यूनिफॉर्म सिविल कोड: सभी धर्मों का एक कानून क्यों न हो?

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नई दिल्ली।  यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने लॉ कमीशन को चिट्ठी लिखी है जिसमें यूनिफॉर्म सिविल कोड के बारे में स्टडी करके एक रिपोर्ट देने को कहा गया है। कानून मंत्री ने कहा है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बीजेपी के एजेंडे में है और संसद के बाहर और अंदर इस बारे में चर्चा होती रहती है। इसलिए इस मुद्दे पर सरकार ने आगे बढ़ने का फैसला लिया है।

क्या है 

यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का मतलब ये है कि देश के हर नागरिक के लिए एक समान कोड होगा। शादी, तलाक और ज़मीन जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। फिलहाल हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के तहत करते हैं।

क्या हैं दिक्कतें?

आखिर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर क्या दिक्कतें हैं। कई लोगों का ये मानना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने से देश में हिन्दू कानून लागू हो जाएगा। जबकि सच्चाई ये है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड एक ऐसा कानून होगा जो हर धर्म के लोगों के लिए बराबर होगा और उसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा। ऐसी भी बातें कही जाती हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने के बाद लोगों की धार्मिक आज़ादी खत्म हो जाएगी। जबकि सच्चाई ये है कि समान नागरिक संहिता के लागू हो जाने के बाद लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता बाधित नहीं होगी बल्कि इसके लागू होने से सभी को एक समान नजरों से देखा जाएगा।

कई धर्मों का अलग कानून

फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। फिलहाल हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी क़ानूनों के तहत करते हैं। 

निजी कानूनों का विवाद पुराना

निजी कानूनों का ये विवाद अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है। उस दौर में अंग्रेज, मुस्लिम समुदाय के निजी कानूनों में बदलाव करके उनसे दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे। आजादी के बाद साल 1950 के दशक में हिन्दू कानून में तब्दीली की गई लेकिन दूसरे धर्मों के निजी कानूनों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

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