बच्चों के हाथों में अभी तक कोर्स की किताबें नहीं पहुंचीं, कैसे सुधरेगा शिक्षा का स्तर

बच्चों के हाथों में अभी तक कोर्स की किताबें नहीं पहुंचीं, कैसे सुधरेगा शिक्षा का स्तरइस बार फिर किताबों की छपाई के टेंडर की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। इस शैक्षिक सत्र में भी सरकारी स्कूलों के बच्चों को जल्द किताबें मिलते नहीं दिख रही हैं। इस बार फिर किताबों की छपाई के टेंडर की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।

पहले से देर से शुरू हुई किताबों की टेंडर की प्रक्रिया का हाल ये है कि निर्धारित तिथि 12 अप्रैल को खोली जाने वाली फाइनेंशियल बिड अभी तक नहीं खोली गयी है। इसका कारण भी बताया नहीं गया है और इसके खोले जाने की तिथि भी अभी निर्धारित नहीं की गई है। इसके आगे की प्रक्रिया किस तरह से कब तक सम्पन्न होगी और किताबें कब तक बच्चों तक पहुंचेंगी, इस पर सवाल खड़े हो गये हैं।

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संयुक्त शिक्षा निदेशक, बेसिक, ललिता प्रदीप कहती हैं, “किताबों की छपाई के टेंडर के बारे में क्या हो रहा है मैं इस बारे में अभी कुछ कह नहीं सकती। यह काम पाठ्य-पुस्तक अधिकारी का है, वहीं सही जानकारी दे सकते हैं। इतना कह सकती हूं कि पिछली बार टेंडर की प्रक्रिया में दिक्कत हो जाने के कारण किताबों की छपाई में देरी हुई थी।” वो आगे बताती हैं, “इस बार अब तक टेंडर की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिये थी लेकिन विधान सभा चुनाव के कारण टेंडर में देरी हुई है। फिलहाल टेंडर की प्रक्रिया जारी है किताबों की छपाई जल्द ही शुरू होगी।”

सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्रदेश में 1.98 लाख प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले 1.96 करोड़ बच्चों के लिए इस बार भी लगभग 250 करोड़ रुपए की किताबों की छपाई होनी है, जो बच्चों को सरकार द्वारा मुफ्त दी जाती हैं। लगभग 13 करोड़ किताबों की छपाई इस बार होनी है।

पिछले वर्ष टेंडर में अपनों को लाभ पहुंचाने का मामला सामने आया था। तत्कालीन बेसिक शिक्षा सचिव पर एक कंपनी विशेष के लिए टेंडर की शर्तों मे बदलाव किये जाने के आरोप लगे थे। इसके लिए बेसिक शिक्षा सचिव आशीष गोयल को उनके पद से हटा दिया गया था। उनकी जगह पर अजय कुमार सिंह को सचिव बेसिक शिक्षा के पद पर तैनात किया गया था।

इसके बाद बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए किताबें छपवाने के लिए जारी टेंडर में ईको फ्रेंडली कागज के इस्तेमाल की अनदेखी को चुनौती दी गयी थी और मामला कोर्ट पहुंच गया था। इसके कारण बच्चों को छमाही परीक्षा के बाद किताबें मिलने की नौबत आई थी। यही नहीं पिछले लगभग चार वर्षों से किताबें समय से स्कूलों में नहीं वितरित की जा रही हैं। वह भी तब जब स्कूलों में शैक्षिक सत्र कब शुरू होना है इसके बारे में पहले से तिथि तय होती है।

टेंडर की प्रक्रिया के क्रम में बीती 12 अप्रैल को फाइनेंशियल बिड खोली जानी थी जो अभी आदेश न मिल पाने के कारण नहीं खुल सकी। यह बिड कब खोली जायेगी इसके लिए अभी कोई तिथि निर्धारित नहीं की गयी है।”
अमरेन्द्र सिंह, पाठ्य पुस्तक अधिकारी

बेसिक शिक्षा अधिकारी, प्रवीण मणि त्रिपाठी कहते हैं, किताबों की छपाई का मुद्दा मेरे स्तर का नहीं है। यह शासन के स्तर का मामला है। टेंडर कब फाइनल होगा कब किताबों की छपाई होगी मैं इस बारे में कुछ कह नहीं सकता। जब भी किताबें छप कर आ जायेंगी, स्कूलों में बंटवा दी जायेंगी।”

काल्वेन ताल्लुकेदार्स इंटर कॉलेज के शिक्षक एसकेएस राठौर कहते हैं, “यह बात जानते हुए कि शिक्षा व्यवस्था के तहत बच्चों को शैक्षिक सत्र की शुरुआत में किताबें मिल जानी चाहिये इसके बावजूद भी पिछले कई वर्षों से बच्चों को किताबें समय पर नहीं मिल रही हैं। पिछली बार तो छमाई की परीक्षा तक नहीं मिल सकीं थी। इस बार अभी आसार तो नजर नहीं आ रहे लेकिन सरकार बदली है तो उम्मीद ही कर सकते हैं कि बेहतर व्यवस्था के तहत बच्चों को इस बार एक जुलाई से किताबें मिल सकेंगी।”

प्राथमिक विद्यालय गोहरामऊ, काकोरी की प्रधानाचार्य, अंबर फातिमा कहती हैं, “पिछले वर्ष नवम्बर के महीने में किताबें आयी थीं। इस बार सुना है कि जुलाई में मिल जायेंगी लेकिन संभावना कम ही नजर आ रही है। समय पर किताबें आ जायें तो बच्चों को खुशी होगी वरना हर बार की तरह इस बार भी बच्चों को पुरानी किताबों से ही पढ़ना होगा।”

अभी ये काम होना बाकी

इस बार अभी तक टेंडर की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। अभी फाइनेंशियल बिड खुलनी बाकी है जो निर्धारित समय पर नहीं खुल सकी। इस प्रक्रिया के बाद बाद रेट आने और आर्डर दिये जाने के बाद किताबों की छपाई की प्रक्रिया शुरू होगी। किताबों की छपाई के बाद ही किताबों के वितरण की प्रक्रिया आरम्भ होगी।

विधानसभा में उठ चुका मुद‍्दा

बच्चों को किताबें समय से न मिल पाने का मुद्दा पिछले वर्ष विधान सभा में भी उठाया गया था। विधान परिषद में शिक्षक दल के नेता ओम प्रकाश शर्मा ने कहा था कि शिक्षा विभाग में नए आईएएस अफसर आए हैं। जब तक उनको कमीशन नहीं मिल जाता, तब तक टेंडर फाइनल नहीं होता। उनकी कमीशनखोरी की वजह से ही प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों को किताबें नहीं बंटी हैं। ये मुद्दा कांग्रेस के दिनेश प्रताप सिंह और दीपक सिंह ने भी उठाया था।

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