महिलाएं सिर्फ घर ही नहीं, भारत की जीडीपी में सबसे ज्यादा योगदान देने वाली कृषि क्षेत्र की धुरी भी हैं

ये महिला किसान अब सिर्फ पिता या पति की सहयोगी नहीं बल्कि घर की कमाऊ सदस्य हैं। ये अपने परिवार की मुखिया हैं, गांव के विकास की धुरी हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और महिला सशक्तिकरण की जीती जागती मिसाल हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   26 March 2019 5:44 AM GMT

महिलाएं सिर्फ घर ही नहीं, भारत की जीडीपी में सबसे ज्यादा योगदान देने वाली कृषि क्षेत्र की धुरी भी हैं

रांची (झारखंड)। महिलाएं खेती का आधार हैं। वो हल चलाती हैं, वो निराई करती हैं, फसल बोती हैं और उसे बाजार तक बेचने जाती हैं। महिलाएं सिर्फ घर ही नहीं, भारत की जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान करने वाले कृषि क्षेत्र की धुरी हैं।

इस तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं मजदूर या फिर पिता या पति के सहयोगी के रूप में जानी जाती हैं। लेकिन कुछ जगहों पर ये तस्वीर बदल रही है। झारखंड उनमें से एक है। यहां खेती-किसानी की डोर महिलाओं के हाथों में है। महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना का साथ मिलने से इन मेहनतकश महिलाओं की जिंदगी बदल रही है। खेती-बाड़ी में इनका ज्ञान हैरान करने वाला है।



रांची जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर सिल्ली ब्लॉक के ब्राह्मनी गाँव की प्रभा देवी अपने आलू के खेत में काम करते हुए बताती हैं, " रसायनिक तरीके से उगाई गई चीजें चमकदार होती हैं, एक तरह की होती है, लोग भी उन्हें खरीदते हैं, लेकिन वो नहीं जानते है कि उन्हें कैसे उगाया गया है।" उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा, "गाँव में जितने भी किसान हैं उन्हें हम बताते हैं कि वो अपने खेतों में रासायनिक खाद का प्रयोग बिलकुल न करें। क्योंकि इससे जमीन और हमारा स्वास्थ्य दोनों खराब हो रहे हैं।"

सखी मंडल से जुड़ी प्रभा देवी एक आजीविका कृषक मित्र हैं। वो कहती हैं, "जब ये डीएपी-यूरिया नहीं थे तब हमारे इलाके में महिलाओं को बहुत कम कैंसर होता था, लेकिन अब तो हमारे गांव के आसपास कई महिलाओं को कैंसर है। क्योंकि हम जो जमीन में अंधाधुंध उर्वरक डालते हैं, वो मिट्टी में होकर हमारे खाने में पहुंच रहा है।"

वो सवाल करती हैं, "क्या जब अंग्रेजी दवाएं (कीटनाशक) नहीं थे तब खेती नहीं होती थी?, होती थी न, हमारे बाप-दादा ऐसे ही खेती करते थे गोबर, नीम दूसरे देसी तरीकों से। अब हम लोग फिर से उसी तरह की खेती की तरफ लौट रहे हैं।"


प्रभा देवी की तरह झारखंड के पश्चिमी सिंहभूमि जिले के खूंटपानी ब्लॉक से 10 किलोमीटर दूर बारीपी गाँव की रहने वाली गुरबरी गोप (30 वर्ष) मचान विधि से अपने खेत में करेले की फसल दिखाते हुए बताती हैं, "पहले इस खेत में ज्यादा कुछ पैदा नहीं होता था, बरसात में एक बार धान लगा देते थे, लेकिन जबसे मैं खेती की ट्रेनिंग करके आई हूँ, तबसे मचान विधि से सब्जी की खेती करने लगी हूँ। इसी खेत में पिछले साल श्री विधि से धान लगाया जो छह कुंतल हुआ।"

अब गुरबरी गोप जैविक खाद देसी तौर-तरीकों से खुद बनाती हैं इसलिए कम जमीन में भी अच्छा मुनाफा ले रही हैं। गुरबरी गोप के पास बहुत ज्यादा खेत नहीं हैं, लेकिन ये लीज पर खेत लेकर आधुनिक तौर-तरीकों से खेती करने लगी हैं, जिससे इनके घर का खर्च आसानी से चलने लगा है। ये भी आजीविका कृषक मित्र हैं। इन्होंने पिछले वर्ष 15 हजार रुपए में करेले की खेती करके उससे 70-80 हजार रुपए कमाए थे।


वहीं रांची के ओरमांझी गाँव की रंजना देवी की गिनती अब अपने क्षेत्र में एक सफल किसान के रूप में होती है। ये एक एकड़ खेत में जैविक तरीके से मिश्रित खेती करती हैं जिसमें इनकी सालाना आमदनी दो लाख रुपए हो जाती है। ये न केवल खुद सफल किसान हैं बल्कि इनके प्रशिक्षित किए 30 किसान जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं।

प्रभा देवी गुलबरी गोप रंजना देवी जैसी अगर झारखंड की तमाम महिलाओं की माने तो वो खेती से कमाई इसलिए कर पा रही हैं, क्योंकि वो बाजार से न तो खाद खरीदती हैं और न ही बीज…यूरिया-डीएपी की जगह गौमूत्र से जीवामृत बनाती हैं, तो फसल में कीट और रोग लगने पर नीम-धतूरा जैसे घरेलू चीजों से नीमास्त्रा और ब्रह्मास्त्र। छोटे-छोटे कीड़े मारने के लिए ये नीमास्त्र बनाती हैं वहीं बड़े कीड़े मारने के लिए ब्रह्मास्त्र बनाती हैं।


