यूपी ही नहीं देश में भी हमेशा हावी रही है बंटवारे की राजनीति

Neeraj TiwariNeeraj Tiwari   8 Nov 2016 9:43 PM GMT

यूपी ही नहीं देश में भी हमेशा हावी रही है बंटवारे की राजनीतियूपी को विभिन्न राजनीतिक दल ने अपनी मांग के अनुरूप विभाजित करने की मांग करते आए हैं।

लखनऊ। जब-जब उत्तर प्रदेश में चुनाव का बिगुल फूंका जाता है। कई गड़े हुए मुद्दे सिर उठा लेते हैं। इनमें चाहे राम मंदिर का मुद्दा हो या यूपी के बंटवारे का। भले ही ये मुद्दे लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं मगर जब भी इनकी चर्चा की जाती है तब यूपी की सियासत में गर्मी बढ़ जाती है। आइए यूपी के बंटवारे की चाहत और जमीनी सियासत के साथ ही इसके देशव्यापी इतिहास के बारे में बारीकी से जानने की कोशिश करते हैं....

उत्तर प्रदेश के बंटवारे की बात तो नई नहीं है, पर जो नक्शा बसपा सुप्रीमो मायावती ने पेश किया है, वह नया है। उन्होंने पूर्वांचल, पश्चिमांचल, बुंदेलखंड और अवध के तौर पर चार हिस्सों की बात की है। बसपा सुप्रीमो ने भले ही इस मुद्दे को चुनाव के समय पर उठाया है मगर इसके पीछे के कारकों को जानने के लिए बस इतना ही समझना काफी है कि वह इससे प्रदेश के चौतरफा विकास के लिए इस तान को नहीं छेड़ रही हैं बल्कि वह सिर्फ राजनीति की रोटी सेंकने की जुगत में हैं। इसके पीछे उनकी मंशा मात्र इतनी है कि वह एक साथ चार राज्यों पर अपनी पकड़ को मजबूत कर सकें। वहीं, इस संबंध में यदि इतिहास देखा जाए तो हम पाएंगे कि यूपी को उसकी भाषा और भौगोलिक स्थिति के आधार पर बांटने की मांग पहले भी कई बार की जा चुकी है। यही नहीं इस मुद्दे को आधार बनाते हुए कई क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी अपनी किस्मत को चुनाव की बिसात पर आजमा रही हैं। उत्तर प्रदेश में से उत्तराखंड को अलग करने के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी गई थी।

आखिर यूपी को बांटने की क्यों बताते हैं जरूरत

प्रदेश के बंटवारे के आाधार पर ही अपनी राजनीति को नया आयाम देने वालों में अग्रज रहे हैं राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के अध्यक्ष अजित सिंह। उन्होंने अपने राजनीतिक पारी की शुरुआत के समय ही प्रदेश को बांटने के लिए आवाज बुलंद करते हुए तर्क दिया था कि यदि किसी प्रदेश का चौतरफा विकास करना हो तो उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देना चाहिए क्योंकि इससे विकास कार्यों को लागू करने में आसानी मिलती है। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हरित प्रदेश बनाने के लिए कई बार मांग कर चुके हैं। वहीं, पिछड़ों की राजनीति का दावा करने वाली बसपा ने तो हमेशा ही बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की मांग करती आई हैं।

यदि यूपी का बंटवारा हो तो कौन-कौन से बन सकते हैं राज्य

  1. पश्चिमी भाग : आगरा, अलीगढ़, बरेली, मुरादाबाद और सहारनपुर
  2. ब्रज प्रदेश : आगरा और अलीगढ़ के जिलों का विलय किया जा सकता है
  3. अवध प्रांत : अंबेडकरनगर, बहराइच, बलरामपुर, बाराबंकी, बस्ती, फैजाबाद, गोंडा, हरदोई, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, प्रतापगढ़, रायबरेली, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, सीतापुर, सुल्तानपुर और उन्नाव
  4. कम दोआब वाला प्रदेश: कानपुर, कानपुर देहात, फतेहपुर, कौशाम्बी, इलाहाबाद एवं अन्य जिले
  5. वाराणसी : वाराणसी की सभी तहसीलों को मिलाकर
  6. पूर्वांचल : मुख्यत: भोजपुरी भाषी जिले
  7. बुंदेलखंड : झांसी को राज्य बनाते हुए महोबा, चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर आदि।

उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को अलग करने के लिए भी लड़ी गई थी लंबी लड़ाई। (साभार: गूगल इमेज)

लंबा है देश में बंटवारे का इतिहास

आजादी के बाद रजवाड़ों के भारतीय गणराज्य में विलय के साथ नए राज्यों के गठन का आधार तैयार होने लगा था। वर्ष 1953 में स्टेट ऑफ आंध्र वह पहला राज्य बना, जिसे भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट से अलग किया गया था। इसके बाद दिसंबर 1953 में पंडित नेहरू ने जस्टिस फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया। एक नवंबर 1956 में फजल अली आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हो गया और भाषा के आधार पर देश में 14 राज्य और सात केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए। मध्य प्रांत के शहर नागपुर और हैदराबाद के मराठवाड़ा को बॉम्बे स्टेट में इसलिए शामिल किया गया, क्योंकि वहां मराठी बोलने वाले अधिक थे। इसके बाद लगातार कई राज्यों का भूगोल बदलता रहा और नए तर्कों व मानकों के आधार पर नए राज्य बनते गए। त्रिपुरा को असम से भाषा के आधार पर अलग किया गया तो मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड का गठन नस्ल के आधार पर किया गया। सन 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के बंटवारे के आधार भी विकास नहीं बल्कि परोक्ष रूप से नस्ल और भाषा ही बनी। धीरे-धीरे देश के कई भागों में इस मुद्दे ने जोर पकड़ा नतीजतन आज भारत में 29 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश हैं।

