stories

पांच सौ दिव्यांग छात्रों पर सिर्फ एक शिक्षक

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। काकोरी के प्राथमिक विद्यालय दसदोई में पांच दिव्यांग छात्र हैं लेकिन वो केवल उपस्थिति ही दर्ज़ कराने आते हैं क्योंकि इस स्कूल में दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए एक भी शिक्षक नहीं है। ये हाल केवल एक स्कूल का नहीं है, प्रदेश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में यही स्थिति है।

आरटीआई से प्राप्त जानकारी के तहत यूपी में वर्ष 2001 में लगभग 10 लाख 36 हजार दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए मात्र दो हजार शिक्षक ही नियुक्त किए गए। इस हिसाब से 518 दिव्यांग बच्चों पर मात्र एक अध्यापक नियुक्त है, वह भी संविदा पर, जबकि नियम के आधार पर प्राथमिक विद्यालय के लिए दो दिव्यांग बच्चों पर एक शिक्षक और पूर्व माध्यमिक विद्यालय के लिए पांच बच्चों पर एक शिक्षक की जरूरत होती है।

लखनऊ मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर काकोरी गाँव स्थित प्राथमिक विद्यालय दसदोई में पढ़ने वाले पांच दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ महीने पहले तक सप्ताह में एक या दो बार कुछ समय के लिए शिक्षक संजीव मिश्रा आते थे, लेकिन अब उनका स्थानान्तरण कहीं और हो जाने के बाद इस स्कूल में दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई ठप पड़ी है।
स्कूल में छह बच्चे हैं इनमें से चार मंदबुद्धि हैं और एक को सुनने और बोलने में दिक्कत है। पहले एक शिक्षक आते थे, लेकिन अब कोई नहीं आता। मंदबुद्धि बच्चों को हम लोग अपने स्तर से पढ़ाने व समझाने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन वह समझते ही नहीं हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक की जरूरत है, इसके लिए अधिकारियों के सामने निवेदन भी किया गया पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
दुर्गादेवी दीक्षित, प्रधान शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय दसदोई

आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू है, ज़ीरो रिजेक्शन पॉलिसी लागू है, जिसके तहत हर तरह के बच्चे की शिक्षा की नि:शुल्क व अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन कुल आबादी के तीन प्रतिशत विकलांग व 10 से 15 प्रतिशत अक्षम बच्चे आज भी विशेष शिक्षकों के अभाव में शिक्षा से वंचित हैं।

रायबरेली के स्कूलों में दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक अभय प्रकाश श्रीवास्तव कहते हैं, “हम शिक्षकों की यह चाह है कि ज्यादा से ज्यादा स्कूलों में दिव्यांग बच्चों को शिक्षित कर सकें।”

उन्होंने बताया कि हालांकि मैं अपने स्तर से बच्चों को बेहतर शिक्षा ही देता हूं और इसके लिए मुझे मुख्यमंत्री द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है, लेकिन हर कोई शिक्षक चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहा। हमारी मजबूरी है कि चाहकर भी हम बच्चों को उस तरह शिक्षित नहीं कर सकते जिस तरह से करना चाहिए क्योंकि दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं।”

प्राथमिक विद्यालय बरखपुर, रायबरेली में कक्षा चार में पढ़ने वाले दिव्यांग जितेन्द्र जो कि अस्थि विकलांगता से ग्रसित हैं के पिता उदयराज कहते हैं, “मेरा बेटा स्कूल तो लगभग हर रोज ही जाता है, लेकिन उसको पढ़ाया केवल सप्ताह में एक दिन ही जाता है। ऐसे में उसकी पढ़ाई का आखिर फायदा ही क्या है? पर इसके लिए शिक्षक भी जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि जैसा हमको बताया जाता है कि जब सरकार ने विशेष शिक्षकों की भर्ती ही ठीक तरह से नहीं की है तो वह भी क्या कर सकते हैं।”

नहीं हुई स्थायी नियुक्ति

अभय ने कहा कि दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति तो कभी हुई ही नहीं। वर्ष 2005 से संविदा पर हम शिक्षकों को नियुक्त किया गया है। अभय कहते हैं, “एक ओर जहां हम शिक्षकों की यह खासियत है कि हम सामान्य बच्चों को तो पढ़ा ही सकते हैं लेकिन दिव्यांग बच्चों को खासतौर पर पढ़ाने की ट्रेनिंग लिए हुए हैं। इसके बावजूद हम शिक्षकों को मात्र 13 हजार दो सौ रुपये मासिक वेतन मिलता है। इसके विपरीत प्राथमिक स्कूलों में सामान्य बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक 35 से 40 हजार रुपये मासिक वेतन उठा रहे हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).