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टमाटर की फसल का ऐसे करें आर्द्रगलन रोग से बचाव

टमाटर की फसल का ऐसे करें आर्द्रगलन रोग से बचावटमाटर की फसल।

आर्द्रगलन रोग पौधशाला में उगाए जा रहे टमाटर के पौधों को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। आर्द्रगलन रोग पूरे विश्व में टमाटर की फसल वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। इस रोग से सर्वाधिक नुकसान टमाटर के बीजों एवं पौधों को होता है।

यह रोग टमाटर के नियंत्रित तथा खुले क्षेत्र में पाया जाता है। मृदा रहित टमाटर की खेती में यह रोग नहीं होता है। यह रोग टमाटर की जड़ों में अन्य फफूंदों जैसे कोलेटोट्राइकम कोकोडिस, फाइटोफोथोरा निकोटियाना और पाइरोकाइटा लाइकोपरसिकी के साथ पाया जाता है। यह रोग मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देता है।

आर्द्रगलन रोग के लक्षण

इस रोग के कारण अंकुरित बीजों पर भूरी लाल विक्षतियां उत्पन्न हो जाती हैं। अंकुरण के बाद तने पर एक बड़ा भूरा विक्षति क्षेत्र बन जाता है। कुछ समय बाद पौधा सूख के मर जाता है। यह फफूंद नए पौधों के तनों में कैंकर उत्पन्न करता है। यह कैंकर भूरे रंग के दिखाई पड़ते हैं। विक्षतियां जड़ों तक फैल जाती हैं। जड़ें कुछ समय बाद रबर जैसी हो जाती हैं। पौधों के ऊपरी भागों पर भी लक्षण दिखाई पड़ते हैं। टमाटर के तने भूरे, मुड़े हुए और कैंकर विक्षतियां युक्त हो जाते हैं। पत्रकों पर भी रोग के लक्षण दिखाई देते हैं।

ऐसे करें बचाव

यह रोग मिट्टी जनित फफूंदों के कारण होता है। इसलिए शुरुआत में फफूंद नाशकों का प्रयोग लाभकारी होता है। सावर्गीय फफूंद नाशकों के साथ सम्पर्क फफूंद नाशकों का प्रयोग करना चाहिए। सावर्गीय फफूंदनाशकों में कार्बेन्डाजिम, हेक्साकोनेजोल, मेटालेग्जील और स्ट्राबूलरिन का प्रयोग लाभकारी है। कॉपर हाइड्राक्साइड और मैंकोजेब जैसे सम्पर्क फफूंदनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। इन फफूंदनाशकों को 15 दिनों के अन्तराल पर पौधशाला एवं खेत में छिड़काव करना चाहिए। इससे रोग का फैलना रुक जाता है।

ओपिनियन पीस: शैलेंद्र विक्रम सिंह, कृषि वैज्ञािनक, कृषि विज्ञान केंद्र (रायबरेली)

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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