नौकरी छोड़ लोगों को कर रहीं थैलीसीमिया के प्रति जागरूक 

नौकरी छोड़ लोगों को कर रहीं थैलीसीमिया के प्रति जागरूक थैलीसीमिया जैसी लाइलाज बीमारी का ईलाज सिर्फ खून।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। वर्ष 2008 तक टीचर की नौकरी करने वाली शिखा सिंह थैलीसीमिया के बारे में जानती तक नहीं थीं, लेकिन आज लोगों को इस लाइलाज बीमारी के बारे के प्रति जागरूक करती हैं।

बरेली की रहने वाली शिखा सिंह बरेली और आस-पास के जिलों के बच्चों को मुफ्त रक्त उपलब्ध कराती हैं। शिखा बताती हैं, “वर्ष 2008 में जब बरेली शिफ्ट हुई तो मेरे पति के बड़े भाई जो यहीं पर श्रीसिद्धविनायक नाम से अस्पताल चलाते हैं और इस संस्था के चेयरमैन हैं,उन्होंने मुझे इसकी जानकारी दी, लेकिन तब मैं इसके बारे में जानती तक नहीं थी और मैंने इसके बारे में पढ़ना शुरू किया।”

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आज शिखा सिंह अपने गैर सरकारी संस्था दया दृष्टि और श्रीसिद्धविनायक अस्पताल की मदद से थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए डे केयर सेंटर चलाती हैं। दयादृष्टि संस्था थैलेसीमिया मेजर बच्चों को मुफ्त में रक्त संचारण की सुविधा उपलब्ध कराती है।

वो आगे कहती हैं, “थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चे को हर पंद्रह से बीस दिन में रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है और हर बार में ढाई से तीन हजार रुपए लगते हैं, लेकिन यहां पर हम मुफ्त में रक्त संचारण की व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं। अभी बरेली और आस-पास के जिलों के 90 से ऊपर बच्चे हमारे पास रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से 70 बच्चे हमारे पास रेगुलर आते रहते हैं।” शिखा सिंह शिविर लगाकर लोगों को जागरूक भी कर रही हैं।

“बच्चों में थैलीसीमिया के लक्षण सात महीनों से साल भर में दिखाई देने लगते हैं, इसका इलाज सिर्फ बोन मैरो ट्रांसप्लांट या स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन है, जोकि बहुत महंगा होता है। इसलिए जागरूकता ही बचाव है।" उन्होंने आगे कहा।

शिखा सिंह

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नई पीढ़ी को करती हैं जागरूक

“बच्चों में थैलीसीमिया के लक्षण सात महीनों से साल भर में दिखाई देने लगते हैं, इसका कोई इलाज नहीं, इसलिए हम इसके लिए लोगों को जागरूक करते हैं। इसका इलाज सिर्फ बोन मैरो ट्रांसप्लांट से ही होता है, जोकि बहुत महंगा होता है, इसके लिए रक्तदान जरूरी होता है।” उन्होंने आगे कहा, शादी के लिए ब्लड कुंडली मिलाना जरूरी है।

थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों का कोई इलाज नहीं होता, इससे बचने के लिए जागरूक होना चाहिए। शिखा ने आगे कहा, “शादी के पहले लोग कुंडली मिलाते हैं, जबकि लोगों को इसके लिए ब्लड की जांच करानी चाहिए, क्योंकि ये एक जेनेटिक बीमारी होती है और अभिभावक से बच्चों में होती है।”

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