मुनाफे का सौदा साबित हो रही आड़ू की खेती 

Sudha PalSudha Pal   28 Feb 2017 1:59 PM GMT

मुनाफे का सौदा साबित हो रही आड़ू की खेती आम, अमरूद, केला जैसे प्रमुख फलों के उत्पादन के साथ ही प्रदेश के किसान आड़ू की खेती भी अपना रहे हैं।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। आम, अमरूद, केला जैसे प्रमुख फलों के उत्पादन के साथ ही प्रदेश के किसान आड़ू की खेती भी अपना रहे हैं। किसान कम समय में अच्छा उत्पादन देने वाले इस फल का उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। प्रदेश के तराई क्षेत्रों में उचित जलवायु होने की वजह से आड़ू की अच्छी पैदावार हो रही है।

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सहारनपुर जिले के अश्विनी कुमार (52 वर्ष) मुख्य रूप से आड़ू की खेती करते हैं। चरथावल ब्लॉक के खुर्द गाँव के रहने वाले अश्विनी कुमार अपने पिता के साथ कई वर्षों से आड़ू की खेती कर रहे हैं। वे बताते हैं, “मेरे पिताजी बीरबल सिंह लगभग 20 साल से आड़ू की खेती करते चले आ रहे हैं। मैं भी उनके साथ इस व्यवसाय से जुड़ा हूं। हमारे यहां लगभग 30 बीघा जमीन पर 400 से ऊपर ही आड़ू के पेड़ लगे हुए हैं।”

जिला मुख्यालय से लगभग 12 किमी की दूर गाँव के अश्विनी कुमार ने पारंपरिक खेती में बागवानी फसलों को भी जगह दी। उन्होंने आम, लीची के साथ आड़ू की फसल को इसलिए चुना क्योंकि तराई क्षेत्र से सटे होने की वजह से जिले की जलवायु आड़ू की खेती के लिए बेहतर है। “इसकी खेती में ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता है। पौधे लगाने के तीन साल के अंदर ही फल मिलना शुरू हो जाता है। एक बीघे में लगभग 22 पेड़ लग गए हैं। हर पेड़ से 50 से 60 किलो फल तो मिल जाता है।”

अश्विनी कुमार ने आगे बताते हैं। प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बुलंदशहर और मुरादाबाद में मुख्य रूप से इसकी खेती की जाती है। इसके साथ ही सहारनपुर मंडल के लगभग 135 हेक्टेयर में लगभग 19 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर में आड़ू की खेती की जाती है।

यहां की जलवायु अच्छी है। किसान यहां आम भी लगाते हैं लेकिन आड़ू की भी अच्छी पैदावार करते हैं। आड़ू को बढ़ावा देने के लिए कई अन्य जिलों में भी लोग आड़ू की खेती करने जा रहे हैं। बरेली में भी विभाग से आड़ू के लगभग 80 हजार पौधे मंगवाए गए हैं। इससे फल उत्पादन का स्तर भी बढ़ेगा।
राजेश प्रसाद, जिले के संयुक्त निदेशक

“मैंने गन्ने के साथ आड़ू की खेती शुरू की है। 16 बीघे में लगभग 800 पौधे आड़ू के लगाए हैं। जहां आम का पेड़ समय लेता है फल देने में वहीं ये बस 2-3 साल में फल देने लगता है। आम के पेड़ थे लेकिन बाद में इसमें मुनाफा देखकर इसको लगाने का सोचा।” ये कहना है मेरठ के मछरा ब्लॉक में रहने वाले हरीश चन्द्र का। हरीश चन्द्र (62 वर्ष) नंगली अबदुल्ला गाँव के रहने वाले हैं और सब्जियों के साथ फलों का भी उत्पादन करते हैं। उनका कहना है, “फसल तैयार होने पर दो साल के लिए उसे किसी और को दे देते हैं (ठेके पर)।”

आड़ू की किस्में- प्रभात, प्रताप, फ्लोरडा प्रिंस, अर्ली ग्रैंड, शान-ए-पंजाब

आड़ू के लिए प्रचलित है सहारनपुर की नर्सरी

मैंने सहारनपुर के विभाग से आड़ू के पौधे लिए थे क्योंकि वहां की नर्सरी काफी प्रचलित है।” जिले में स्थित रिसर्च सेंटर में अच्छी किस्म के पौधे जलवायु को ध्यान में रखते हुए वहां विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए जाते हैं। कई जिले के किसान यहां पौधे ले जाते हैं। हरीश चन्द्र, किसान

इस समय फसल में फूल आ चुके हैं। मटर जैसे दाने आ चुके हैं। मार्च तक ये तेजी से बढ़ेंगे और लगभग अप्रैल तक पूरी तरह से फल पककर तैयार हो जाएगी।
अश्विनी कुमार, किसान (सहारनपुर)

दो-तीन साल में ही आने लगते हैं फल

आड़ू के फल आम से पहले ही बाजारों में आना शुरू हो जाते हैं। इसी वजह से इस फल को बेहतर कीमत मिलती है, जिससे किसानों को भी फायदा होता है। खाने के साथ इस फल का प्रसंस्करण करके इससे कई तरह के खाद्य पदार्थ भी बनाए जाते हैं। जैम, जूस, जैली, केक और अन्य कई पेय पदार्थों में इस फल का उपयोग किया जाता है। इसलिए इसकी मांग भी है। इसके साथ यह फल क्षेत्र की मंडी में ही बिक जाता है। किसानों को अपना उत्पादन बेचने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता है और उन्हें आसानी से उनके उपज का अच्छा मुनाफा मिल जाता है।

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