनके सर्वेक्षण से पहले सितम्बर 1842 की चुसुल की संधि ने दोनों देशों के बीच कुनलुओन पर्वत श्रंखला को सीमा माना था। यह संधि कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह और तिब्बत तथा चीन के प्रतिनिधियों के बीच हुई थी।

हेनरी मैकमोहन ने जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत, भूटान तथा म्यांमार जैसे उसके पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के लिए शिमला सम्मेलन का आयोजन किया तो उनका ध्यान खास तौर पर पूर्वी दिशा की ओर था जहां उन्होंने ब्रिटिश भारत और तिब्बत तथा भूटान एवं म्यांमार के बीच एक 550 मील लम्बी रेखा को सीमा-रेखा (आर्डर) के रूप में सुनिश्चित किया था।

हालांकि उसी शिमला सम्मेलन में जब नक्शों का आदान-प्रदान हुआ तो मैकमोहन ने पश्चिमी भाग के लिए पहले की सीमा बंटवारे का पालन किया और कुनलुओनव श्रंखला को आउटर तिब्बत की सीमा माना। शुरुआत में चीन (कोमिंतांग सरकार के समय) ने भी पश्चिमी भाग में इसे ही बाहरी तिब्बत सीमा के तौर पर स्वीकार किया। सत्ता पर कब्जा जमाने के तुरंत बाद माओत्से तुंग के पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाइना ने जो पहला नक्शा अपनाया उसमें भी बाहरी तिब्बत की सीमा कुनलुओन श्रंखला ही थी।

यही कारण है कि शिनजियांग से जब चीनी पीएलए ने तिब्बत में प्रवेश किया तो वह अक्साई चीन के रास्ते नहीं आई बल्कि अक्साई चीन से 150 किमी पूर्व में स्थित कुनलुओन श्रंखला के दर्रों का प्रयोग किया था। अब सवाल यह उठता है कि बिंगुओ जिस अक्साई चीन के साथ अदला-बदली की बात कर रहे हैं, वह भी तो भारत का ही है। इसलिए भारत अपने हिस्सों से ही अदला-बदली करने की गलती कैसे कर सकता है?

(लेखक अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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