खेती के अलावा कर रहे सुकर और मत्स्य का सहपूरक व्यवसाय

खेती के अलावा कर रहे सुकर और मत्स्य का सहपूरक व्यवसायतालाब के पास ही किसान ने बनाया सुकर का बाड़ा।

औंग (फतेहपुर)। किसान अब सिर्फ फसल पर ही निर्भर नहीँ रह रहे हैं, बल्कि मत्स्य और सुकर का सहपूरक व्यवसाय जैसे और भी कई व्यवसाय कर रहे हैं। इस बारे में आलोक पटेल बताते हैं कि अगर हम खेती के अलावा और भी कई चीजें करते हैं तो कहीं न कहीं से मुनाफा जरुर होगा।

नौ बीघा में की शुरुआत, मार्च तक दिखेगा असर

फतेहपुर से 30 किलोमीटर दूर औंग क़स्बा है। इस कस्बे में रहने वाले आलोक पटेल (37 वर्ष) ने वर्ष 1998 में सुल्तानपुर जिले में तैनात पीएसी की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद अपने गाँव में आकर गौ पालन का काम शुरू किया, जिसमे उन्हें सफलता नहीं मिली। पिछले दस वर्षों से आलोक खेती कर रहे हैं। आलोक बताते हैं कि कई वर्षों से मौसम ने साथ नहीं दिया तो खेती से बहुत अच्छा मुनाफा नहीं कमा पाये, लेकिन कृषि से जुड़े कई संस्थानों में गये और वहां से प्रशिक्षण लेते रहे। वो आगे बताते हैं कि खेती के साथ-साथ मैंने इस वर्ष जुलाई से 9 बीघे तालाब में मत्स्य और सुकर का सहपूरक व्यवसाय शुरू किया है। ये हमारा पहला प्रयोग है इसके परिणाम हमें मार्च तक देखने को मिलेंगे।

ताकि दूसरे से हो सके भरपाई

आलोक पटेल बताते हैं कि खेती से लगातार ज्यादा मुनाफा न मिलने से मैंने सिर्फ खेती को ही मुख्य व्यवसाय नहीं बनाया, बल्कि इसके साथ ही मत्स्य और सुकर का व्यवसाय भी शुरू किया जिससे अगर एक व्यवसाय में घाटा हो तो दूसरे से भरपाई हो जाए। मत्स्य और सुकर के सहपूरक व्यवसाय के बारे में पूछने पर आलोक बताते हैं कि सबसे पहले 10 साल के लिए 9 बीघा का तालाब वार्षिक 15 हजार के मूल्य पर लिया। इस तालाब में इस वर्ष 40 किलो मछली का बीज जुलाई के आख़िरी सप्ताह में डाला है। इस समय प्रत्येक मछली का वजन लगभग आधा किलो का होगा। इन मछलियों का एक साल का खाने का खर्चा लगभग 25 हजार है।

सात सुकर खरीद का लाए

मार्च महीने में ये मछली बिक्री के लिए बाजार में जायेंगी, जिससे अच्छे खासे मुनाफे की उम्मीद है। आलोक उत्साहित होकर बताते हैं कि हमारे इस पूरे व्यवसाय में चित्रकूट कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ गोविन्द सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा। तालाब के आसपास की जगह जो खाली पड़ी रहती है, उसमे बांस के टट्टर का बाड़ा बनाकर उसमें सुकर पालन किया है। शुरुआत में चित्रकूट के ग्नीवा फॉर्म से सात सुकर खरीद कर लाये हैं, जिसमे 5 मादा और दो नर साढ़े तीन हजार रुपये प्रति एक की कीमत है।

इसलिए मछली और सुकर सहपूरक व्यवसाय है

सुकर को दिन भर में चावल की भूसी, ब्रेड, लौकी, कद्दू, सू-बबूल और चीजें आसानी से आसपास मिल जाती हैं, उन्हें खिलाते हैं। आलोक का कहना है कि खेतों में लौकी, कद्दू की बोआई कर दी है जिससे इन सुकर का भोजन आसानी से निकल आता है। बहुत ज्यादा बाजार से कुछ नहीं खरीदना पड़ता है। इसलिए प्रतिदिन इनके खानपान पर सिर्फ 100 रुपये ही खर्च होता है। इन सुकर का मल-मूत्र तालाब में पानी के द्वारा बहा दिया जाता है जो तालाब में पड़ी मछलियों का भोजन हो जाता है। आलोक कहते हैं कि मछलियों को इसके अलावा भी चावल की वेस्टेज और ब्रेड खिलाते हैं। इसलिए मछली और सुकर सहपूरक व्यवसाय है क्योंकि सुकर का मल-मूत्र मछलियों का भोजन है और तालाब के आसपास पड़ी बेकार जगह में सुकर का बाड़ा है।

अच्छा लाभ मिलने की उम्मीद

आलोक का कहना है कि फसल के साथ-साथ हम इस तालाब की भी देखरेख अच्छे से कर लेते हैं। इस बार हमारी फसल भी अच्छी है और तालाब की मछलियाँ भी ग्रोथ कर रही हैं। सुकर की संख्या आने वाल समय में बढ़ेगी क्योंकि एक मादा एक बार में कम से कम छह बच्चे देती है। उम्मीद है खेती के साथ-साथ इस व्यवसाय में भी अच्छा लाभ मिलेगा।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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