बारिश में ऊसर ज़मीन को बनाएं उपजाऊ

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लखनऊ। प्रदेश में छोटे किसानों की संख्या बढ़ रही है, ऐसे में किसान सही जानकारी से ऊसर भूमि को भी उपजाऊ बना सकता है। इसके लिए किसान को मानसून आने से पहले ही तैयारी कर लेनी चाहिए। 

उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम के कृषि वैज्ञानिक डॉ केबी त्रिवेदी किसानों को बता रहे हैं कि कैसे बारिश आने से पहले मिट्टी की जांच जैसे दूसरे महत्वपूर्ण काम करके ऊसर को उपजाऊ बनाया जा सकता है।

ऐसे बनाए ऊसर भूमि को उपजाऊ

ऊसर सुधार का कार्यक्रम जून में ही शुरु कर देना चाहिए। ऊसर सुधार करने से पहले अपने स्थानीय ग्राम, खंड अथवा जिला विकास अधिकारी से संपर्क कर ऊसर सुधार संबंधी योजना/परियोजना, अनुदान और प्रशिक्षण कैम्पों की जानकारी ले लें। ऊसर सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण चरण हैं।

मिट्टी की जांच : पीएच मान और खेती की क्षमता मिलकर तय कर देते हैं कि ऊसर भूमि किस श्रेणी की है और उसमें कितनी और कैसी फसल होगी। मिट्टी की जांच के नतीजे से मिट्टी की श्रेणी जान सकते हैं। यह जानने के बाद ही कर पाएंगे कि अपने ऊसर जमीन के सुधार के लिए कितने जिप्सम की आवश्यकता पड़ेगी। अतः सबसे मिट्टी जांच कराएं।

मेड़बंदी : अच्छी-मजबूत मेड़ किसी भी खेत में नमी को टिकाए रखने, अनुशासित सिंचाई तथा अतिक्रमण से बचाए रखने की सबसे पहली शर्त है तो ऊसर सुधार सबसे पहला और जरूरी काम। न्यूनतम डेढ़ फीट ऊंची मेड़ तो होनी ही चाहिए। इसके लिए भूमि सुधार, ऊसर सुधार और बंजर भूमि विकास संबंधी योजना-परियोजनाओं का लाभ लिया जा सकता है। 

स्क्रेपिंग : मिट्टी की ऊपरी और निचली परतों में से नमक को पूरी तरह हटाए बगैर ऊसर भूमि को उपजाऊ नहीं बनाया जा सकता। ‘स्क्रेपिंग’ मिट्टी की ऊपरी परत में उभर आए नमक को पूरी तरह हटाने का काम है। सावधानी बरतें कि इस तरह हटाए नमक को खेत से बाहर किसी गड्ढे में डालें अथवा किसी नाले में बहा दें। ऐसी जगह कतई न डालें कि बारिश के दौरान वह वापस खेत में आ जाए।

सब-प्लाटिंग : सब प्लाटिंग का मतलब होता है, खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बांट लेना। यह तीसरा महत्वपूर्ण कदम है। ऐसा करना समतलीकरण और आगे की प्रक्रिया में मददगार सिद्ध होता है।

समतलीकरण : खेत का समतलीकरण सबसे जरूरी काम है। इसे पूरी संजीदगी और कुशलता से किया जाना चाहिए। 

यदि खेत समतल नहीं होगा तो खेत में डाला जाने वाला जिप्सम किसी एक जगह इकट्ठा हो जाएगा। पूरे खेत में एक समान जिप्सम नहीं फैलने से असर भी एक समान होगा, जोकि अनुचित है।

खेत-नाली : समतल हो गए खेत में ढाल की ओर अथवा खेत के बीचो-बीच खेत नाली बनाएं। खेत नाली का उपयोग जल निकासी के लिए किया जाता है।

फ्लंसिंग : फ्लंसिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें ऊसरीली जमीन को 15 सेंमी ऊंचा पानी भर देते हैं। 48 घंटे बाद जब पानी को बहाया जाता है, तो इसके साथ-साथ नुकसानदेह लवण भी पानी में घुलकर बह जाता है।

फ्लंसिंग और स्क्रेपिंग: याद रहे कि यह दोनों प्रक्रिया मिट्टी की निचली और ऊपरी सतह में मौजूद लवण को निकाल बाहर करने के लिए हैं। इन्हें आधा-अधूरा नहीं करना चाहिए।

जिप्सम मिक्सिंग : फ्लसिंग के बाद नंबर आता है ऊसर को उर्वरक बनाने वाली जिप्सम को मिट्टी में मिलाने का। जिप्सम सस्ता, लेकिन ऊसर सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इसे किसी भी मात्रा में या अधिक से अधिक मात्रा में नहीं मिलाना चाहिए। किस श्रेणी में पोषक तत्व की कितनी मात्रा कम है, उसके अनुसार जिप्सम की मात्रा तय की गई है। 

लीचिंग : मिट्टी में जिप्सम को भली प्रकार से मिला देने के बाद जून के दूसरे पखवाड़े में खेत को एक बार फिर 10-12 सेमी ऊंचे पानी से भर दें। 10 से 12 दिन बाद बचे हुए पानी को निकाल दें। इस प्रक्रिया को ‘लीचिंग’ कहते हैं।

खेत सुधार : लीचिंग के बाद यूं तो आपका खेत धान की खेती के लिए तैयार होगा, किंतु यदि आप खेत को हरी, देसी, नाडेप अथवा केंचुआ खाद दे सकें तो सोने में सुहागा हो जाएगा। ध्यान रहे कि धान रोपाई को समय से तैयार करें और उचित समय आने पर रोप दें। उचित बीज का चयन, खेती का वैज्ञानिक तरीका, कीट सुरक्षा और उचित तकनीक का उपयोग करें तो उपज बेहतर होने की संभावना बढ़ जाएगी।

ऊसर भूमि में कर सकते हैं धान की खेती

धान की नरेन्द्र ऊसर धान-2, साकेत-4, सी.एस.आर.-10, मोजा-349 जैसी कुछ किस्में हैं, जो ऊसर के लिए उपयुक्त होती है। खरीफ की फसलें क्षारीयता को सह लेती हैं। धान की फसल भी क्षारीयता के प्रति सहनशील होती है इसलिए ऊसरीली भूमि में दो-तीन वर्षों तक खरीफ में सिर्फ धान की फसल लेनी चाहिए। ऐसा करने से जैविक क्रिया के फलस्वरूप एक प्रकार का कार्बनिक अम्ल बनता है जो क्षारीयता को कम करता है। साथ ही भूमि में सोडियम तत्व का अवशोषण अधिक मात्रा में होने से भूमि में विनिमयशील सोडियम की मात्रा कम हो जाती है। 

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