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बरसीम, नैपियर घास, चुकंदर या फिर भूसा... क्या खिलाने पर पशु देंगे ज्यादा दूध? एनडीडीबी के विशेषज्ञ बता रहे हैं हरे चारे की अहमियत

देश में ज्यादातर पशुपालक अपनी गाय-भैंसों को भूसा आदि फसल अवशेष खिलाते हैं। हरे चारे के न मिलने या फिर कम मात्रा से पशुओं में पोषण की कमी रह जाती है, जिससे वो कम दूध देते हैं। इस वीडियो में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के चारा विशेषज्ञ किसानों को बता रहे हैं कैसे किसान पूरे साल वो हरे चारे को उगाकर दूध उत्पादन में मुनाफा कमा सकते हैं।

आणंद (गुजरात)। पशुपालन और डेयरी के कारोबार से अगर कमाई करना है तो पशुओं को हरा चारा जरुर खिलाएं। भारत में हरे चारे की करीब 30 फसलों की 200 उन्नत किस्में मौजूद हैं। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के जानकारों की सलाह है, किसान को अगर दूध के कारोबार से कमाई करनी है तो अपने खेतों में साल भर हरे चारे का प्रबंध जरुर करें।

भारत में ज्यादातर पशुपालक अपने पशुओं को फसल अवशेष (धान, गेहूं, मक्का, बाजरा आदि का बचा भाग) खिलाते हैं। जिसके चलते पशुओं को उचित पोषण नहीं मिल पाता है। इसका असर दुग्ध उत्पादन पर भी पड़ता है। एक पशु को औसतन 20-30 किलो हरे चारे की जरुरत होती है।

स्वेत क्रांति के गढ़ गुजरात के आणंद में स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (National Dairy Development Board) के पशु विशेषज्ञ जानकार और वैज्ञानिक किसान को सलाह देते हैं कि वो पशुओं को हरा चारा जरुर खिलाएं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के हरा चारा विशेषज्ञ दिग्विजय सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं, "हरा चारा पशुओं का प्राकृतिक आहार है। हरे चारे से पशुओं को दुग्ध उत्पादन के लिए प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, मिनरल आदि भरपूर मात्रा में मिलते हैं,जिन्हें पशु आसानी से पचा जाते हैं। जो किसान अपने खेत में हरे चारे का उत्पादन करता है वो दुग्ध उत्पादन में न सिर्फ आगे बढ़ता है बल्कि अच्छा पैसा भी कमाता है।"

एक एकड़ खेत से 5 पशुओं के लिए पूरे साल उगा सकते हैं चारा

वो आगे कहते हैं, "भारत में हरे चारे वाली फसलों की कई किस्में मौजूद हैं, जिनमें बरसीम, चरी, जई, चुकंदर, नैपियर घास, चारा सरसों, गिनी ग्रास प्रमुख हैं। किसान स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुसार सालभर खेती कर सकते हैं। किसान चारा देने वाली फसलों की सही किस्मों का चुनाव करें तो एक एकड़ खेत से 5 पशुओं (भैंस-गाय) के लिए पर्याप्त 30-40 टन चारे का उत्पादन कर सकता है।"

चारे की कुछ किस्में मौसमी होती हैं तो कुछ एक बार लगाने पर 3 से 4 साल तक उत्पादन देती हैं। बरसीम और जई जैसे मौसमी हैं तो नैपियर घास एक बार में लगाने पर 3-4 साल तक उत्पादन देती है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड में हर तरह के चारे की उगाने की विधि, उनकी किस्मों का प्रदर्शन भी किया जाता है। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न कृषि, पशु विश्विद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए भी इनका प्रदर्शन किया जाता है।

देश में कुल 19.25 करोड़ मवेशी

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 में देशभर में कुल 19.09 करोड़ पशु थे। 10.87 करोड़ भैंस और दुधारू मवेशियों की संख्या 13.33 करोड़ थी। 2019 की 20वीं पशुधन गणना में मवेशियों की संख्या बढ़कर 19.25 करोड़ हो गई, भैंसों की संख्या 10.99 करोड़ रही दुधारू पशुओं की संख्या भी बढ़कर 13.64 करोड़ पहुंच गई।

दुग्ध उत्पादन में भी भारत अव्वल है लेकिन देश में पशुपालन अभी भी परंपारगत तरीकों से होता है। जिसमें हरे चारे की अलग से खेती का अभाव दिखता है।

यूपी के बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक महेश चंद्र ने गांव कनेक्शन को बताते हैं कि कैसे भारत में हरे चारे की कमी के चलते पशुपालक नुकसान उठाते हैं।

वो कहते हैं, "भारत में ग्रीन फोडर (हरे चारे) की कमी है। देश में पशु चारे की फसल उगाने का चलन नहीं है। देश में मुश्किल से 4 से 5 फीसदी हिस्से पर ही पशु चारा उगाया जाता है। ज्यादातर किसान अनाज वाली फसलों के अवशेष पशुओं को खिलाते हैं। जिससे पशु को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इसका असर न सिर्फ दुग्ध उत्पादन बल्कि उसके बच्चे देने की क्षमता पर भी पड़ता है।"

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