टीचर्स डायरी: 'स्कूल के नाम पर डरने वाली बच्ची अब हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती है'

ललिता सिंह बाराबंकी जिले के नगर पंचायत बेलहरा में रहती हैं और घर से करीब 5 किलोमीटर दूर परमेश्वर कॉलेज में अध्यापिका हैं, और करीब 10 वर्षों से अध्यापन कर रही हैं। ललिता सिंह टीचर्स डायरी के जरिए अपना अनुभव साझा कर रही हैं।

Lalita SinghLalita Singh   23 Jan 2023 11:02 AM GMT

टीचर्स डायरी: स्कूल के नाम पर डरने वाली बच्ची अब हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती है

नन्हीं मासूम बच्ची जिसे स्कूल के नाम से ही डर लगता था। विद्यालय के गेट पर आकर ही रोने लगती थी, जिसे याद करके आज हंसी छूट जाती है, लेकिन मुझे उस बच्ची के डर को दूर करना और विद्यालय के परिवेश में ढालना मेरे लिए एक चुनौती बन गई थी आज वो बच्ची विद्यालय में कक्षा पांच की छात्रा है और पूरे क्लास में पढ़ने में सबसे अच्छी है।

ललिता सिंह बताती है कि हमारे विद्यालय में शिवराजपुर की रहने वाली खुशी और प्रिंसी नाम कि दो बच्चियां पढ़ती हैं, जिनके पिताजी अमरेंद्र सिंह की 15 साल पहले मौत हो गई है और मां आंगनबाड़ी में सहायिका हैं। मां संध्या सिंह मां और बाप दोनों के फर्ज अदा किए हैं और बच्चों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती हैं।

खुशी हमारे विद्यालय की कक्षा 5 की छात्रा थी और उसकी छोटी बहन प्रिंसी का यूकेजी में एडमिशन हुआ था। प्रिंसी जब भी स्कूल आती है तो विद्यालय के गेट से ही रोना शुरू कर देती क्लास रूम में जितनी देर भी बैठती रोती रहती। अगर कोई भी अध्यापक किसी दूसरे बच्चे को डांटता या मारता तो वह थर थर कांपने लगती और बेहोश हो जाती थी। क्लासरूम में पढ़ा रहे किसी भी अध्यापक का अगर ध्यान हटा तो वह तुरंत अपनी क्लास रूम से भागकर अपनी बड़ी बहन खुशी के क्लास रूम में जाकर उसके पास बैठ जाती थी। और उस क्लास रूम में जो भी अध्यापक पढ़ा रहे होते थे वह उसे उसके क्लास में दोबारा भेजवा देते थे और वह फिर से अपने क्लास रूम में आकर रोना शुरू कर देती थी।

ललिता सिंह और उनके साथी के टीचर्स

उसकी इस मनोदशा को देखकर मैं उससे घुलने मिलने की पूरी कोशिश करती। रोज अपने घर से टॉफी बिस्कुट ले जाती और जब भी मैं उसकी क्लास में अपना सब्जेक्ट पढ़ने जाती तो प्रिंसी से बातें करते वक्त उसे टॉफी और बिस्कुट देती लेकिन उसका डर फिर भी कम नहीं हो रहा था।

प्रिंसी को जब भी मौका मिलता वह भागकर अपनी बड़ी बहन के क्लास रूम में जाकर बैठ जाती थी, हमने विद्यालय के सभी अध्यापकों से कहा कि यह बच्ची अपनी बड़ी बहन की क्लास रूम में बैठती है, इसे बैठने दिया जाए और तब से दो-तीन माह तक प्रिंसी अपनी बड़ी बहन के पास ही बैठती जो कक्षा 5 में पढ़ती थी।

प्रिंसी अपनी बड़ी बहन खुशी जो कक्षा 5 में पढ़ती थी वहीं पर बैठती और अध्यापक उन्हें यूकेजी का होमवर्क, क्लास वर्क का काम देते और बहन के पास ही बैठकर से वह पूरा करती है अब खुशी विद्यालय आते वक्त गेट के पास से ही रोना छोड़ दिया था। धीरे-धीरे वह अपने क्लास रूम में भी बैठना शुरू कर दिया था, क्योंकि क्योंकि हम लंच के वक्त प्रिंसी को उसके क्लास रूम के बच्चों के साथ खेल खिलाते और जब भी मौका मिलता हमें तो प्रिंसी को उसकी क्लास के बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा रहने का मौका देती थी ताकि वह अपने क्लास के बच्चों के साथ घुल मिल जाए।

धीरे-धीरे प्रिंसी का डर दूर हो गया और अपने क्लास के बच्चों के साथ बैठने खेलने और हंसने लगी। वो बच्ची जो डर के मारे क्लासरूम में बेहोश हो जाती थी आज कक्षा पांच की छात्रा है और अपनी क्लास में हर बार फर्स्ट आती है।

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