कॉर्पोरेट कर छूट खत्म किए बिना अमीर और बनावटी किसानों पर टैक्स लगाने से नहीं होगा देश को फायदा

कॉर्पोरेट कर छूट खत्म किए बिना अमीर और बनावटी किसानों पर  टैक्स लगाने से नहीं होगा देश को फायदादेविंदर शर्मा

मैं समझ नहीं पा रहा हूं। एक ओर तो सरकारी आमदनी बढ़ाने के लिए कृषि आय पर कर लगाने की मांग ज़ोर पकड़ रही है और दूसरी ओर सरकार समृद्ध और प्रभावशाली वर्गों को मज़े से करों में भारी भरकम छूट प्रदान कर रही है।

कहने का मतलब ये हुआ कि गरीब से लो और अमीर को दो इसलिए जब कुछ दिन पहले एक टीवी एंकर ने मुझसे पूछा कि समृद्ध किसानों को क्यों कराधान की तहत न लाया जाए तो मेरा सीधा उत्तर था, ‘इंडिया स्पेंड के अनुसार, 2014-15 आकलन वर्ष में छूट पाने के लिए 2014 में करदाताओं द्वारा घोषित कृषि आय 9,338 करोड़ रुपए थी। अगर आप इस आय पर कर लगा भी दोगे तो इस संख्या का एक तिहाई यानी लगभग 3000 करोड़ रुपए का ही राजस्व आपको कर के रूप में मिल पाएगा। इसे जब आप 2013-2016 की मात्र तीन वर्ष की अवधि के दौरान कॉर्पोरेट सेक्टर को दिए गए 17.5 लाख करोड़ रुपए की कर में छूट के सामने रखोगे तो ये तो समुद्र में एक बूंद बराबर भी नहीं दिखेगा।’

ज़रा सोचिये, ऐसे समय में जब आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के आंकड़े हमें बता रहे हैं कि 17 राज्यों में एक कृषक परिवार की औसत आय महज़ 20,000 रुपए प्रति वर्ष है, ऐसे में आयकर की बात भी करना यह दर्शाता है कि नीति निर्धारक ज़मीनी हकीकत से कितना दूर है।

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अतः जो प्रश्न वास्तव में पूछा जाना चाहिए वो ये है कि क्या कृषि आय पर कर लगाने का वास्तविक उद्देश्य कर में उन बड़ी-बड़ी छूटों पर पर्दा डालना तो नहीं जो प्रत्येक वर्ष उद्योग के क्षेत्र को दी जा रही हैं। संसद में दिए गए उत्तर के अनुसार वर्ष 2015 -16 में ही 6.11 लाख करोड़ रुपए की कर छूट दी गयी थी। गत 13 वर्षों की अवधि में, 2004 -2005 और 2016 -2017 के बीच बजट दस्तावेजों में छोड़े गए राजस्व (रेवेन्यू फोरगॉन) के तहत कर में दी गई छूट की कुल राशि 55 लाख करोड़ से भी अधिक है।

जी हां, आपने सही सुना , 55 लाख करोड़ ! जब मैंने इस मुद्दे को एक टीवी कार्यक्रम में उठाया तो भाजपा के प्रवक्ता ने इसे मेरी 'औपनिवेशिक मानसिकता' ठहरा दिया। मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 36,359 करोड़ रुपए के कृषि ऋण माफ़ किए तब भी यही आपत्ति दर्ज़ की गयी थी। हालांकि भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कृषि ऋण की माफ़ी को ईमानदार क्रेडिट संस्कृति के विरुद्ध बताया उन्हें उद्योग के क्षेत्र में प्रदान की गई ऋण माफ़ी की भारी भरकम राशि पर कोई आपत्ति नहीं हुई। प्रधान आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम ने तो उद्योगों के ऋण माफ़ करने को अच्छी आर्थिक नीति तक बता डाला और कहा कि पूंजीवाद तो इसी तरह काम करता है।'

इंडिया रेटिंग्स के अनुसार निकट भविष्य में चार लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टे खाते में डाले जाने की सम्भावना है।

