कुम्हारों की गुहार, हस्तशिल्प को मिले बढ़ावा 

कुम्हारों की गुहार, हस्तशिल्प को मिले बढ़ावा मिट्टी की कमी भी कुम्हारों के लिए बनी दिक्कत

दीपांशु मिश्रा/देवांशु मणि तिवारी, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। विधानसभा चुनाव का परिणाम आ चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों के और लोगों की तरह कुम्हारों को भी नई सरकार से कई उम्मीदें हैं। वे चाहते हैं कि देश की हस्तशिल्प कला को संवारने के साथ उसे बढ़ावा दिया जाए।

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लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूरी पर मोहनलालगंज तहसील के अमेठी कस्बे में मटके बनाते हुए रहीमुन्निशा (35 वर्ष) बताती हैं, “हम यहां लगभग 25 साल से रह रहे हैं लेकिन किसी सरकार ने महिलाओं को लेकर कोई सुविधा नहीं दी है। मेरे जैसी ही लगभग 25 से 30 महिलाऐं हैं जो मिट्टी के मटके बनाने का काम कर रहीं हैं। मेरी तरह ही उनकी भी कई समस्याऐं हैं जो सुलझाई जानी चाहिए।”

मिट्टी के लिए भी करनी पड़ती है चोरी

अमेठी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है। यहां पर महिलाऐं मिट्टी के मटके बनाकर बेचती हैं। यही काम उनकी रोजी रोटी का ज़रिया बन चुका है। इसी से ये महिलाऐं अपना जीवन चलाती हैं। “मटके बनाने के लिए मिट्टी तक नहीं है जिससे हम अपना काम लगातार कर सकें। मटके बनाने के लिए मिट्टी चोरी चुपके से लाते हैं और उससे ही मटके बनाकर बेचते हैं। अब रोज मिटटी भी नहीं मिलती है जिससे हम मटके बनाकर अपना रोजगार कर सके।” रहीमुन्निशा ने आगे बताया। उसी जगह पर बैठी दूसरी महिला कुम्हार रेशमा (40 वर्ष) बताती हैं, “हम लोगों के पास न राशन कार्ड है न ही मिट्टी खोदने के लिए तालाब तो हम अपना पेट कैसे भरेंगे।”

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