आंकड़ों की माने तो भारत में करीब 6 करोड़ महिला किसान हैं। लेकिन इन महिलाओं के कामकाज पर नजर डालें तो लगभग हर ग्रामीण महिला, किसान, पशुपालक, खेतिहर मजदूर के रुप में सक्रिय नजर आएगी। ऐसी ही महिलाओं को कृषि की पहली पंक्ति में लाने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिला किसान सशक्तिकरण योजना शुरु की थी, जिसे झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी ने रफ्तार दी है। जेएसएलपीएस की कोशिशों के जरिए प्रदेश में करीब 3 लाख महिला किसान खेती से मुनाफे की फसल काट रही हैं।

पलामू जिले के लेसलीगंज प्रखंड के धनगाँव की निवासी संध्या देवी बताती हैं, "सखी मंडल से जुड़ने से पहले हमें नहीं पता था कि अगर फसल में कीड़ा लग जाए तो क्या करेंगे, बाजार से दवाइयां और खाद खरीदते थे लेकिन अब तो दवाई और खाद बिना ज्यादा किसी खर्च के घर पर ही बना लेते हैं।"


आदिवासी बाहुल्य पहाड़ों की धरती झारखंड में ज्यादातर किसानों के पास छोटी जोत है। ऐसे में छोटे जमीन पर ज्यादा फायदे के लिए योजना के तहत इन्हें मल्टीलेयर फार्मिंग सिखाई गई। खेती की लागत कम हो और स्वास्थ्य बेहतर हो इसलिए जैविक खेती को बढ़ावा दिया गया। खेती के महंगे उपकरण महिलाओं के साथी बन सकें, इसलिए सखी मंडलों को कृषि यंत्र पर 90 फीसदी तक सरकार द्वारा सब्सिडी भी दी जा रही है।

इतना ही नहीं धान और मक्के की खेती करने वाली महिलाओं को सब्जी की खेती की तरफ तो प्रेरित किया ही गया, साथ ही सैकड़ों महिलाओं को लेमनग्रास जैसी कैशक्राप की खेती भी शुरु कराई गई है। केंद्र सरकार के एरोमा मिशन के तहत केन्द्रीय औषधीय एव सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) के सहयोग से प्लांटिंग मैटेरियल और तेल उत्पादन सिखाया गया है।


खूंटी जिले की बिंदू देवी लेमनग्रास से का तेल निकालने वाली मशीन के बारे में बताती हैं, "दो तीन दीदी इसमें घास डालती हैं और फिर सिंटेक्स में देखती हैं कि पानी है कि नहीं। घास डालने के आधे घंटे बाद तेल निकलने लगता है। अगर गर्म पानी निकलता है तो उसे ठंडा करने के लिए सिंटेक्स का पानी चालाते हैं।"

बिंदु देवी के खेतों में पानी की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए उनके लिए खेती करना मुश्किल था। लेकिन अब उनके जिले खूंटी में कई जगह उस जमीन पर खेती हो रही हैं, जहां सिंचाई दुर्लभ है। क्योंकि लेमनग्रास एक ऐसी फसल है, जिसे न्यूनतम पानी की जरुरत होती है।

महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना ने न सिर्फ इन महिलाओं के हुनर को तराशा है बल्कि उन्हें रोजगार के ऐसे अवसर भी मुहैया कराए हैं जो अभी तक उनसे कोसों दूर थे। पूर्वी सिंहभूमि जिले की पूनम कुछ साल पहले दूसरों के खेतों में काम करके मुश्किल से 50-60 रुपए कमा पाती थीं, लेकिन आज वो 200 रुपए रोज शाम को अपने साथ घर ले जाती हैं।


रेशम के कुकून छांटने वाली पूनम की जिंदगी से नाउम्मीदी के बादल अब छट गए हैं। पूनम बताती हैं, "सखी मंडल में इस ट्रेनिंग के बारे में पता चला। ट्रेनिंग लेने के बाद जब पहली बार मशीन पकड़ी तो सोचने लगी इसके बारे में तो केवल किताबों में पढ़ा था लेकिन आज इसे अपने सामने देख पा रही हूँ।"

झारखंड में हजारों महिलाएं इन दिनों रेशम, लाह, इमली के उत्पादन और संवर्धन से जुड़कर अपनी जिंदगी के सपने पूरे कर रही हैं। पूनम आज जिस माइक्रोस्कोप से रेशम के अच्छे और खराब अंडों की पहचान करती हैं, वो मशीन कभी उन्होंने सिर्फ किताबों में देखी थी।


प्रभा देवी, गुरबरी गोप, रंजना देवी जैसी महिलाएं आपको झारखंड के लगभग हर गांव में मिलेंगी। क्योंकि सखी मंडल से जुड़ी आजीविका कृषक मित्र अपने आसपास की 100-150 महिलाओं को हर हफ्ते ट्रेनिंग देती हैं। और ये सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से बदस्तूर जारी है। अपनी मेहनत से पथरीली जमीन में हरी-भरी फसल उगाने वाली महिलाओं को सखी मंडल और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का साथ मिलने से वो खेती से मुनाफे की फसल काटने लगी हैं। आधी आबादी अब सिर्फ पिता या पति की सहयोगी नहीं बल्कि घर की कमाऊ सदस्य हैं। वो अपने परिवार की मुखिया हैं, गांव के विकास की धूरी हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और सशक्तिकरण की जीती जागती मिसाल हैं।



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