शहरों की तुलना में गाँवों में मिर्गी के रोगी दाेगुने

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इटावा। उत्तर प्रदेश ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग द्वारा मिर्गी रोग (ऐपिलेप्सी) पर आधारित एकदिवसीय मिर्गी के साथ स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन निदेशक डाॅ. ब्रिगेडियर टी. प्रभाकर ने किया।

इस अवसर पर निदेशक डाॅ. ब्रिगेडियर टी. प्रभाकर ने बताया कि मिर्गी (ऐपिलेप्सी) का सही समय पर इलाज शुरू किया जाए तो कुछ वर्षों में मिर्गी के अधिकतर रोगी ठीक हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में यह जानना जरूरी है कि मिर्गी रोग में इलाज अन्य रोगों की तुलना में थोड़ा लंबा चलता है। इस रोग का सबसे चिन्ताजनक पहलू लोगों के अन्दर रोग के प्रति अज्ञानता, अंधविश्वास और जागरुकता की कमी का होना है। यही इस रोग (मिर्गी रोग) के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण भी है। इन सबके चलते आज विश्व में लगभग सात करोड़ लोग तथा भारत में करीब एक करोड़ बीस लाख लोग मिर्गी रोग से पीड़ित हैं। 

विभागाध्यक्षा डाॅ. अर्चना वर्मा तथा वरिष्ठ न्यूरोफिजिशियन डाॅ. रमाकान्त यादव ने इस रोग के लक्षणों के बारे में बताया कि मिर्गी या ऐपिलेप्सी का रोगी अचानक बेहोश हो जाता है तथा उसके हाथ-पैरों में ऐंठन आ जाती है मुंह से झाग निकलने लगता है और मरीज अपना संतुलन खो देता है, जिसके कारण मरीज कभी-कभी गिर भी जाता है।

उन्होंने बताया कि अभी भी देश के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में लोग मिर्गी (ऐपिलेप्सी) का दौरा पड़ने पर डाॅक्टर के पास जाने के बजाय ओझा या मंदिरों और मजारों के चक्कर लगाते हैं। अभी भी लोग इसे झाड़-फूंक से ठीक हो जाने वाला रोग मानते हैं और जब व्यक्ति सब जगह से निराश हो जाता हैं और रोग बढ़ जाता है तो वह डाॅक्टर के पास पहुंचता है जो निराशाजनक है। डाॅ. अर्चना वर्मा ने बताया कि सही समय पर इलाज न होने कारण तथा रोग की गंभीरता को न समझने के कारण मिर्गी रोग शहरी क्षेत्र की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में दोगुना है। 

रिपोर्टर - मसूद तैमूरी

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