यह सारा बवाल तब उठा जब नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने राष्ट्र के संसाधनों में वृद्धि करने के लिए कृषि पर कर लगाने की ज़ोरदार सिफारिश की। ऊपर बताए गए कारणों के मद्देनज़र औद्योगिक कर रियायतों को समाप्त किए बिना मुझे कृषि आय पर कर लगाने का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है लेकिन जब वह कृषि आय के रूप में काले धन को छुपाए जाने की प्रवृत्ति से निजात पाने के लिए निजी आय पर एक निश्चित सीमा के बाद कर रियायत को समाप्त करने की बात करते हैं तो इससे मैं स्वयं को सहमत पाता हूं। विख्यात वैज्ञानिक प्रशासक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने कृषि को कर के दायरे में लाने की बात पर सवाल उठाए थे लेकिन उन अमीर लोगों पर कर लगाने की पेशकश स्वीकार की थी जो कृषि को कालाधन छिपाने का जरिया समझ रहे थे। उन्होंने ट्वीट करके कहा,‘उन अमीर किसानों पर कर लगाने के अन्य तरीके हो सकते हैं जिनके पास आमदनी के अनेक स्त्रोत हैं।’

किसान संगठन लगातार उद्योगपतियों को दी जाने वाली रियायतें खत्म करने की मांग करते रहे हैं

मैं उनसे सहमत हूं। यदि राज्य कुछ विशेष प्रकार की कृषि आय पर कर लगा सकते हैं, जैसे चाय, कॉफ़ी, रबर, मसाले इत्यादि, तो फिर संदिग्ध स्रोतों से हुई कृषि आय को कर के दायरे में लाने के लिए भी राज्य सरकारें कोई प्रणाली ईजाद कर सकती हैं लेकिन संपूर्ण कृषि क्षेत्र को कर के दायरे में लाना और छोटे व हाशिये पर कार्य कर रहे किसानों से वार्षिक आय विवरण भरवाना बेवकूफी है।

मैं उनसे सहमत हूं। यदि राज्य कुछ विशेष प्रकार की कृषि आय पर कर लगा सकते हैं, जैसे चाय, कॉफ़ी, रबर, मसाले इत्यादि, तो फिर संदिग्ध स्रोतों से हुई कृषि आय को कर के दायरे में लाने के लिए भी राज्य सरकारें कोई प्रणाली ईजाद कर सकती हैं लेकिन संपूर्ण कृषि क्षेत्र को कर के दायरे में लाना और छोटे व हाशिये पर कार्य कर रहे किसानों से वार्षिक आय विवरण भरवाना बेवकूफी है। इसकी अनुशंसा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की प्रभावशाली लॉबी द्वारा की जा रही है जिन्हें इससे बहुत लाभ होगा। इससे भी बुरी बात यह है कि कृषि आय को कर के दायरे में लाने की मांग उन लोगों द्वारा उठाई जा रही है जो औद्योगिक कर रियायत पाने वालो में सर्वाधिक लाभ उठाने वाले रहे हैं।

ज़रा सोचिये, ऐसे समय में जब आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के आंकड़े हमें बता रहे हैं कि 17 राज्यों में एक कृषक परिवार की औसत आय महज़ 20,000 रुपए प्रति वर्ष है, ऐसे में आयकर की बात भी करना यह दर्शाता है कि नीति निर्धारक ज़मीनी हकीकत से कितना दूर है

ज़रा सोचिये, ऐसे समय में जब आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के आंकड़े हमें बता रहे हैं कि 17 राज्यों में एक कृषक परिवार की औसत आय महज़ 20,000 रुपए प्रति वर्ष है, ऐसे में आयकर की बात भी करना यह दर्शाता है कि नीति निर्धारक ज़मीनी हकीकत से कितना दूर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार गत 21 वर्षों में 3.18 लाख किसानों ने आत्महत्या की है और कई राज्य उत्तर प्रदेश में लागू की गई ऋण माफ़ी योजना की तरह अपने-अपने राज्यों में ऋण माफ़ी योजना लागू करने की सम्भावना पर विचार कर रहे हैं।

