बास्केटबॉल की एक ऐसी खिलाड़ी, जिसने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे जीते कई गोल्ड मेडल

बास्केटबॉल की एक ऐसी खिलाड़ी, जिसने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे जीते कई गोल्ड मेडलनिशा गुप्ता।

नई दिल्ली। मुंबई के प्ले कोर्ट में कुछ लड़कियां तेजी से एक गेंद को एक दूसरे के तक पास कर रही हैं। उनकी आवाज कड़क है। वे गेंद को 10 फीट ऊपर बंधे जाली नुमा नेट में डालकर शूटिंग (अंक) अर्जित का प्रयास करती हैं।

लेकिन ये तो रही सामान्य सी बातें। इसमें खास क्या है ? इसमें खास ये है कि ये लड़कियां व्हीलचेयर पर बैठकर अंक अर्जित करने का प्रयास करती हैं। ये सभी स्पेशल खिलाड़ी हैं। जो अपने अगले टूर्नामेंट की तैयारी में लगी हैं। ये टीम अगले महीने संपन्न हुयी चौथे नेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल चैंपियनशिप में हिस्सा लेकर लाैटी है।

टीम की कप्तान निशा गुप्ता हैं, जो अन्य खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। निशा की कहानी बेहद दृढ़ संकल्पित हैं। इनमें से ज्यादातर खिलाड़ी बचपन से ही खड़े नहीं हो पाए इसलिए वे व्हीलचेयर पर हैं लेकिन निशा के साथ एक बहुत ही दुखद घटना घटी जिसने उनके जीवन को पहियों से बांध दिया। लेकिन व्हीलचेयर के पहिए उनको अंक अर्जित करने नहीं रोक पाते इंडोनेशिया की बाली में आयोजित चौथी अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर बास्केटबाल चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली उनकी टीम के प्रदर्शन को खुद ब खुद बयान कर देती है।

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दर्द भरा अतीत

30 वर्षीय निशा ने हमसे अपने अतीत के बारे में बात की। वह वास्तव में खुद को भाग्यशाली मानती है क्योंकि वह सोचती हैं कि बहुत से लोग अपने सपनों का पीछा करने का अवसर नहीं पाते हैं। वह याद करते हुए बताती हैं " मैंने एचएससी की परीक्षा दी थी और वाराणसी (अपने घर) गई थी। यह मई 2004 था, मुझे ठीक से याद है कि मैं और मेरे साथ कुछ बच्चे पेड़ों से फल तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। मेरा चचेरा भाई भी साथ था। मैं कुछ आम तोड़ने का प्रयास की रही थी और अचानक मेरा पैरा फिसला और मैं नीचे आ गिरी।

जब मैं होश में आई तो मुझे बताया गया कि मेरे सिर और रीढ़ की हड्डी में गहरी चोट आई है। रीढ़ की हड्डी में बहुत ज्यादा चोटें आईं। मेरे शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था। इस घटना के बाद घर वाले बहुत परेशान हो गए। उन्होंने मुझे तुरंत दूसरे अस्पताल दिखाया, जहां डॉक्टर की टीम ने कहा कि रीढ़ की हड्डी की सर्जरी करनी होगी। मुंबई में सर्जरी के बाद निशा कई महीनों तक बिस्तर पर रहीं। फिर उन्हें बताया गया कि वो कभी चल नहीं पाएंगी। निशा लगभग चार सालों तक अवसाद में रहीं और आपको नहीं सा मान लिया।

निशा ने अपना जीवन छोड़ सा दिया था। फिर एक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से हुई। उनसे बात करने के बाद निशा को ये एहसास हुआ कि उनकी परेशानी उनके सपने को मार नहीं सकती। निशा बताती हैं " तब मैंने टैटू बनाना सीखा और टैटू कलाकार के रूप अपनी पहचान बनाई। कुछ सालों बाद मैंने 2013 मिस व्हीलचेयर इंडिया 2013 में भी भाग लिया"। गुप्ता खुद को बेचैन व्यक्ति के रूप में बताती हैं। और शायद यही वजह है कि उन्हें लगा कि वो बिना किसी की मदद के खिलाड़ी बन सकती हैं। इसमें उनके पति चेतन ने भी उनकी मदद की।

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चेतन के बारे में निशा बताती हैं, "एक बार, मेरे भाई ने मेरे फोन से चेतन को कुछ लिखा। वो उन्हें पहले से जानता था। और फिर हमने खूब बातें कीं।" हमारी प्रेम कहानी वहीं से शुरू हुई। कुछ दिन बाद उन्होंने मुझे अपनी मां से मिलवाया और उन्होंने मुझे पसंद कर लिया। इस बारे में जब मैंने अपने घर बात की तो मेरे मम्मी-पापा को विश्वास नहीं था कि कोई मेरा ख्याल रख सकता है। लेकिन हम अब खुशहाल हैं।"

निशा बताती हैं कि खेल से उनका परिचय तब हुआ जब उनके एक दोस्त जो की आर्मी में हैं, ने बताया कि महाराष्ट्र व्हीलचेयर बास्केटबॉल की एक राज्य स्तरीय टीम बना रहा है, उसके लिए उन्हें भी प्रयास करना चाहिए।"

सपना, ग्लोबल पैराएलिंपिक में पदक जीतने का

निशा ने बताया "विशेष रूप से अक्षम होने के कारण उन्हें और उनकी पूरी टीम को अभ्यास करने के साथ-साथ शौचालयों तक पहुंच पाने में भी मुश्किलें आती थीं। विशेष खेल में भी व्हीलचेयर पर रहते हुए उन्हें तमाम परेशानियां आती हैं लेकिन वे अंतरराष्ट्रीय स्तर और देश में टीम प्रतिनिधित्व करती हैं। निशा ने देश की टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए पिछले कुछ सालों में राष्ट्रीय स्तर के अलावा पैरालिंपिक में कई स्वर्ण और रजत पदक जीते हैं।

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निशा कहती हैं "मैने 2014 में एक तैराकी चैंपियनशिप में भी भाग लिया, और तब से इस खेल में भी भाग लेती आ रही हूं। मैं खेल को जीतने के उद्देश्य से नहीं बल्कि इसलिए खेलती हूं क्योंकि उन खेलों से मुझे प्यार है।" इन खेलों के अलावा निशा टेनिस, बैडमिंटन भी खेलती हैं। और हर खेल में विशिष्टता लाने का प्रयास करती हैं। 2015 में निशा ने राष्ट्रीय व्हीलचेयर बास्केटबाल चैम्पियनशिप में भाग लिया जहां उन्होंने कई पुरस्कार और एक कांस्य पदक भी जीता था।

"मुझे यह कहने पर गर्व है कि मैं एक भारतीय दिव्यांग लड़की हूं जो सब कुछ हासिल करने का सपना देखती है। निशा ग्लोबल पैराएलिंपिक में भाग लेना लेकर अपने देश के लिए पदक जीतना चाहती हैं।

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