कला कनेक्शन: नन्हें बच्चों ने सजाये मधुबनी लोक-कला के नमूने

छोटे से गाँव गदैला में बैठ कर जब बिहार की लोक कला बनाई तो हर बच्चे के अंदर का कलाकार जागा।

कला कनेक्शन: नन्हें बच्चों ने सजाये मधुबनी लोक-कला के नमूने

गदैला (लखनऊ)। अंग्रेज़ी अक्षर का 'सी' लिखकर मछली बनी, फ़िर उसमे लाल, बैंगनी और अन्य चटक रंग भरे गए और देखते ही देखते छः-सात साल के बच्चों ने मधुबनी लोक कला का एक नमूना अपने-अपने कागजों पर उतार दिया।


यूं तो मधुबनी कला अपनी बारीकी और प्राकृतिक रंगों के लिए जानी जाती है जिसे बनाने में काफ़ी वक़्त लगता है लेकिन गाँव कनेक्शन मेला में लगी कला कार्यशाला में छोटे बच्चों ने इसे आसान तरीकों से बनाना सीखा। कार्यशाला में उपस्थित बच्चों में कुछ इतने छोटे भी थे जिन्हें ठीक से अपना नाम लिखना भी नहीं आता।

भरनी और कछनी इस कला के दो प्रकार हैं जिनके ज़रिये मुख्य कलाकृति में रंगो का भराव किया जाता है। पारम्परिक तौर पर तो इसे फूलों, पत्तियों और अन्य प्राकृतिक रंगों से किया जाता है लेकिन बच्चों ने सूखे रंगों का इस्तेमाल करते हुए मधुबनी शैली में ग्रीटिंग कार्ड बनाये। कुछ के चित्र विचित्र बने लेकिन उत्तर प्रदेश के बक्शी का तालाब जिले में स्थित छोटे से गाँव गदैला में बैठ कर जब बिहार की लोक कला बनाई तो हर बच्चे के अंदर का कलाकार जागा।




क्या है मधुबनी लोक कला?

अपने चटकीले रंगों, जीवंत चित्रों के लिए जानी जाने वाली मिथिला या मधुबनी चित्रकला, बिहार और नेपाल के मिथिला क्षेत्र की लोक कला है। मधुबनी कला की शुरुआत ब्राह्मण परिवारों के महिलाओं द्वारा त्यौहारों व शादी-विवाह के दौरान घरों को सजाने के लिए बनाई गयी कलाकृतियों से हुई। पर यह पारम्परिक कला रूप अब गांव में रहने वाले हर निवासी के आमदनी का प्रमुख श्रोत है। प्रान्त की महिलाएं शुभ अवसरों के दौरान सजावट के रूप में अपनी घर की दीवारों को हिन्दू पौराणिक कथाओं की घटनाओं के आधार पर चित्रित करती हैं। चित्रों में रंग भरने के लिए ज्यादातर पत्तियों, फूलों और फलों से निकाले गए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है। औसतम 90 फ़ीसदी घरों में महिलाएं यह कला बनती ही हैं। आज यह कला गांव के हर दुसरे घर के निवासी के लिए आजीविका का स्रोत बन गया है। सीता देवी के भारत रत्न समेत कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद मधुबनी कला ने यह प्रसिद्धि अर्जित की। आज, गांव के हर घर में कम से कम एक मधुबनी कलाकार है। मधुबनी चित्रों में अब पांच विशिष्ट शैलियाँ हैं - कोहबर, भरनी, कचनी, तांत्रिक और गोदना।

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