एसिड, यूरिया और डिटर्जेंट से बने मिलावटी दूध की पौष्टिकता बढ़ाकर क्या हासिल होगा

एसिड, यूरिया और डिटर्जेंट से बने मिलावटी दूध की पौष्टिकता बढ़ाकर क्या हासिल होगा

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने हाल ही में संसद को बताया कि देश में बिकने वाला 68 प्रतिशत दूध मिलावटी है। यह जानकर देश में किसी को कोई हैरानी नहीं हुई। असल में, पिछले 30 बरसों से मैं तमाम खबरों में पढ़ता आ रहा हूं दूध और दुग्ध उत्पादों में मिलावट की घटनाएं कितनी आम हो चुकी हैं।

दुग्ध पदार्थो में व्यापक स्तर पर हो रही यह मिलावट इंसान की सेहत के लिए बहुत हानिकारक है, लेकिन इसे रोकने की जगह भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) दूध के सुदृढ़ीकरण पर जोर देने पर उतारू है। दूध के सुदृढ़ीकरण का मतलब है दूध में विटामिन वगैरह मिलाकर उसे और पौष्टिक बनाना। अब जिस दूध में भारी मात्रा में मिलावट हो उसकी पोषकता बढ़ाने से क्या फायदा। उदाहरण के लिए पंजाब में, मिलावटी दूध और दुग्ध पदार्थों के खिलाफ महीने भर चले अभियान में लिए गए दूध और दुग्ध पदार्थों के नमूनों में से 40 फीसदी फेल हो गए।

कुछ जिलों में तो 70 से 80 फीसदी नमूनों में मिलावट पाई गई। ऐसे में जब शौचालय साफ करने में इस्तेमाल होने वाले सल्फ्यूरिक एसिड को यूरिया और डिटर्जेंट के साथ मिलाकर नकली पनीर और नकली दूध बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है दूध के सुदृढ़ीकरण से किस तरह का लाभ होगा?

पहली बार नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन(एनआईएन) ने बच्चों में ऑर्गेनोफास्फेट वर्ग के रासयनिक कीटनाशकों की मौजूदगी पर एक विस्तृत शोध किया। इसमें पाया गया कि अमेरिका, यूरोप और कनाड़ा के बच्चों की तुलना में अकेले हैदराबाद के बच्चों के शरीर में भोजन के जरिए 10 से 40 गुना ज्यादा कीटनाशक पहुंच रहा है। मौजूदा समय में भारत में खाद्य सुरक्षा के जो मानक हैं उस आधार पर यह मानने में दोराय नहीं है कि देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले बच्चे लगभग इतना ही जहरीला या इससे ज्यादा जहरीला भोजन खा रहे हैं।

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एक दूसरे अध्ययन में नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने पाया कि बाजार में मौजूद पैकेटबंद खाने के 65 में से 21 नमूनों में जीएम (जेनेटिकली मॉडीफाइड) उत्पादों के अंश थे।( जीएम फसलें या आनुवंशिक तौर पर संशोधित फसलें ऐसी फसलें हैं जिनके जीन में किसी दूसरे जीव का जीन डालकर उनमें मनचाहे गुण पैदा किए जाते हैं।) इनमें नाश्ते में खाया जाने वाला दलिया, खाना बनाने वाले तेल, झटपट तैयार होने वाले स्नैक्स, प्रोटीन सप्लीमेंट यहां तक कि बेबी फूड भी शामिल थे।

इससे भी बुरी बात यह थी कि इनमें से 74 फीसदी आयातित और 96 फीसदी घरेलू खाद्य पदार्थों के पैकेटों के लेबल पर इस बात का कहीं उल्लेख नहीं था कि उनमें जीएम उत्पादों के अंश हैं। हालांकि, नागरिक संगठन कई बरसों से चेतावनी दे रहे थे कि बाजार में जीएम तत्वों वाले खाद्य पदार्थों की भरमार है लेकिन एफएसएसएआई जनता के स्वास्थ्य रक्षा के मद्देनजर कोई भी कदम उठाने में नाकाम रहा।