लिखे गए हैं ऐसे लेख

देश में बंटवारे की राजनीति को लेकर अपने एक लेख में इलाहाबाद के जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर बद्री नारायण ने लिखा था, "देश में पिछले दिनों जो छोटे राज्य बने हैं, वे सफल भी रहे हैं और विफल भी। एक तरफ उत्तराखंड है, जो लगातार इस नई स्थिति से फायदा उठा रहा है, तो दूसरी तरफ झारखंड है, जो लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार तथा पिछड़ेपन के रास्ते पर चल रहा है। ऐसे में अगर पश्चिमांचल, पूर्वाचल, अवध प्रदेश, बुंदेलखंड बन भी जाते हैं, तो ये कितने सफल हो पाएंगे, अभी यह कहना कठिन है। इन चारों क्षेत्रों की अपनी ताकत है और अपनी कमजोरियां भी। कहीं कृषि अच्छी है, तो कहीं खनिज संपदा का भंडार है। कहीं पर्यटन उद्योग में ज्यादा संभावना है, तो कहीं कम। कहीं शिक्षा के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर ज्यादा अच्छा है, तो कहीं खराब। अब तक ये चारों मिलकर अपनी कमजोरियों और शक्तियों को संतुलित करते थे। पर बंटवारे के बाद ये सभी अकेले-अकेले अपनी खूबियों और खामियों के साथ रहने के लिए अभिशप्त होंगे। वित्तीय रूप से भी ये कितने आत्मनिर्भर हो पाएंगे, नए राज्य में बढ़ता हुआ प्रशासनिक व्यय एवं विकास में कितना सामंजस्य हो पाएगा, अभी कहा नहीं जा सकता।"

संसद में भी गूंजती रही है प्रदेश के विभाजन की मांग।

राज्यों के बंटवारे का जानें कानूनी आधार

संविधान के द्वारा राज्यों का श्रेणियों में विभाजन तात्कालिक उपयोगिता के आधार पर किया गया था। प्रायः सभी इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे। जब केंद्रीय सरकार ने मद्रास राज्य की तेलुगू भाषी जनता के अनुरोध पर 1952 में आंध्र को अलग राज्य बनाने का निर्णय किया तो स्थिति में अचानक ही बदलाव आ गया। एक अक्टूबर, 1953 में आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना के बाद भाषा के आधार पर नए राज्यों के पुनर्गठन की मांग भड़क उठी। विवाद गहराता देख वर्ष 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश फजल अली इस आयोग के अध्यक्ष और पंडित एचएन कुंजरू और सरदार केएम पाणिक्कर इसके सदस्य थे।

हालांकि संविधान निर्माण के बाद ही 27 नवंबर 1947 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश एसके धर की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय आयोग का गठन किया गया और उसे इस बात की जांच-पड़ताल करने के लिए कहा कि भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन उचित है अथवा नहीं। इस आयोग ने दिसंबर 1948 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। इस रिपोर्ट में आयोग ने प्रशासनिक आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया। 22 दिसंबर 1953 को फजल अली की अध्यक्षता में गठित आयोग ने 30 सितंबर, 1955 में केंद्र सरकार की अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी और राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में निम्न सिफारिशें कीं जो निम्नद हैं...

  • राज्यों का पुनर्गठन भाषा और संस्कृति के आधार पर अनुचित है।
  • राज्यों का पुनर्गठन राष्ट्रीय सुरक्षा, वितीय एवं प्रशासनिक आवश्यकता तथा पंचवर्षीय योजनाओं की सफलता को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
  • ए, बी, सी और डी वर्गों में विभाजित राज्यों को समाप्त कर दिया जाये तथा इनकी जगह पर सोलह राज्यों तथा तीन केंद्र शासित प्रदेशों का निर्माण किया जाए।
  • संसद ने इस आयोग की सिफारिशों को कुछ परिवर्तनों के साथ स्वीकार कर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के अंतर्गत भारत में चौदह राज्य और पांच केंद्र शासित प्रदेश थे। जिन चौदह राज्यों का उल्लेख था, वे हैं- आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, बंबई, जम्मू-कश्मीर,केरल, मध्यप्रदेश, मद्रास, मैसूर, उड़ीसा (वर्तमान में ओडीशा), पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल।
  • जिन पांच केंद्रशासित प्रदेशों का नाम था, वे हैं- दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा एवं अंडमान-निकोबार द्वीप समूह।
  • भारत में मौजूदा 29 राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा तेलंगाना ।

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