नोटबंदी : थम सा गया है पॉलिसी का बाज़ार, बीमा एजेंट हो रहे परेशान

नोटबंदी : थम सा गया है पॉलिसी का बाज़ार, बीमा एजेंट हो रहे परेशानबड़े नोट बंद होने से ग्राहकों को काफी दिक्कत हो रही है।

अश्विनी द्विवेदी (कम्यूनिटी जर्नलिस्ट)

लखनऊ। देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी के कार्यालयों में भारत सरकार द्वारा 1000 और 500 के नोट बंद होने के बाद सन्नाटा हो गया है। बीमा व्यवसाय पर भी व्यापक असर पड़ा है।

बीमाधारक हो रहे परेशान

हालांकि, इस विषय पर निगम के लखनऊ डिविज़न के वरिष्ठ प्रबंधक प्रशांत दीक्षित का कहना है, "नोट बंदी से निगम पर कोई खास असर नहीं है।" दूसरी तरफ भारतीय जीवन बीमा निगम के 10 लाख अभिकर्ताओं की रोजी-रोटी पर संकट जरूर आ गया है। अभिकर्ताओं की माने तो निगम का 50 से 70 फीसद व्यवसाय ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे ग्राहक जैसे किसान, मजदूर, फेरी वाले, मोची, कुम्हार, पटरी दुकानदार इत्यादि से आता है। इनमें से अधिकांश के पास बैंक खाते तक नहीं हैं और अगर हैं भी तो हजार दो हजार की छोटी बचत वह बैंक के बजाय सीधे बीमा में जमा कर रहे थे, जो की अब नहीं हो पा रहा है।

तीन बार में होती है नोटों की जांच

एलआईसी के उत्तर प्रदेश के लखनऊ डिवीज़न के महामंत्री मनोज अवस्थी का कहना है, "एलआईसी में रुपया तीन स्तर पर चेक होता है। पहले नोट अभिकर्ता चेक करता है। फिर शाखा कार्यालय और फिर बैंक चेक करती है। साथ ही, एलआईसी एंटी मनी लांडरिंग के सारे नियमों का भी पालन करती है। 49 हजार से ज्यादा के नकद व्यवहार पर पैन कार्ड लिया जाता है। ऐसे में एलआईसी जैसी पारदर्शी कार्यशैली के चलते यहां कोई फर्जीवाड़ा नहीं किया जा सकता।"

बीमा एजेंट का कमीशन भी बंद

वे कहते हैं कि गौरवशाली संस्था को पुराने नोटों को स्वीकार करने की छूट केंद्र सरकार को देनी चाहिए। बड़े अधिकारियों द्वारा बयान न देने और स्थिति सामान्य होने की बात पर मनोज ने कहा कि निगम के समूह का सबसे बड़ा हिस्सा अभिकर्ता है और वो प्रभावित हो रहा है। अधिकारियों का क्या है उनकी वेतन में अभी कोई कटौती तो हो नहीं रही लेकिन अभिकर्ता जो पैसे जमा ग्राहकों से इकट्ठा करके कंपनी में जमा करता है उसमें मिलने वाली कमीशन से अभिकर्ताओं का जीवनयापन होता है।

विकल्प देना जरूरी

लिहाफी के ट्रांसगोमती महामंत्री अशोक पांडेय का कहना हैं, "वे मोदी का बहुत सम्मान करते हैं। मोदी चाहते हैं कि लोगों का सारा पैसा बैंक में जमा हो। बैंकों में लाइन लगी हुई है। कर्मचारी भी मेहनत कर रहे हैं और हमारे ऑफिस में कर्मचारी से लेकर अभिकर्ता के पास नाममात्र का काम है। एलआईसी को भी यदि विकल्प दिया जाता तो एक तो पारदर्शी तरीके से पैसा जमा होता। दूसरे अभिकर्ता भी चार पैसे मिलने से खुशहाल रहते हैं। दस लाख अभिकर्ताओं के परिवार का भी ध्यान रखे सरकार।"

तब तो नहीं मिलेगा कोई भी क्लेम

लिहाफी के उत्तर प्रदेश के लखनऊ डिवीज़न के अध्यक्ष सीबी पांडेय ने बताया, "अभिकर्ताओं के सामने काफी दिक्कतें आ रही हैं। ख़ासकर वे अभिकर्ता ज्यादा परेशान हैं जिनका अधिकांश व्यवसाय छोटे वर्गों में है। अब काम नहीं तो इनकम नहीं। अभिकर्ताओं की बैठक बुलाई गई है, जिसमें सर्वसम्मति लेकर मोदी जी से भारत वर्ष में सक्रिय 10 लाख से ज्यादा बीमा अभिकर्ताओं रोजी-रोटी और उनके हितों का ध्यान रखने की अपील की जाएगी। वहीं, अभिकर्ता दिवाकर बताते हैं, "नोटबंदी के चलते हमें जो दिक्कत है वह तो हो ही रही है। ग्राहकों को भी असुविधा हो रही है। इस दौरान जिन ग्राहकों की पॉलिसी लैप्स हो रही है उन्हें यदि कुछ हो गया तो एलआईसी तो क्लेम देगी नहीं क्योंकि पॉलिसी बंद है। इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी। लोग आखिरी में पकड़ते बीमा अभिकर्ता को है।"

भारत की अर्थव्यस्था में एलआईसी की भूमिका

भारतीय अर्थव्यवस्था में एलआईसी सबसे बड़ी निवेशक है। 31 मार्च, 2015 की निगम की रिपोर्ट के अनुसार अब तक समाज के हित में कुल निवेशित निधियां उन्नीस लाख छियालीस हजार दो सौ उन्चास करोड़ की विशाल राशि है। यही नहीं भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में 1956-61 वर्ष में एलआईसी का सकल निवेश 184 करोड़ रुपये था। यह सहभागिता प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में निरंतर बढ़ी और वर्ष 2012-17 की योजना में आज एलआईसी की सहभागिता सात लाख बावन हजार छः सौ तेतीस करोड़ रुपए है। ऐसे में भारत में आर्थिक बदलाव के समय भारतीय अर्थव्यव्यवस्था के मजबूत सहयोगी एलआईसी की सहभागिता न होना अपने आप में प्रश्न चिन्ह है।

एलआईसी देश का सबसे बड़ा बीमा उपक्रम

  • 2048 शाखा कार्यालय
  • 1381 सेटलाइट कार्यालय
  • 113 मंडल कार्यालय
  • 8 आंचलिक कार्यालय
  • 10 लाख से ज्यादा अभिकर्ता
  • लगभग 32 करोड़ बीमा धारक


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