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ऐसे में मुझे बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी मोनसैंटो इंडिया के कृषि आय से 94.40 करोड़ के कर रियायत के दावे को स्वीकृत करने का कोई औचित्य नहीं दिखता। एक और बड़ी बीज कंपनी, कावेरी सीड्स ने 186. 63 करोड़ की छूट का दावा किया और कर चुकाने से पूर्व 215. 36 करोड़ का लाभ कमाया। जैसा की बिबेक देबरॉय ने अपने ट्वेल्व रीज़न्स वाय लेख (इंडियन एक्सप्रेस, 03 मई 2017) में बताया 2015 में कम से कम 307 व्यक्तियों ने 01 करोड़ प्रति वर्ष से अधिक आय घोषित की थी। उन्हें अवश्य ही कर के दायरे में लाना चाहिए। कुछ विख्यात राजनेताओं द्वारा भी कृषि से बड़ी आय का दावा किए जाने की खबरें है जो पूर्णतः अविश्वसनीय है। उनसे भी कर की उगाही की जानी चाहिए।

एक और विक्षुब्ध करने वाली प्रवृत्ति सामने आ रही है। कई नौकरशाह ‍व व्यापारी केवल अपनी बेहिसाब आय को ठिकाने लगाने के लिए ज़मीन खरीद रहे हैं। यह प्रवृत्ति बढ़ ही रही है और चिंता का विषय है। मेरा सुझाव है कि वेतनभोगी वर्ग के लिए किसी भी जुड़ी हुई आय (जिसमें कृषि आय शामिल हो) पर कर लगना चाहिए।

एक और विक्षुब्ध करने वाली प्रवृत्ति सामने आ रही है। कई नौकरशाह ‍व व्यापारी केवल अपनी बेहिसाब आय को ठिकाने लगाने के लिए ज़मीन खरीद रहे हैं। यह प्रवृत्ति बढ़ ही रही है और चिंता का विषय है। मेरा सुझाव है कि वेतनभोगी वर्ग के लिए किसी भी जुड़ी हुई आय (जिसमें कृषि आय शामिल हो) पर कर लगना चाहिए। इसका कारण सीधा है। कर से छूट केवल उन्हीं को प्राप्त होनी चाहिए जो पूर्णकालिक किसान हो, उन्हें नहीं जो नियमित रूप से तनख्वाह ले रहे हो क्योंकि इसका मतलब है कि उनके पास खेती करने का वक़्त नहीं फिर जिस कार्य में उनका योगदान नहीं उसके लिए वह कर में छूट का दावा कैसे कर सकते हैं? इसी प्रकार, व्यापारी वर्ग के लिए, कोई भी जुड़ी हुई आय (कृषि आय सहित) जो 15 लाख की वार्षिक सीमा से अधिक हो उस पर कर लगना चाहिए। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि यदि वे पूर्णकालिक किसान नहीं है तो उन्हें कृषि कर रियायतों का लाभ नहीं मिलना चाहिए लेकिन उससे भी पहले बीज कंपनियों को कृषि आय के तहत कर से छूट देने का प्रावधान निरस्त कर दिया जाना चाहिए।

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समृद्ध किसानों (जिनके पास बड़े-बड़े फार्महाउस हैं और कृषि सहित जिनकी आय के दो स्रोत है ) पर कर लगाने कार्य का काफी विलम्बित हो गया है लेकिन इसके साथ ही उद्योग जगत को कर में भारी भरकम रियायतें दिए जाने के प्रावधानों को भी खत्म कर दिया जाना चाहिए अन्यथा इस कदम का परिणाम उल्टा ही होगा। फिर भी मुझे संदेह है कि सरकार उद्योग जगत को दी जा रही कर रियायतों को ख़तम करने के लिए राजनीतिक साहस जुटा पाएगी क्योंकि ये उद्योगपति ही हैं जो चाहते हैं कि समृद्ध किसान तो कर के दायरे में लाए जाए पर स्वयं इन्हें दी जा रही भारी-भरकम रियायतों पर आंच न आए। कोशिश करके देखिए और आप देखेंगे कि उद्योग जगत द्वारा चलायी जा रही मीडिया किस तरह औद्योगिक कर रियायतों के पक्ष में बोल उठेगी। मुझे विश्वास है अरविंद सुब्रमण्यम कहेंगे, ' पूँजीवाद इसी प्रकार कार्य करता है।’

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं। ट्विटर हैंडल @Devinder_Sharma)

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