ये झोपड़पट्टियां नहीं, करोड़ों का कारोबार है

ये झोपड़पट्टियां नहीं, करोड़ों का कारोबार हैgaoconnection

लखनऊ। आपको आए दिन सड़कों के किनारे झोपड़-पट्टियां दिखती होंगी। इन झोपड़पट्टियों की संख्या में दिनों दिन इजाफा होता जा रहा है क्योंकि कबाड़ का व्यवसाय करने वाले ठेकेदार दूसरे राज्यों से राजधानी में सैकड़ों परिवारों को ला रहे हैं।

ये ठेकेदार असम, पश्चिम बंगाल, बिहार से रोजगार दिलाने के बहाने से शहर में मजदूरों को परिवार सहित शहर ला रहे है। बाहरी राज्यों से लाये गये इन मजदूर को ठेकेदार खुद किराये पर जमीन लेकर झोपड़पट्टियां बना दे रहे हैं ताकि वह इनमें रह सकें। नगर निगम से सांठ-गांठ के चलते ठेकदार मजदूरों के जरिए करोड़ों रुपए की कमाई कर रहे हैं।

मजदूरों का आरोप है कि जो ठेकेदार हमें रहने की जगह देता है, वो मनमाने रेट पर हमारा कबाड़ खरीदता है। इसके अलावा अन्य जगह बेचने पर झोपड़पट्टी से निकाल देता है। असम से आये राशिद (32 वर्ष) बताते है,“कि हम परिवार के साथ असम से यहां काम करने आये हैं। हमारा ठेकेदार भी असम में रहता है। यहां पर रहने की व्यवस्था ठेकेदार ने ही कर रखी है। जो कूड़ा हम लोग दिनभर बिन कर इकट्ठा करते हैं उसे ठेकेदार को ही बेचना पड़ता है, जो हमारी मजबूरी है। ठेकेदार अन्य दुकानों से सस्ते में कबाड़ का सामान खरीदता है, जिसकी वजह से हम अपनी पत्नी के साथ ज्यादा मेहनत करने पर भी मजदूरी भर का पैसा ही बच पाते हैं।”

खुले में जाते हैं शौच 

एक झोपड़पट्टी में 15 से 20 परिवार रहते हैं। इन परिवार के सभी सदस्य खुले में ही शौच के लिये जाते हैं, जिसकी वजह से स्थानीय लोगों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। नगर निगम द्वारा खुले में शौच रोकने के लिये जुर्माना भी लगाया गया है। फैजुल्लागंज, त्रिवेणीनगर, खदरा, मोहल्लों में ऐसे लोगों की झोपड़ियां ठेकेदारों द्वारा बसाई गई हैं। 

वोट बैंक के लिए पार्षद नहीं करते विरोध 

शहर के जिस मोहल्ले में पहले से झोपड़पट्टियां बसी हुई थीं, उनमें रहने वाले परिवार के समस्याओं के नाम वोटर लिस्ट में दर्ज हैं। इसकी वजह से उन्हे वहां की नागरिकता प्राप्त है। सभी पार्षद अपना वोट बैंक बनाने के लिये इनको हटाने का प्रयास नहीं करते हैं, बल्कि इसमें रहने वालों परिवारों को हर बार के चुनाव में आवास देने के चुनावी वादे भी किये जाते हैं। जो नई झोपड़ियां बसी हैं, वहां के पार्षद भी इन लोगों को अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश में लगे हुये हैं।

 खाली जमीन तलाशते रहते हैं ठेकेदार 

ठेकेदार द्वारा किराये पर ली गई जमीन में झोपड़ी बनाकर रहने वाले पूरक दोन (38 वर्ष) बताते हैं कि हमारे साहब हमसे रहने का पैसा नहीं लेते हैं। मैं अपने परिवार सहित चार महीने से झोपड़ी बनाकर यहीं रह रहा हूं। हमारे ठेकेदार शहर में खाली जमीन तलाश रहे हैं, अगर कहीं भी खाली जमीन मिलती है तो कुछ लोगों को वहां बसाया जा सकता है। इससे ठेकेदार को किराये पर ली गयी जमीन पर पड़ने वाले किराये से छुटकारा मिल सके।  

मज़दूरों को देना पड़ता है कमीशन

इन झोपड़ियों में रहने वाले कुछ परिवार घर-घर जाकर कूड़ा उठाने का काम करते हैं। इस काम के लिए नगर निगम के ठेकेदार इन्हें महीने में 4500 रुपए वेतन देते हैं। इसके अलावा कूड़ा बीनते समय इन्हें रद्दी या अन्य सामान प्राप्त होता है तो वे अपने ठेकेदार के पास बेच लेते हैं। इस सामान को अलग से बेचने के लिये नगर निगम का ठेकेदार इनके वेतन से 500 रुपए बतौर कमीशन हर महीने काटता है। कूड़ा उठाने वाले मजदूरों को ये ठेकेदार महीने में एक भी छुट्टी नहीं देते हैं। यदि ये मजदूर कोई छुट्टी लेता भी है तो इनका उस दिन का वेतन काटा जाता है।

रिपोर्टर - अविनाश सिंह

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