राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस पर मिलिए इस शख्स से जो रक्तदान कर बचा चुका है कई जिंदगियां

इस शख्स की कहानी जो रक्तदान कर बचा चुका है कई जिंदगियां...

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस पर मिलिए इस शख्स से जो रक्तदान कर बचा चुका है कई जिंदगियांसाभार: इंटरनेट

लखनऊ। कई बार सही समय खून न मिलने पर लोगों की जान तक चली जाती है, लेकिन कई ऐसे भी लोग हैं जो अब तक न जाने कितनी बार रक्तदान कर कई जिंदगियां बचा चुके हैं।

बनारस के कैथी गांव के वल्लभाचार्य पांडेय भी ऐसे ही हैं वो साल 1989 से रक्तदान करते आ रहे हैं। वल्लभाचार्य पांडेय बताते हैं, "वर्ष 1989 में 19 वर्ष की उम्र में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी कर रहा था। उस दौरान वहां एक बड़ा ट्रेन हादसा हुआ था। उस दौरान घायलों को बचाने के लिए जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्साधिकारी की तरफ से रक्तदान की सिफारिश की गई थी कि रक्तदान करके लोगों की जान बचाने में मदद करें। हम और हमारे साथी रक्तदान करने के लिए पहुंचे। लाइन लगाकर हम रक्तदान करने वाले थे। मैं लाइन में लगा था डर बहुत लग रहा था लेकिन खुद को मजबूत करके रक्तदान किया।"

वल्लभाचार्य पांडेयवल्लभाचार्य पांडेय

भारत में राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस हर वर्ष एक अक्टूबर को व्यक्ति के जीवन में रक्त की आवश्यकता और महत्व को साझा करने के लिये मनाया जाता है। ये पहली बार वर्ष 1975 में एक अक्टूबर को इंडियन सोसायटी ऑफ ब्लड ट्रॉसफ्यूजन एण्ड इम्यूनोहैमेटोलॉजी द्वारा मनाया गया। इंडियन सोसायटी ऑफ ब्लड ट्रॉसफ्यूजन एण्ड इम्यूनोहैमेटोलॉजी की स्थापना 22 अक्टूबर 1971 में डॉ. जेजी जौली और मिसीज के. स्वरुप क्रिसेन के नेतृत्व में हुई।

"मुझे रक्तदान करके बहुत ही अच्छा लगा और मैंने तबसे रक्तदान करना शुरू कर दिया। वर्ष 2003 में मैंने एलर्जी के कारण रक्तदान करना बंद कर दिया और फिर रक्दान का सिलसिला टूट गया। वर्ष 2006 में एक बहुत करीबी को ब्लड की जरुरत पड़ी तब मैं डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने जांच की और बोले आप रक्तदान कर सकते हैं और तब से फिर से रक्तदान करने लगा। 2006 से लगातार रक्तदान करते हुए अब तक 85 बार रक्तदान कर चुके हैं। एक वर्ष में तीन-चार बार रक्तदान करता हूं, "वल्लभाचार्य पांडेय ने बताया।

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"पहले में कैंप में जाकर रक्तदान किया करता था। वर्ष 2008-09 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक कोने में करीब 50-60 यूनिट पड़ा हुआ था। खून फेके जाने का कारण मैंने पता किया तो पता चला कि रखने की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण फेकना पड़ा। उस दिन से मैंने कैंप में रक्तदान करना बंद कर दिया। किसी को आवश्यकता होती है वो मुझे कॉल कर लेता और मैं रक्तदान के लिए पहुंच जाता हूं। मुझे कोई रात के दो बजे भी कॉल करता है तो मैं रक्तदान के लिए चला जाता हूं। मेरे जानने वाले लोग भी अब तक 25-30 बार रक्तदान कर चुके हैं। जरुरतमंद व्यक्ति की मदद करनी चाहिए फिर वो रात हो या दिन मैं हाजिर रहता हूं, "वल्लभाचार्य पांडेय ने बताया।

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