समय से करें गन्ने में रोगों की रोकथाम

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लखनऊ। महंगा बीज, खाद में हजारों रुपए खर्च करने के बाद भी कई बार फसल में लगने वाले रोग और कीट से फसल को नुकसान हो जाता है। किसान सही समय पर इनका प्रबंधन कर इनसे छुटकारा पा सकते हैं। 

लखीमपुर जिले के किसान संजय त्यागी ने 20 बीघा में गन्ना लगाया है, उनके गन्ने के पौधों में रोग लग गया है, जिससे गन्ने का तना लाल हो गया है। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार शाह कहते हैं, “किसानों को ये जानना बेहद जरूरी होता है कि गन्ने की फसल को कौन से रोग से नुकसान हो रहा है और उनके रोकथाम के लिए किसान क्या कर सकते हैं।”

वो आगे बताते हैं, “गन्ने की फसल में अलग-अलग महीने अलग रोग का प्रकोप हो जाता है, सही प्रबंधन से नुकसान से बचा जा सकता है।”

कड़ुआ रोग (अप्रैल से मई तक)

रोग ग्रस्त गन्ने की पत्तियां पतली, नुकीली और पोरियां लम्बी हो जाती हैं। प्रभावित गन्नों में छोटे या लम्बे काले कोड़े निकल आते हैं, जिन पर कवक के असंख्य बीजाणु स्थित होते हैं। इस रोग का प्रभाव पेड़ी गन्ने में अत्यधिक होता है।

रोकथाम : रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए। रोगी थान को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि स्वस्थ गन्नों में दुबारा संक्रमण न हो सके। प्रभावित खेत में कम से कम एक वर्ष तक गन्ना नहीं बोना चाहिए। 

समुचित जल निकास की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे बारिश में फसल में पानी का जमाव न हो। रोग प्रभावित खेत में कटाई के बाद उसमें पत्तियों एवं ठूठे को पूरी तरह जलाकर नष्ट कर देना चाहिए तथा खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए।

अंकुर बेधक : उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में अंकुरण से चार महीने तक इसका प्रकोप रहता है। इसके लारवा वृद्धि बिन्दुओं को बेधकर मृत केन्द्र बनाते हैं जिसमें से सिरके जैसी बदबू आती है।

 रोकथाम : अंकुर बेधक के प्रकोप से ग्रस्त गन्नों को निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए। एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन के अन्तर्गत ट्राइकोग्रामा कीलोनिस के 10 कार्ड प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के लिए क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

अगोले की सड़न (जुलाई से सितम्बर तक) 

ऊपर की नई पत्तियां शुरु में हल्की पीली या सफेद पड़ जाती हैं जो बाद में सड़ कर नीचे गिर जाती हैं। यह रोग बारिश में अधिक लगता है तथा गन्ने की बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

रोकथाम: रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का ही प्रयोग करना चाहिए। पौधशालाओं के लिए खेत का चयन में समुचित जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। ताकि बारिश होने पर पानी का जमाव न हो सके। ट्राइकोडर्मा 2.5 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से 75 किग्रा गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए।

उकठा रोग (अक्टूबर से फसल के अन्त तक) 

प्रभावित थान के गन्नों की पोरियों का रंग हल्का पीला हो जाता है। गन्ने का गूदा सूख जाता है और भूरा हो जाता है।

रोकथाम : रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का ही प्रयोग करना चाहिए। स्वस्थ बीज गन्ना की बुवाई करना चाहिए। ट्राइकोडर्मा 2.5 किग्रा0 प्रति हेक्टेयर की दर से 75 किलो गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए।

तना बेधक : कीट का प्रकोप वर्षा काल के बाद जल भराव की स्थिति में अधिक पाया जाता है। यह कीट तनों में छेद करके इसके अन्दर प्रवेश कर जाता है और पोरी के अंदर का गुदा खा जाता है, जिसके कारण उपज में कमी आती है।

रोकथाम : गन्ने की सूखी पत्तियों को काट कर अलग कर देना चाहिए। एकीकृत नाशीजीवी प्रबंधन के अंर्तगत ट्राइकोडर्मा कीलोनिस के दस कार्ड प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिन के अंतराल पर शाम को प्रयोग करना चाहिए। मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत मिली दो लीटर प्रति हेक्टेयर 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। 

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