निजी प्रयास व वेतन से शिक्षक ने बदली विद्यालय की तस्वीर

Ajay MishraAjay Mishra   31 Aug 2018 8:15 AM GMT

कन्नौज। अधिकतर सरकारी कर्मचारी विभागीय कार्य करने के लिए बजट का रोना-रोते हैं। एक हेडटीचर ऐसी भी हैं, जिन्होंने बजट का इंतजार किए बिना अपने वेतन से धीरे-धीरे करीब तीन लाख रुपए प्राथमिक स्कूल को चमकाने में लगा दिए। दो साल में यहां स्टूडेंट्स की पंजीकरण संख्या तीन गुना पहुंच गई। छात्राओं की संख्या छात्रों की अपेक्षा अधिक है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 150 किमी दूर जनपद कन्नौज के जलालाबाद ब्लॉक क्षेत्र के प्राथमिक स्कूल जसपुरापुर सरैया प्रथम की। यहां की हेडटीचर रेनू कमल बताती हैं, ''इस स्कूल में सहायक अध्यापिका के पद पर मैंने साल 2013 में चार्ज लिया था। साल 2016 में हेडटीचर का चार्ज मिलने के बाद स्कूल के लिए कुछ अलग करने की ठानी। विद्यालय का भवन जर्जर था। चहारदीवारी भी नहीं थी। गांव वाले लोग परिसर में घुसकर नुकसान कर जाते थे।''


हेडटीचर आगे बताती हैं, ''सबसे पहले बाउण्ड्रीवाल बनवाई। इसमें करीब 90 हजार खर्च हो गया। कुछ खराब दरवाजे लकड़ी के थे, उनको हटवाकर लोहे के लगवाए। अधिकतर कमरों में खिड़किया भी नहीं लगी थीं, लोहे की लगवाईं। दीवारों का प्लास्टर टूटकर गिर रहा था। फर्श भी बेकार थी। इन सभी कमियों को दूर कराकर किचन सही कराई और कक्षों में पुट्टी कराई।''

''एक शिक्षिका ने अपने वेतन से स्कूल में बाउण्ड्रीवाल बनवाई और उसे सही कराया। अब वह स्कूल को स्मार्ट बनाने में लगी है। एक क्लास को स्मार्ट बनाया भी है। स्कूल इग्लिष मीडियम का बन चुका है। यह सकारात्मक पहल है जिले के अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं भी इसको अपने में उतारें।''
दीपिका चतुर्वेदी, बीएसए- कन्नौज

''हर साल एक क्लास स्मार्ट बनाने का लक्ष्य है। दो कक्षाएं स्मार्ट बन चुकी हैं। कक्षा एक और दो के बच्चे प्लास्टिक की कुर्सियां पर बैठकर पढ़ते हैं। बच्चे आसानी से सीखें इसके लिए प्रोजेक्टर और लैपटाप भी लगवा रखा है।'' हेडटीचर रेनू कमल आगे यह भी बताती हैं, ''स्कूल परिसर में तरह-तरह के पौधे और फुलवारी लगी है। चारदीवारी न होने से जानवर और गांव के लिए लोग इसे नुकसान पहुंचाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। मेरा मन तो आदर्ष विद्यालय घोशित होने का था, लेकिन अंग्रेजी माध्यम बन गया है। यह भी अच्छा है। पहले अकेली पढ़ाती थी, सिर्फ एक शिक्षामित्र ही थीं। बाद में उनका चयन दूसरी जगह हो गया। लेकिन जुलाई 2018 में बीएसए मैम की ओर से मुझे चार षिक्षक और मिल गए। अब षिक्षण कार्य अच्छे तरीके से चलता है।''

परिषदीय स्कूलों में पहुंचे बच्चे, दो निजी स्कूल बंद


प्राथमिक स्कूल जसपुरापुर सरैया प्रथम की हेडटीचर रेनू कमल का कहना हैं, ''क्षेत्र में दो निजी स्कूल बंद हो गए हैं। इसमें एक चकिया वाला तो दूसरा मीरपुर गांव का स्कूल षामिल है। बंद होने का कारण वहां के बच्चों का मेरे स्कूल में पढ़ना है। बच्चों की हाजिरी 80 फीसदी रहती है। अगर बच्चे नहीं आते हैं तो मैं घर बुलाने जाती हूं। छात्राओं से तो यहां तक कह रखा है कि अगर घर का काम है तो भले ही आधा घंटा लेट हो जाओ लेकिन स्कूल जरूर आओ।'' आगे कहती हैं कि ''अभिभावकों से हर महीने मिलने के लिए गांव में जाती हूं। इसका असर काफी पड़ता है। इससे अभिभावक हमारी बात मानकर अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं।''

एसएमसी सदस्य मनोज कुमार बताते हैं, "मेरा बेटा आयुष कक्षा एक में पढ़ता है। प्राथमिक विद्यालय जसपुरापुरा सरैया में पहले लोग जुआ खेलते थे। जब से ये मैडम आई हैं काफी सुधार हुआ है। अब बहुत दूर-दूर के बच्चे पढ़ने आते हैं। जब भी मुझे मीटिंग की सूचना मिलती है पहुंचता हूं। अधिकारी आते हैं तब भी जाना पड़ता है।

ऐसे बढ़ा छात्र-छात्राओं का आंकड़ा

हेडटीचर बताती हैं कि साल 2013 में कुल 99 बच्चे पंजीकृत थे। साल 2014 में 108, साल 2015 में 98, साल 2016 में 102, साल 2017 में 210 और वर्तमान समय में 303 छात्र-छात्राएं विद्यालय में पंजीकृत हैं। इसमें छात्रों की संख्या 151 और छात्राओं की संख्या 152 है। हेडटीचर के मुताबिक कक्षा एक में 57, दो में 69, तीन में 78, चार में 68 और पांच में 31 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं।

बच्चे बोले, पढ़ाई होती नहीं फीस लेते ज्यादा

कक्षा पांच में पढ़ने वाली छात्रा गौरी बतातीं हैं, ''पहले हम इसी सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। बाद में मेरे पापा ने प्राइवेट स्कूल में नाम लिखवा दिया। वहां फीस ज्यादा लेते थे, लेकिन पढ़ाई फिर भी नहीं होती थी। एक दिन रेनू मैम हमारे घर आईं उन्होंने मम्मी-पापा से सरकारी स्कूल भेजने को कहा, तब से हम यहां पढ़ने आ रहे हैं। अब स्कूल अच्छा हो गया है और पढ़ाई भी अच्छी होती है। नए टीचर भी आ गए हैं।''

कछपुर्वा निवासी कक्षा चार की छात्रा सोनाली कहती हैं कि ''हम डेढ़ किमी दूर से साइकिल चलाकर पढ़ने आते हैं। यहां पढ़ाई अच्छी होती है, इसलिए अपने गांव वाले सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ते हैं। वहां बच्चे भी बहुत कम आते हैं।''

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