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यह सब उस समय हो रहा है जब भारत में आयातित खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों के अवशेषों या जीएम तत्वों को नापने के लिए न कोई निगरानी व्यवस्था है और न ही उनके देश में प्रवेश पर रोक लगाने की व्यवस्था का बुनियादी ढांचा मौजूद है। इसलिए बेहतर होगा कि जैविक खाद्य पदार्थों के अलावा बाजार में मौजूद दूसरे खाद्य पदार्थों के लेबल पर स्पष्ट शब्दों में लिखा जाए: "इन्हें उगाने में रासायनिक कीटनाशक/उर्वरक का इस्तेमाल किया गया है" ताकि उपभोक्ता के पास पूरी जानकारी के साथ इन्हें खरीदने या न खरीदने का विकल्प हो। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर बाजार में खाद्य पदार्थों पर लेबल लगा होगा तो बच्चों के लिए बाजार से फूड प्रॉडक्ट खरीदने वाले माता-पिता दोगुनी सजगता दिखाएंगे। असल में एफएसएसएआई को अपने समय और ऊर्जा का इस्तेमाल लोगों को यह बताने में करना चाहिए कि वे क्या खा रहे हैं, क्या इसमें हानिकारक रसायन हैं या नहीं। यहां तक कि जो लोग जानबूझकर या अनजाने में रसायनों की मदद से उगाया भोजन खा रहे हैं, उन्हें भी यह जानने का अधिकार है कि वे क्या खा रहे हैं।

एक और सवाल है कि जो दूध हम रोज पी रहे हैं जब उसमें मिलावट के अलावा खतरनाक रसायन भी मौजूद हैं, तो जैविक दूध के लिए मानदंड तय करने का क्या मकसद है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि अपनी सारी ऊर्जा जैविक दूध के बाजार पर खर्च करने की बजाय एफएसएसएआई अपना ध्यान साफ-सुथरे दूध और दुग्ध उत्पादों को मुहैया कराने पर केंद्रित करे?

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फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स (ऑर्गेनिक फूड) रेगुलेशंस, 2017 (जो 1 जुलाई 2018 से लागू हुआ है, और जिस पर फिर से विचार किया जा रहा है) के मुताबिक जैविक खाद्य पदार्थों की शुद्धता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उन्हें उत्पादन, प्रसंस्करण और वितरण हर स्तर पर जांचा जा सके। इसे ट्रेसेबिलिटी कहा गया है। लेकिन सवाल यह है कि ट्रेसेबिलीटी को केवल जैविक पदार्थों के लिए ही जरूरी क्यों बनाया जाए। यह एक स्वागतयोग्य तथ्य है कि 2013-15 से 2016-17 के बीच भारत में प्रामाणिक जैविक उत्पादों में 38 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इस समय देश में 8.35 लाख किसान लगभग 14.9 लाख हेक्टेयर जमीन पर ऑर्गेनिक या जैविक खेती कर रहे हैं, और इनकी तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।

आज अपनी खेती में रसायनों का इस्तेमाल करने वाले किसानों को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है लेकिन जैविक खेती करने वाले किसान को जैविक खेती का प्रमाणपत्र बनवाने का खर्चा उठाना पड़ता है। हालांकि सीधे उपभोक्ताओं को अपने उत्पाद बेचने वाले छोटे जैविक किसानों को इससे छूट मिली हुई है लेकिन उन्हें भी खुदरा विक्रेताओं की जरूरत तो होती है। पर अब छोटे किसान भी बिना प्रमाणन के खुदरा व्यापारियों को अपना उत्पाद नहीं बेच सकते। ऐसे में जब रसायनमुक्त खेती करने वाले किसानों के लिए जैविक उत्पादों का एक टिकाऊ बाजार खोजना सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा है, इस तरह के कदमों से उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। मेरे विचार से सबसे अच्छा तरीका तो यह है कि पहले बाजार में मौजूद खाद्य उत्पादों के लेबल पर यह लिखा जाए कि इस उत्पाद को उगाने में रसायनों का इस्तेमाल किया गया था।

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जिस तरह से सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी लिखी होती है कि सिगरेट पीना आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसी तरह उपलब्ध खाद्य पदार्थों के पैकेटों के ऊपर भी लिखा होना चाहिए कि इसमें रसायनों के तत्व मौजूद हैं। इसके बाद लोगों को फैसला लेने दें। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर इस तरह की स्पष्ट चेतावनी दी गई होती तो हैदराबाद के स्कूली बच्चों के अभिभावक अपने बच्चों को कुछ भी खिलाने से पहले दोबार जरूर सोचते। भारत में भोजन के स्तर पर इसी तरह की क्रांति की जरूरत है। भूलिए मत, आप जैसा खाते हैं वैसे ही बन जाते हैं।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं। उनका ट्विटर हैंडल है @Devinder_Sharma उनके सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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