अपने पर्यावरण की रक्षा हम न कर पाए तो कौन करेगा?

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विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को आता और चला जाता है। कुछ भाषण होते हैं, गोष्ठियां और चर्चाएं, वायदे किए और संकल्प लिए जाते हैं और बस। ठीक उसी तरह जैसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस, मित्रता दिवस, तम्बाकू निवारण दिवस और न जाने कितने दिवस आते-जाते रहते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध हमारी संस्कृति और हमारे अस्तित्व से है इसलिए अस्तित्व को बचाने के लिए अपने पर्यावरण और अपनी संस्कृति को बचाना होगा।

हमारे पूर्वजों का मानना था कि यह पृथ्वी बहुत पुरानी है, इसके साथ हमारा नाता भी उतना ही पुराना है और इस पर हमें बार-बार आना है अतः इसे बचाकर रखना है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुए जीवन बिताने की भारतीय आदत पर्यावरण की रक्षा में सहायक थी इसीलिए हमारी धरती शस्य श्यामला थी। हमारे पूर्वजों ने कहा था ‘‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्व मिलि बनेहु शरीरा।” इनमें से यदि एक भी घटक न रहे या दूषित हो जाए तो शरीर संकट में पड़ सकता है। मनुष्य का जीवन तभी तक है जब तक वायुमंडल में प्राणवायु यानी ऑक्सीजन है और प्राणवायु तभी तक है जब तक उसका निर्माण करने वाले पेड़ और वनस्पति विद्यमान हैं। पेड़ और वनस्पति तभी तक हैं जब तक धरती पर मिट्टी और पानी है। किसी भी कड़ी को तोड़ने से पूरी श्रृंखला टूट जाएगी ।

वनस्पति और जल का सीधा सम्बन्ध है। निर्वनीकरण के कारण भूजल नीचे जाता रहा है, कुएं से पानी निकालने के लिए रस्सी लम्बी लग रही है, गर्मियों में किसानों के खेतों की बोरिंग या तो पानी कम दे रही हैं या सूख रही हैं और शहरों में पीने के पानी की हाय-तौबा मची है। कुछ इलाकों में तो धरती के अन्दर के पानी का स्तर (वाटर टेबल) हर साल एक मीटर तक नीचे जा रहा है। भूमिगत पानी का उपयोग मनुष्य के पीने के लिए होना चाहिए था परन्तु उसे सिंचाई, मछली पालने, उद्योग लगाने आदि के काम लाया जाने लगा इसलिए पेयजल का संकट आ रहा है। 

प्रदूषण अपनी सीमाएं पार कर चुका है, मिट्टी के कटान की गति तेज हुई है, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि हो रही है, पर्वतीय क्षेत्र अस्थिर हैं, रोगाणुओं और विषाणुओं की निरन्तर वृद्धि हो रही है, मानव का अस्तित्व ही संकट में है। हम में से कुछ लोग जानते तो हैं परन्तु मानते नहीं कि इन सबके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है स्वयं मनुष्य। 

जल के विषय में सोचें तो पृथ्वी पर जल चक्र सदैव चलता रहता है। समुद्र की सतह से पानी वाष्प बनकर वायुमंडल में जाता है वहां से घनीभूत होकर वर्षा जल के रूप में पृथ्वी पर गिरता है जिसका कुछ भाग पर्वतों पर बर्फ के रूप में जमा रहता है कुछ भाग प्रतिवर्ष पृथ्वी के अन्दर समावेश करके भूजल के रूप में जमा हो जाता है और शेष भाग नदियों के माध्यम से पुनः समुद्र तक पहुंच जाता है। इस चक्र में व्यवधान डालने से प्राकृतिक संकट पैदा होते हैं।

धरती पर चमड़ा, पीतल, खनिज, चीनी और कागज उद्योगों तथा सीवर लाइनों का कचरा पानी को प्रदूषित कर ही रहा है, भूमिगत पानी भी प्रदूषित हो रहा है। धरती पर मौजूद पानी के प्रदूषण को तो एक बार दूर किया जा सकता है परन्तु यदि भूमिगत पानी प्रदूषित हो गया तो उसे शुद्ध नहीं किया जा सकता। देश में जल उपयोग के लिए जलनीति बनाने की आवश्यकता है। अमेरिका जैसे देशों में जल संसाधन नियंत्रण बोर्ड (वाटर रिसोर्स कन्ट्रोल बोर्ड) और जल अधिकार विभाग (वाटर राइट्स डिवीजन) बने हैं जिन में जिला परिषद, कृषक मंडल, उद्योगपति और स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रतिनिधित्व रहता है।

जीवमंडल में विविध जीव एक-दूसरे के लिए भोजन श्रृंखला बनाते हैं जैसे घास और वनस्पति को वन्य जीव खाते हैं और उन्हें शेर खाता है। परन्तु जब वन्य जीवों को मनुष्य खाने लगेगा और शेर का भोजन छिन जाएगा तो वह मनुष्य को खाएगा। पशु पक्षियों, कीट पतिंगों तथा वनस्पति को जीवित रखकर भोजन श्रृंखला को बचाए रखना है। 

मोटेतौर पर जलचक्र, भोजन श्रृंखला और जल उपयोग का अपना महत्व है। धरती के अन्दर का मीठा पानी पीने के लिए सुरक्षित रखना चाहिए और धरातल पर मौजूद नदियों, झीलों और तालाबों का पानी सिंचाई, बागबानी, मछलीपालन, पशु-उपयोग और अन्य उद्योगों के लिए काम में लाना चाहिए। मुख्य चुनौती है मिट्टी, पानी और हवा को प्रदूषित होने से बचाना और जलभंडार को बढ़ाते रहना तथा जल खर्चो में मितव्ययिता।

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