नए काम की तलाश में पलायन कर रहे कुम्हार 

नए काम की तलाश में पलायन कर रहे कुम्हार बर्तनों की कम मांग के चलते पलायन कर रहे कुम्हार।  

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बरेली। आधुनिकता के दौड़ में धीरे-धीरे मिट्टी के बर्तनों का स्थान स्टील, कांच व डिस्पोजल के बर्तनों ने ले लिया है। इससे कुम्हारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। मिटटी के बर्तनों की कम मांग के चलते इन्होंने बर्तन निर्माण के काम से किनारा करना शुरू कर दिया है। कुम्हार अब नए काम की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं।

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छावनी निवासी रमाशंकर प्रजापति(35वर्ष) ने बताया, ‘दीपावली में मिट्टी के दीए एवं छोटी मूर्तियों की बिक्री कम हो गई है। केवल पूजा के लिए बड़े दीये लोग मांगते हैं। साज-सज्जा के लिए लोग अब चाइना निर्मित झालर का प्रयोग करने लगे हैं। विदेशी सामान की कीमत कम होने के कारण हम उनकी बराबरी नहीं कर पा रहे हैं। दस वर्षों से मिट्टी के बने सामानों की बिक्री में कमी आई है। पहले हम सब लगभग मिट्टी के लाखों दीये बेचा करते थे। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में हम लोग इस धंधे को छोड़ देंगे।’

हार्टमन कॉलोनी निवासी प्रेमशंकर प्रजापति (40वर्ष)बताते हैं, ‘चाय की दुकानों पर और शादियों में पहले हम लोग काफी मात्रा में कुल्हड़ बेचते थे, लेकिन पिछले दस सालों में प्लास्टिक के ग्लासों का चलन बढ़ गया है। इस कारण हम लोगों का रोजगार बिलकुल ठप्प हो गया है।’

चौधरी तालाब निवासी पंकज कुमार प्रजापति (45वर्ष) बताते हैं, ‘हमारे घर पर पहले मटके, हांडी और गमले बनाने का काम होता था। इस काम में पूरा परिवार लागा रहता था। लोग अब मिटटी के गमले की जगह प्लास्टिक के गमले खरीदने लगे हैं।हांडी की जगह अनाज रखने के लिए प्लास्टिक ड्रम तथा मटके की जगह वाटर कूलर लेने लगे हैं। मैं और मेरा भाई अब फर्नीचर की दुकान पर नौकरी करने लगे हैं।’

पलायन को मजबूर कुम्हार

मिट्टी बहुत महंगी हो गई है। जलावन की किल्लत के कारण मिट्टी के सामान की लागत बढ़ने के कारण, लम्बे समय न चलने के कारण और प्लास्टिक के सामान सस्ते होने के कारण लोग मिट्टी के सामान से मुह मोड़ रहे हैं। इस वजह ने कुम्हारों को रोजगार की तलाश में पलायन होने को मजबूर कर दिया है। कुम्हारों को अब नई सरकार से उम्मीद है। सरकार यदि कुछ अनुदान देगी तो इनका काम आसानी से चल सकेगा।

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