उत्तर प्रदेश में हो सकता है चारे का संकट

उत्तर प्रदेश में हो सकता है चारे का संकटgaoconnection

लखनऊ। तपती दुपहरी में सीतापुर जिले के एक गाँव की निवासी केतकी देवी (50 वर्ष) सड़क किनारे एक खेत में झाड़ू लगाकर भूसा बटोर रही थीं। केतकी आजकल कटाई के बाद गाँव वालों के खेतों से बचा भूंसा नियम से बटोरती हैं ताकि अपने पशुओं को कुछ खिला सकें। केतकी की स्थिति पशु चारे की समस्या की भयावहता की झलक है। 

सूखे की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश को आने वाले समय में चारे के भारी संकट से भी रूबरू होना पड़ सकता है। देश के एक चौथाई पशुओं की जनसंख्या वाले यूपी में इस साल कम उत्पादन के चलते भूसा अभी से 500-600 रुपये प्रति कुंतल बिकने लगा है। 

लखऩऊ जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर दूर दिशा में सीतापुर जिले के भदरहा गाँव की केतकी ने बताया, "मेरे पास तीन गाय हैं, लेकिन उन्हें खिलाने को चारा नहीं है। पहले भूसा सस्ता भी था और लोग मांगने पर भी थोड़ा बहुत दे देते थे, इस बार गाँव में बहुत कम लोगों के यहां भूसा हुआ। इसलिए दूसरे खेतों से बटोर कर थोड़ा बहुत जुटा रही हूं।"

प्रमुख कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में 50 जिले सूखे से प्रभावित हुए हैं। पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे बुंदेलखंड समेत प्रदेश के दूसरे इलाकों में गेहूं के साथ भूसे का उत्पादन भी गिरा है। 

लखनऊ के भिठौली में आढ़त चलाने वाले रमेश तिवारी बताते हैं, ''गेंहू की फसल अच्छी न होने से भूसे के उत्पादन में 60 प्रतिशत की कमी आई है। बुंदेलखंड और गोरखपुर समेत कई इलाकों में उत्पादन काफी कम हुआ है, जिससे रेट बढ़ गए हैं। आज-कल थोक बाजार ही 500 की है (500 रुपए प्रति कुंतल)"। 

पशुचारे का संकट पूरे देश में है। लगभग 20 करोड़ पशुओं के सापेक्ष आधा चारा ही उपलब्ध है। केंद्र सरकार की समिति ने हाल ही में एक रिपोर्ट दी है, जिसमें बताया गया है कि देश में हरे चारे और भूसे का संकट है। देश में शुष्क चारे का 40 प्रतिशत, हरे चारे का 36 फीसदी और पूरक आहार की 57 फीसदी कमी है।

तिवारी बताते हैँ, "हालात ये हैं कि पहले जहां गोरखपुर समेत पूर्वांचल के कई जिलों से भूसा लखनऊ आता था इस बार वापस यहां से भेजा जा रहा है। यही हालात रही तो भूसा आने वाले कुछ महीनों में 1000 रुपये क्विंटल में बिकेगा।"

चारे की कमी यूपी की अर्थव्यवथा पर सीधा धक्का हो सकती है क्योंकि दुग्ध उत्पादन व्यवसाय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को अच्छा समर्थन देता है। 19वीं पशुगणना के अनुसार प्रदेश में 4 चार 75 लाख पशु हैं। गाय-भैंस को औसतन दिन में कम से कम चार किलो भूसा चाहिए होता है।

'उत्तर प्रदेश पशुधन परिषद' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बीबीएस यादव ने बताया, ''पशुओं के चारे के लिए भूसा बेस होता है। लेकिन इस बार भूसे का उत्पादन गिरा है। सूखे के चलते गेहूं का पौधा कमजोर रहा है और लंबाई भी अपेक्षाक्रत कम रही हो तो लांक से भूसे की रिकवरी (उपज) कम है। सिंचाई की समस्या के चलते हरा चरा भी पर्याप्त मात्रा में नहीं है इसलिए समस्या बढ़ रही है।" 

भूसे की कमी के लिए किसान और पशुपालक से लेकर अधिकारी तक कंबाइन द्वारा गेहूं की कटाई को जिम्मेदार मानते हैं। डॉ. यादव बताते हैं, ''मजदूरों की कमी और जल्दबाजी के चलते किसान कंबाइऩ से गेहूं-धान कटवाने लगे हैं। ज्यादातर किसान कंबाइन चलवाने के बाद डंठल जला देते हैं, जिससे चारा बिल्कुल नहीं बचता।"

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